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Thursday, February 23, 2012

वे महान नहीं थे, उन्‍हें महान बताया गया!

वे महान नहीं थे, उन्‍हें महान बताया गया!



मीडिया मंडी

वे महान नहीं थे, उन्‍हें महान बताया गया!

23 FEBRUARY 2012 ONE COMMENT

♦ बिपेंद्र कुमार

विनोद मेहता ने लखनऊ ब्‍वॉय में कुछ ऐसे पहलुओं की चर्चा भी की है, जिसकी चर्चा आमतौर पर नहीं होती या लोग नहीं करना चाहते। मसलन किताब में अटल बिहारी वाजपेयी के स्त्री प्रेम, मांसाहारी भोजन के प्रति लगाव और उनकी दत्तक पुत्री एवं दामाद की कारगुजारियों की चर्चा है। इसी तरह अखबार मालिकों की हैरतअंगेज कारिस्‍तानियों की चर्चा तो है ही, अरुण शौरी और दिलीप पडगांवकर जैसे नामी संपादकों की कार्यशैली के बारे में भी जानकारी दी गयी है।

आमतौर पर कुछ लोग इतने खुशनसीब होते हैं कि उनके अमला-बराहिल अपने प्रभाव के बल पर अपने मालिकों के पक्ष का गुणगान ही सामने आने देते हैं। ऐसी छवि बना दी जाती है कि उससे इतर देखने वालों को वर्ग-निकाला की सजा झेलनी पड़ती है। इस डर से कोई अपनी बात रखने की हिम्मत नहीं करता। यही कारण है कि वाजपेयी की गिनती आधुनिक नेताओं में सबसे लंबे कद वाले व्यक्तित्व के रूप में होती है। जबकि हकीकत यह है कि मेहता द्वारा कही गयी बातों को छोड़ भी दें, तो वे पूरी तरह लचर और हवा का रुख देखकर काम करने वाले राजनीतिज्ञ रहे हैं। विशेष कहने की जरूरत नहीं, सिर्फ बाबरी की घटना को ही याद करें। बाबरी ढहने पर उन्होंने कलेजा फाड़कर अफसोस जताया था, लेकिन विजय जुलूस निकला तो आडवाणी से आगे पहुंच गये।

इसी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में सुरेंद्र प्रताप सिंह की छवि महानायक के रूप में बना दी गयी है। जबकि हकीकत यह है कि उन्हीं के पाले हुए पत्रकारों ने रविवार के जरिये पूरे हिंदी पट्टी में प्रायोजित खबरों को परोसने का काम सबसे पहले शुरू किया था। दिल्ली, लखनऊ, पटना… पूरी हिंदी पट्टी में उनके द्वारा संपादित रविवार के ऐसे लोग थे, जो बेसिरपैर की बात लिखा करते थे। पत्रकारिता को राजनीतिज्ञों का गुलाम बनाने के काम को राष्ट्रीय फलक देने का काम यहीं से शुरू हुआ। इनमें कई तो दिवंगत हो चुके हैं और कई आज भी करोड़ों में खेल रहे हैं। लेकिन इन सब बातों की चर्चा नहीं होती। हां, इन कामों को अंजाम देने के मूल मकसद को पूरा करने के एवज में कुछ नये लोगों को पत्रकारिता का अवसर दिया गया, चर्चा बस उसकी की जाती है। आधी-अधूरी तसवीर पेश कर उसे ही व्यक्तित्व बता दिया जाता है। ऐसे में विनोद मेहता ने कुछ मुद्दे छेड़े हैं, जो निश्चित रूप से पठनीय और प्रशंसनीय हैं।

(बिपेंद्र कुमार। वरिष्‍ठ पत्रकार। 16 साल की उम्र में मासिक पत्रिका 'युवा चिंतन' निकाला। फिर साप्ताहिक 'हरपक्ष' का प्रकाशन शुरू किया, जो पहले पाक्षिक और बाद में साप्ताहिक रूप में 2003 तक छपता रहा। नौकरी 1984 से शुरू हुई और प्रभात खबर (रांची), पाटलिपुत्र टाइम्स (पटना), हिंदुस्तान (पटना) और फिर प्रभात खबर (पटना) में अप्रैल, 2009 तक उपसंपादक से लेकर समाचार समन्वयक तक का काम किया। अब स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ-साथ अनुवाद का काम कर रहे हैं। उनसे kumar.bipendra@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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