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Wednesday, January 18, 2012

दवा नीति की बीमारी

दवा नीति की बीमारी


Tuesday, 17 January 2012 11:48

अरविंद कुमार सेन 
जनसत्ता 17  जनवरी, 2012 : जनता के हितों की दुहाई देकर एक बार फिर दवा क्षेत्र के लिए भ्रामक फरमान जारी किया गया है। उच्चतम न्यायालय की फटकार के बाद यूपीए सरकार ने दवाओं की कीमतें काबू में रखने के लिए राष्ट्रीय दवा मूल्य नियंत्रण नीति (एनपीपीपी)-2011 पेश की है। एनपीपीपी के मसविदे के मुताबिक 'जरूरी दवाओं की राष्ट्रीय सूची' (एनएलईएम) में शामिल सभी 348 दवाएं नए कानून के दायरे में आएंगी। फिलहाल एनएलईएम सूची की केवल चौहत्तर दवाओं के मूल्य पर सरकार नियंत्रण रखती है। सीधे शब्दों में कहें तो इस समय देश में बिकने वाली दवाओं में से बीस फीसद की ही कीमतों पर सरकार का नियंत्रण है और नई नीति लागू होने के बाद साठ फीसद दवाओं की कीमतें सरकार के हाथ में आ जाएंगी। सरसरी तौर पर यह फैसला बेहद कारगर लगता है, मगर नई नीति की पड़ताल करने पर दवा कंपनियों के लालच की कालिख नजर आती है।
दवाओं के दाम नीचे रखने का भुलावा लंबे समय से दिया जाता रहा है। सबसे पहले 1975 में जयसुख लाल हाथी समिति ने जरूरी दवाओं के दाम कम रखने, सरकारी अस्पतालों में दवाओं की खरीद बढ़ाने और दवा वितरण तंत्र मजबूत करने जैसे कई अहम सुझाव दिए थे। चार साल बाद, 1979 में हाथी समिति की सिफारिशें आधे-अधूरे ढंग से लागू करते समय पहली बार दवा नियंत्रण प्रणाली लागू की गई। इस कवायद से जनता को थोड़ी-बहुत राहत मिली, मगर 1987 और 1995 में सरकार ने कई बदलाव करके मूल्य नियंत्रण कानून को कागजी शेर में तब्दील कर दिया। 1995 में लागू किए गए दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीए) ने भारतीय दवा उद्योग की तस्वीर ही बदल कर रख दी। सरकार ने खुदरा दवा बाजार को खुला छोड़ दिया और महज चौहत्तर जरूरी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण रखने का फैसला किया।
फिलवक्त सरकार जरूरी दवाओं की कीमतों में ही हस्तक्षेप करती है और इनकी सूची विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने तैयार की है। विडंबना देखिए, डब्ल्यूएचओ ने अमेरिका और यूरोप की बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के दबाव में पूरी दुनिया के लिए जरूरी दवाओं की एक जैसी सूची तैयार कर डाली है। यही वजह है कि काला मोतिया या रक्तचाप जैसी साधारण बीमारियों के उपचार में काम आने वाली दवाएं डब्ल्यूएचओ की सूची से बाहर हैं और पेटेंट वाली महंगी दवाओं की भरमार है। याद रहे, पेटेंट से बाहर हो चुकी दवाएं बनाने में बेहद कम खर्च आता है। ऐसी दवाओं को जेनेरिक दवाएं कहते हैं और गुणवत्ता में ये मूल दवाओं जैसी ही होती हैं। दवा मूल्य नियंत्रण के नाम पर की जा रही नौटंकी की असलियत इसी बात से समझी जा सकती है कि सरकारी नियंत्रण वाली चौहत्तर दवाओं में से तीस का उत्पादन दवा कंपनियों ने अरसे से बंद कर रखा है।
सरकार ने 1997 में दवाओं के मूल्य नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय दवा मूल्य प्राधिकरण (एनपीपीए) का गठन किया था, लेकिन यह खोखला अकुंश दवा कंपनियों को बडेÞ पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली दवाओं का उत्पादन करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। एनपीपीए मूल्य से अधिक कीमत पर दवाओं की बिक्री रोकने में विफल रहा है। बीते एक दशक से ज्यादा समय के दौरान एनपीपीए मूल्य से अधिक कीमत पर दवा बेचने के आठ सौ बारह मामलों में से महज आठ फीसद का ही जुर्माना वसूल पाया है। 
कहने की जरूरत नहीं कि तीन सौ चौवन जरूरी दवाओं (जिनमें से कई भारत में अप्रासंगिक हैं) के मूल्य पर नियंत्रण रखने का सरकारी फैसला दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं है, क्योंकि फैसला लागू होते ही दवा कंपनियां बढ़ती लागत का हवाला देकर इस सूची में शामिल दवाओं का उत्पादन बंद कर देंगी। 2003 से लेकर अब तक उच्चतम न्यायालय कई मर्तबा सरकार को जरूरी दवाओं के दाम नियंत्रित रखने की चेतावनी दे चुका है, मगर हर बार नियमों का रुख दवा कंपनियों की तिजोरी की ओर मोड़ दिया जाता है।
यूपीए सरकार की नई दवा मूल्य-नियंत्रण नीति में भी ऐसा ही एक खतरनाक प्रावधान बाजार आधारित मूल्य (एमबीपी) प्रणाली के रूप में किया गया है। एमबीपी प्रणाली में बाजार में सबसे ज्यादा बिकने वाले चोटी के तीन दवा ब्रांडों के साझा औसत मूल्य के आधार पर दवाओं की कीमतों का एक पैमाना तय किया जाएगा। इस पैमाने के आधार पर बाकी दवाओं की न्यूनतम कीमत तय कर दी जाएगी। नई दवा नीति की यह सबसे बड़ी खामी है। दूसरी उपभोक्ता वस्तुओं के विपरीत, दवाओं के मामले में ब्रांड और किस्म चिकित्सक तय करता है। दवा कंपनियों से मिलने वाली मोटी रकम के चलते चिकित्सक महंगे ब्रांडों की दवाएं लिखते हैं।
आमतौर पर सबसे ज्यादा बिकने वाली दवाएं सबसे महंगी भी होती हैं। जाहिर है, एमबीपी प्रणाली के तहत आने वाली दवाएं बेहद महंगी होने के कारण उनका साझा औसत मूल्य भी ऊंचा ही होगा। ऐसे में सस्ती जेनेरिक दवा कंपनियां भी सरकार के तय किए गए मूल्य का फायदा उठाने के लिए अपनी दवाओं की कीमतों में भारी इजाफा करेंगी।
सवाल उठता है कि सरकार ने दवा-कीमतों का न्यूनतम पैमाना तय करने के लिए सबसे ज्यादा बिकने वाले चोटी के तीन ब्रांडों का ही चयन क्यों किया है? अगर नई नीति का मकसद सस्ती दवाएं मुहैया


कराना है तो दवाओं की न्यूनतम कीमत मंजूर करने के लिए सबसे ज्यादा बिकने वाली दस सस्ती जेनेरिक दवाओं को आधार बनाया जाना चाहिए था। 
साफ है कि दवा कंपनियों के दबाव में नौकरशाहों ने दवा मूल्य नियंत्रण की आड़ लेकर एमबीपी के रूप   में नया फार्मूला गढ़ा है। बडेÞ पैमाने पर दवाओं के लिए एकसमान मूल्य तय करने के दूसरे खतरे भी हैं। मसलन, कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों की दवाएं चुनिंदा कंपनियां ही बनाती हैं। 
मुनाफा कम होने की आशंका के चलते दवा कंपनियां खास दवाओं का निर्माण बंद करके अपनी क्षमता का इस्तेमाल ज्यादा मुनाफे वाली दवाओं के उत्पादन में कर सकती हैं।  दवाओं के मूल्य पर नियंत्रण रखने की हमारी नीति पूरी तरह दिशाहीन हो चुकी है। जरूरी दवाओं के दाम आसमान छूते जा रहे हैं, वहीं सेक्स-क्षमता और शारीरिक बदलावों से जुड़ी दवाएं भ्रामक प्रचार के सहारे पूरे बाजार पर कब्जा कर चुकी हैं। मूल्य नियंत्रण के सरकारी आदेश दवाओं के लागत-मूल्य के बजाय बाजार-मूल्य के आधार पर दवा कीमतें तय करते हैं। 
दवाओं के वितरण और खुदरा बाजार में सरकार का दखल नहीं के बराबर है। अचरज नहीं होना चाहिए कि दस रुपए लागत वाली खांसी की दवा बाजार में सौ रुपए में बेची जाती है और हमारी सरकार सौ रुपए को आधार मान कर इस दवा की न्यूनतम कीमत तय करती है। कोई दवा जैसे ही मूल्य-नियंत्रण के दायरे में आती है, दवा कंपनियां चिकित्सकों को उसी श्रेणी की दूसरी दवा लिखने को कह देती हैं।
दवाओं की लागत और बाजार-मूल्य के बीच पचास से अस्सी फीसद का फासला है और दवाओं के मामले में दुनिया में सबसे ज्यादा मुनाफा हमारे देश में ही कमाया जाता है। दवाओं की बढ़ती कीमतों पर मुहर लगाने की व्यवस्था भी सरकार ने कर रखी है। वास्तविक लागत पर ध्यान दिए बिना सरकार ने दवा मूल्य नियंत्रण कानून के दायरे से बाहर रहने वाली दवाओं की कीमतों में भी सालाना दस फीसद बढ़ोतरी की छूट दे रखी है। दवा कंपनियों की लूट पर सरकारी मोहर का यह दूसरा नमूना है, क्योंकि दवा कंपनियां हर साल बढ़ती महंगाई का वास्ता देकर दवाओं की कीमतें दस फीसद बढ़ा देती हैं। 
मंदी के बावजूद दवा कंपनियों के मुनाफे का मार्जिन 2008-09 के 6.91 फीसद से बढ़ कर 2010-11 में 13.16 फीसद हो गया है। नई नीति के मसविदे के मुताबिक तीन रुपए से कम औसत मूल्य वाली दवाओं की कीमत पर सरकार कोई नियंत्रण नहीं रखेगी। ऐसे में तनाव, मधुमेह और अपच जैसी बीमारियों से जुड़ी कई दवाएं मूल्य नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी। लिहाजा, सरकार उच्चतम न्यायालय में सभी जरूरी दवाएं प्रस्तावित नीति के दायरे में होने का दावा करके न्यायालय और देश की जनता को भ्रम में रखने की कोशिश कर रही है।
एक ओर सरकार दवाओं की कीमतों पर लगाम कसने की बात कहती है वहीं गरीबों को मुहैया कराई जाने वाली मुफ्त दवाओं की आपूर्ति साल-दर-साल कम होती जा रही है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक अस्पतालों में मुफ्त दवा वितरण 1986-87 के 31.20 फीसद से गिर कर 2004 में 12.11 फीसद रह गया है। मूल्य-नियंत्रण कवायद के जरिए गरीबों को सस्ती दवाएं मुहैया कराने का वादा आधा सच है, क्योंकि देश की सत्तर फीसद आबादी दवाओं की कोई भी कीमत नहीं चुका सकती, या दूसरे शब्दों में, उन लोगों को मुफ्त दवाओं की जरूरत है। 
अर्थशास्त्री एके शिवकुमार का कहना है कि देश की एक चौथाई आबादी के पास किसी भी तरह की चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। सरकार अगर वाकई गरीबों का भला करना चाहती है तो पूरे स्वास्थ्य-क्षेत्र में आमूलचूल सुधार करने होंगे, महज दवाएं उपलब्ध करा देने से राहत मिलने वाली नहीं है।  
कहा जा रहा है कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने 2020 तक स्वास्थ्य क्षेत्र पर जीडीपी का तीन फीसद खर्च करने का फैसला किया है। हालांकि इस फैसले से विशाल आबादी वाले हमारे देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला है, मगर लोग जिंदा रहने के लिए पहले से थोड़ा बेहतर संघर्ष कर पाएंगे। भारत की हालत स्वास्थ्य के मोर्चे पर बेहद दयनीय है। हमारी अस्सी फीसद आबादी स्वास्थ्य बीमा के दायरे से बाहर है और इसी दिशा में पहल करने की जरूरत है। 
हमारे देश में एक मरीज अपने चिकित्सा-खर्च का इकहत्तर फीसद दवाओं पर खर्च करता है। निजी कंपनियों के कंधे पर बंदूक रख कर निशाना साधने के बजाय सरकार को बीमार पड़ी सरकारी दवा कंपनियों में शोध और विकास पर निवेश करना होगा। सस्ती दरों पर उत्पादित दवाओं को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और जन औषधि केंद्रों के जरिए आम जनता तक पहुंचाया जा सकता है। 
केरल और तमिलनाडु में यह तरीका सफलतापूर्वक आजमाया जा चुका है। दवा उत्पादन, भंडारण और वितरण से स्वास्थ्य क्षेत्र की एक बड़ी बीमारी दूर हो जाएगी। दुनिया में सबसे ज्यादा नर्स और चिकित्सक हर साल भारत से निकलते हैं, लेकिन गलत प्राथमिकताओं के चलते देश के नागरिक चिकित्सा के बुनियादी अधिकार से महरूम हैं। हमारे नीति-निर्धारक भूल जाते हैं कि अमेरिका में स्वास्थ्य के मुद््दे पर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा जाता है और ब्रिटेन में हरेक नागरिक सरकारी खर्च पर स्वास्थ्य सुविधाएं हासिल करता है।

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