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Monday, February 4, 2013

संघी समर्थन से जारी अध्यादेश से समझ लें कि क्या कयामत आने वाली है!

संघी समर्थन से जारी अध्यादेश से समझ लें कि क्या कयामत आने वाली है!

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की तैयारी और राममंदिर बनाने के संकल्प के साथ संघ परिवार ने कांग्रेस को उग्रतम हिंदुत्व के रास्ते ार्थिक सुधार के ्श्वमेध यज्ञ को तेज करने के लिे मजबूर कर दिया है।नरेंद्र मोदी ही संघ परिवार की ओर से भावी प्रधानमंत्रित्व का चेहरा होंगे, इस बारे में कोई शक की गुंजाइश है नहीं। मोदी के मुकाबले ​​युवराज राहुल गाधी की जीत पक्की करने के लिए भाजपा से  भी ज्यादा उग्र हिंदुत्व का विकल्प चुनने के अलावा कांग्रेस के पास कोई ​​विकल्प नहीं है। मोदी को ग्लोबल हिंदुत्व और वैश्विक कारपोरेट युद्धक व्यवस्था का पूरा समर्थन है। आर्थिक सुधारों के प्रति संघ परिवार ने अपनी प्रतिबद्धता दोहरा दी है, इसके मद्देनजर कारपोरेट संघी राज को टालने के लिए जनसंहार की नीतियों को लागू करने में और ज्यादा निर्मम होने के अलावा कोई चारा नहीं है। दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के बहाने जो उग्रतम धर्म राष्ट्रवाद का आवाहन हुआ, उसकी पहली कामयाबी तो पदोन्नति में आरक्षण को टालना रहा, जो वर्चस्ववादी मनुस्मृति शासन के लिए अनिवार्य था। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सत्ता वर्ग के युवा आक्रोश का जो महिमामंडन राष्ट्रपति, धर्म राष्ट्रवाद आधारित सैन्य राष्ट्र के प्रमुख धर्माधिकारी चंडी पुजारी प्रणव मुखर्जी ने किया, उसीको आज महिलाओं पर अत्याचार रोकने के बहाने तुरत फुरत वर्मा आयोग की विशेष सैन्य कानून संबंधी और बलात्कारी राजनेताओं पर पाबंदी संबंधी सिफारिशों ​​को कचरा पेटी में डालकर यौन अपराध विरोधी कानूनों में बदलावों को प्रभावी बनाने के लिए आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश-2०13 को रविवार को अपनी मंजूरी देते हुए बखूबी अंजाम तक पहुंचाया। कल शाम सरकार ने महिला संगठनों की आपत्ति के मद्देनजर इस अध्यादेश पर जो पुनर्विचार का इरादा जताया था, वह संघी खुला समर्थन और अन्ना ब्रिगेड की तरफ से किरण बेदी के स्वागत वक्तव्य से एकदम बदल गया। एक ओर​​ राष्ट्रपति ने अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए इस विधेयक पर दस्तखत किये तो दूसरी ओर ओड़ीशा में पारादीप में पास्को के इस्पात कारखाने के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण शुरु हो गया। खबर आयी कि वालमार्ट ने भारतीय खुदरा बाजार पर कब्जा करने के लिए अमेरिका में लाबिंग तेज कर दी। जयपुर कारपोरेट साहित्य उत्सव में आशीष नंदी ने जो ओबीसी और अनुसूचितों के खिलाफ आरक्षणविरोधी वक्तव्य दिया, उसको इसी श्रृंखला की कड़ी मानकर देखे तो समझ में आयेगा कि क्या कयामत आने वाली है!महाकुंभ में संतों की पीएम पद के लिए मोदी की लॉबीइंग से नाराज जद-यू को भाजपा ने करारा जवाब दिया है। भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने जद-यू पर पलटवार करते हुए कहा है कि अगर भाजपा और संत समाज देश का पीएम तय नहीं करेंगे तो क्या आतंकी हाफिज सईद करेगा।

यौन हिंसा संबंधी अध्यादेश को लेकर आलोचना का सामना कर रही सरकार ने अब अपने बचाव में कहा है कि अध्यादेश में सुझाए गए प्रावधानों पर सर्वसम्मति नहीं बन पाई है और आने वाले संसद सत्र में सभी पार्टियों के साथ इस पर चर्चा की जाएगी। केंद्रीय कैबिनेट द्वारा मंज़ूर किए गए इस अध्यादेश पर हाल ही में राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे. कई महिला संगठनों ने राष्ट्रपति से आग्रह किया था कि वे इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करें क्योंकि इसमें जस्टिस वर्मा आयोग की सिफ़ारिशों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है।वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि न्यायमूर्ति वर्मा समिति की कोई सिफारिश अस्वीकृत नहीं की गई है। चिदंबरम ने महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा पर अध्यादेश लाने का फैसला सही ठहराते हुए कहा कि इस तरह का कानून जल्द से जल्द लाने की सार्वभौमिक मांग के मद्देनजर ही यह कदम उठाया गया। सरकार ने कहा कि यह अध्यादेश ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहमति के फलस्वरूप आया है। चिदंबरम ने कहा कि अध्यादेश अपराधियों के लिए निवारक का काम करेगा।


महिला संगठनों के एतराज के बावजूद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने महिला सुरक्षा से जुड़े अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ये अध्याधेश तत्काल प्रभाव में आ जाएगा और सरकार को इसी महीने शुरु हो रहे बजट सत्र में इसे संसद में पारित कराकर कानून का रूप देना होगा। अध्यादेश में महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध के मामलों में मौत की सजा तक का प्रावधान है।बलात्कारी के लिए मौत की सजा की मांग क्या पूरी हो पाएगी, क्या देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर लगाम कस पाएगी, पिछले कुछ दिनों से देश भर में गूंज रहे इन सवालों के जवाब 21 फरवरी से शुरु होने जा रहे संसद के बजट सत्र में तलाशे जाएंगे। दरअसल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने महिला सुरक्षा से जुड़े अध्यादेश को मंज़ूरी दे दी है। इस अध्यादेश में महिला के खिलाफ जघन्य यौन अपराध के मामले में सज़ा-ए-मौत की सिफारिश है।दिल्ली गैंगरेप कांड के बाद लोगों ने डेढ़ महीने तक सरकार को हिलाकर रखा। यही वजह थी कि सरकार ने 1 फरवरी को आनन फानन में कैबिनेट की बैठक बुलाकर अध्यादेश को मंजूरी दे दी। सरकार इस संजीदा मसले पर ढिलाई नहीं देना चाहती हैं।महिला अध्यादेश को राष्ट्रपति का हस्ताक्षर करना कानून बनाने की दिशा में पहला कदम है। अध्यादेश को कानून में बदलने के लिए सरकार के पास बजट सत्र के पहले चरण की मियाद यानी 22 मार्च तक का वक्त है।महिला संगठनों के साथ वाम दलों जैसी कुछ सियासी पार्टियां भी महिला सुरक्षा से जुड़े अध्यादेश पर एतराज जता चुकी हैं। उनका कहना है कि अध्यादेश में जस्टिस वर्मा कमेटी की कई सिफारिशों को नहीं माना गया है। इनमें वैवाहिक बलात्कार और वर्दीधारियों के हाथों बलात्कार को कानून के दायरे में लाने की मांग खास है।लेफ्ट की आपत्ति संसद में बहस के बगैर अध्यादेश जारी करने को लेकर भी है। लेकिन हाल ही में प्रधानमंत्री ने खत लिखकर जस्टिस वर्मा को भरोसा दिलाया था कि उनकी रिपोर्ट को जल्द अमलीजामा पहनाया जाएगा। अध्यादेश जारी होने के अगले ही दिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने दिल्ली गैंगरेप पीड़ित के परिवार वालों से मिलकर सरकार की संजीदगी को जाहिर किया था।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को भाजपा का 'स्थायी मुद्दा' बताते हुए पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने आज इस बात से इंकार किया कि उनका दल आगामी आम चुनावों में सियासी फायदे के लिये इस मसले को फिर गरमाने की कोशिश कर रहा है।मिश्र ने इंदौर में संवाददाताओं से कहा, 'अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण भाजपा की प्रतिबद्धता है। यह हमारा चुनावी विषय नहीं, बल्कि स्थायी मुद्दा है। यह पूरे राष्ट्र का मुद्दा है। यह मुद्दा तब तक जीवंत बना रहेगा, जब तक अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर नहीं बन जाता।' भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने जोर देकर कहा, 'जब तक अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर नहीं बन जाता, तब तक हम चैन की सांस नहीं लेंगे।' मिश्र ने 'हिंदू आतंकवाद' को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के बयान पर जोरदार विरोध जताया और उनके इस विवादास्पद कथन को 'भारतीयता पर हमला' और 'देशद्रोह का कृत्य' बताया।  इसीके मध्य प्रधानमंत्री पद के राजग उम्मीदवार के रूप में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर बार-बार होने वाली चर्चा को समाप्त करने की पहल करते हुए भाजपा अध्यक्ष राजनाथसिंह ने पार्टी कार्यकर्ताओं को इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं देने की नसीहत दी और सहयोगी जदयू ने भी ऐसे ही विचार व्यक्त किए, लेकिन भाजपा नेता सीपी ठाकुर और शत्रुघ्न सिन्हा इसका उल्लंघन करते दिखे। मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए राजग का उम्मीदवार घोषित करने के मुद्दे पर राजग में एकमत नहीं होने से चिंतित भाजपा अध्यक्ष राजनाथसिंह ने पार्टी नेताओं से अंतिम अपील में इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं देने को कहा।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने यौन अपराध विरोधी कानूनों में बदलावों को प्रभावी बनाने के लिए आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश-2०13 को रविवार को अपनी मंजूरी दे दी। यह अध्यादेश न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की रपट पर ज्यादातर आधारित है, और इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को मंजूरी दे दी थी।इस अध्यादेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में जघन्य अपराध के लिए मृत्युदंड सहित दंड बढ़ाए जाने के प्रस्ताव हैं। इन अपराधों में दुष्कर्म, तेजाब हमले, ताकझांक और तस्करी शामिल हैं। महिला संगठनों ने अध्यादेश के खिलाफ सोमवार को जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की योजना बनाई है।महिला संगठनों का मानना है कि महिला अपराधों से निपटने के लिहाज से यह अध्यादेश दंतविहीन है और संगठनों ने राष्ट्रपति से आग्रह किया था कि वह इस पर हस्ताक्षर न करें।तो दूसरी ओर,गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बीजेपी अपने प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश करने वाली है। सूत्रों के मुताबिक इलाहाबाद के महाकुंभ में 7 फरवरी को साधु संतों के जरिए इस मांग को उठाया जा सकता है। इसके बाद जल्द ही बीजेपी मोदी के नाम का ऐलान भी कर सकती है। भाजपा पर नरेन्द्र मोदी को अगले चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने के लिए संघ परिवार की ओर से दबाव डाला जा रहा है। विश्व हिन्दू परिषद ने इस पद के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा करने की मांग की है। बहरहाल, जदयू जैसे राजग के घटक दलों ने संकेत दिया है कि मोदी का नाम उन्हें स्वीकार्य नहीं है। पिछले हफ्ते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं भाजपा के शीर्ष नेताओं से मुलाकात के बाद विहिप नेता अशोक सिंघल ने आज खुलकर कहा कि पार्टी को मोदी का नाम प्रधानमंत्री प्रत्याशी के लिए घोषित कर देना चाहिए। गुरुवार को बीजेपी और आरएसएस के दिग्गज नेताओं के बीच बैठक हुई थी। अब तक हवा में यही खबर तैर रही थी कि 2014 चुनावों के लिए बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे पर वापस लौट रही है। लेकिन उसका सारथी कौन होगा इसका जवाब कहीं से नहीं मिल रहा था। बीजेपी के ही कई नेता ये भी इशारा कर रहे हैं कि मोदी के नाम का ऐलान जल्द ही हो सकता है।मोदी की खबर से जेडीयू में बेचैनी बढ़ती नजर आईं। एक तरफ जहां जेडीयू के अध्यक्ष शरद यादव कह रहे हैं कि पीएम उम्मीदवार पर एनडीए फैसला करेगा वहीं जेडीयू के ही देवेश चंद्र ठाकुर का कहना कि नाम तय होने से पहले एनडीए की बैठक हो। मोदी के नाम की राह में सबसे बड़ा रोडा एनडीए सहयोगी जेडीयू ही है। नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के पक्ष में कभी नहीं रहे।बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने कहा है कि सहयोगी आते और जाते रहते हैं। उधर एनडीए की ही एक और सहयोगी अकाली दल ने साफ कर दिया है कि बीजेपी का जो भी फैसला होगा उसे उनका समर्थन होगा। दो दिन पहले तक शिवसेना बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर सुषमा स्वराज के नाम की रट लगाए हुई थी। लेकिन अब मोदी के सवाल पर उसका कोई भी नेता कैमरे पर आने के लिए तैयार नहीं है। शिवसेना का कहना है कि पहले बीजेपी बैठक कर नाम तय करे, फिर वो कुछ कहेंगे।

मनमोहन सरकार का कार्यकाल भले 2014 तक हो। लेकिन समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह ने चुनाव की डेडलाइन तय कर दी है। सोमवार को लखनऊ में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में मुलायम ने कहा कि सितंबर में चुनाव हो सकते हैं। लिहाजा कार्यकर्ता जुट जाएं। मुलायम ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार चार सालों तक जन विरोधी नीतियां लागू करती रही है। लेकिन अब बजट का मौके पर वो चालाकी दिखा सकती है।मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि केन्द्र सरकार कोई भी चालाकी कर सकती है। चार वर्ष तक जन विरोधी नीतियों के जरिए देश को बर्बाद करने के बाद, चुनावी वर्ष के आम बजट में वो तथाकथित जनहित बजट के नाम पर जनता को गुमराह करने की रणनीति अपनाएगी। इससे आम जनता को सावधान रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि दिल्ली में गैंगरेप की शिकार युवती की मौत से ध्यान हटाने के लिये केन्द्र की सरकार मुद्दे से भटकाकर जनता को भ्रमित कर रही है। बलात्कार की घटनाएं राष्ट्रीय शर्म की बात है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव सितम्बर तक कभी भी हो सकते हैं। सच्चाई जनता के सामने आनी चाहिए।

आशीष नंदी की गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक,बीबीसी  रपट

सुप्रीम कोर्ट ने प्रसिद्ध समाजशास्त्री आशीष नंदी की गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी है.

इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने आशीष नंदी को सलाह दी है कि उन्हें उस तरह की टिप्पणियों से बचना चाहिए जैसी कि उन्होंने जयपुर साहित्य महोत्सव के दौरान की थी.


छिहत्तर साल के आशीष नंदी के ख़िलाफ़ अनुसुचित जाति/जनजाति क़ानून के तहत जयपुर में पुलिस ने मुक़दमा दर्ज किया था.

इसी तरह का मुक़दमा साहित्य महोत्सव के आयोजनकर्ता संजॉय रॉय के ख़िलाफ़ भी दर्ज किया गया था.

'संभलकर बोलूंगा'

"मैं सावधानी से बात करूंगा और जो भी बोलना होगा वो हिंदुस्तान से बाहर और घर के भीतर बोलूंगा"
आशीष नंदी

आशीष नंदी ने अदालत के फ़ैसले का स्वागत किया और कहा कि इसके लिए वो कोर्ट और अपने क़ानूनी सलाहकारों के शुक्रगुज़ार हैं.

जब उनसे अदालत की उन्हें दी गई सलाह के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "मैं सावधानी से बात करूंगा और जो भी बोलना होगा वो हिंदुस्तान से बाहर और घर के भीतर बोलूंगा."

सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अपने बयान को लेकर सावधान रहने की सलाह दी है.

उन्होंने इस मामले पर और अधिक कुछ कहने से इनकार किया और कहा कि ये मामला अदालत के विचाराधीन है इसलिए वे इस पर कुछ नहीं कहेंगे.

जब नंदी से कमल हासन और फ़िल्म विश्वरूपम पर जारी विवाद के बार में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये ग़लत है.

उन्होंने कहा, "ये फ़िल्म जो कुछ अफ़ग़ानिस्तान में हो रहा है उसके बारे में है, इसका हिंदुस्तान से ताल्लुक़ नहीं, इसलिए मैं मुस्लिम भाईयों से अनुरोध करना चाहता हूं कि वो इसे लेकर उत्तेजित न हों."

अपील

नंदी के अपने वकील अमन लेखी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि वो उनके ख़िलाफ़ दर्ज प्राथिमिकी यानी एफआईआर को रद्द करने का निर्देश जारी करे.

मुख्य न्यायाधीश अलतमस कबीर की एक खंडपीठ ने सुनवाई की तारीख़ शुक्रवार को तय की थी.

जयपुर साहित्य महोत्सव के दौरान बोलते हुए आशीष नंदी ने भ्रष्टाचार और दलितों पर अपने बयान को कुछ इस ढंग से पेश किया था कि कुछ लोगों को लगा था कि वो कह रहे हैं कि भ्रष्ट्राचार के मामलों में सबसे अधिक दलित ही शामिल होते हैं.

2009-11 में रेप के 68000 केस, सिर्फ 16000 दोषी

देश में वर्ष 2009-11 के दौरान बलात्कार के लगभग 68 हजार मामले दर्ज किए गए लेकिन इनमें से सिर्फ 16 हजार बलात्कारियों को कैद की सजा मिली।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2011 के दौरान देश भर में बलात्कार के 24 हजार 206 मामले दर्ज हुए, लेकिन मात्र पांच हजार 724 लोगों को दोषी ठहराया जा सका।

वर्ष 2010 में देश भर में बलात्कार के 22 हजार 172 मामले दर्ज हुए, लेकिन मात्र पांच हजार 632 लोगों का दोष साबित हो पाया। वहीं वर्ष 2009 में देश भर में बलात्कार के 21 हजार 397 मामले दर्ज हुए, लेकिन मात्र पांच हजार 316 लोगों को दोषी ठहराया गया।

इस अवधि में (2009-11) बलात्कार के सबसे अधिक नौ हजार 539 मामले मध्य प्रदेश में दर्ज किए गए लेकिन इस दौरान सिर्फ दो हजार 986 लोगों का दोष साबित हो पाया।

वर्ष 2009-11 के दौरान पश्चिम बंगाल में बलात्कार के सात हजार 10 मामले दर्ज हुए लेकिन सिर्फ 381 लोगों को दोषी ठहराया गया।

उत्तर प्रदेश में इस अवधि के दौरान बलात्कार के पांच हजार 364 मामले दर्ज हुए और तीन हजार 816 लोगों का दोष साबित हो पाया।

असम में इस अवधि के दौरान बलात्कार के पांच हजार 52 मामले दर्ज हुए लेकिन सिर्फ 517 लोगों को दोषी ठहराया गया।
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया, 'दोष साबित होने की दर इतनी खराब होने की प्राथमिक वजह अपर्याप्त पुलिस जांच के बाद अभियोजन पक्ष की ओर से पर्याप्त सबूत जुटा पाने की अक्षमता है।'

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009-11 के दौरान छेड़खानी के एक लाख 22 हजार 292 मामले दर्ज हुए, लेकिन इनमें से सिर्फ 27 हजार 408 लोगों का दोष साबित हो पाया।

इस अवधि में मध्य प्रदेश में छेड़खानी के कुल 19 हजार 618 मामले दर्ज हुए, लेकिन सिर्फ छह हजार 91 लोगों को दोषी ठहराया जा सका। महाराष्ट्र में छेड़खानी के कुल 10 हजार 651 मामले दर्ज हुए, लेकिन सिर्फ छह 595 लोगों का दोष साबित हो पाया।

उत्तर प्रदेश में छेड़खानी के कुल नौ हजार 30 मामले दर्ज हुए और सात हजार 958 लोगों का दोष साबित हुआ। वहीं केरल में छेड़खानी के कुल नौ हजार 232 मामले दर्ज हुए, लेकिन सिर्फ 718 लोगों का दोष साबित हो पाया।

रेप पीड़िता की मौत पर मृत्युदंड-चिदंबरम

बलात्कार पीड़िता के जख्मी होने और फिर मौत होने या कोमा जैसी स्थिति में पहुंचने के मामलों में बलात्कारी को सजा-ए-मौत सुनाई जा सकती है। बलात्कार निरोधक कानूनों को अधिक कठोर बनाने के लिए लाए गए अध्यादेश में यह प्रावधान किया गया है।

आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 में अलगाव के दौरान किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के साथ की गई यौन हिंसा के लिए भी दंड बढ़ाया गया है और अब इस अपराध के लिए सात साल तक की कैद हो सकती है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने रविवार को ही इस अध्यादेश को मंजूरी दी है।

अध्यादेश की जानकारी देते हुए वित्तमंत्री पी चिदंबरम और सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने बताया कि धारा-376 (बलात्कार) की उपधारा-1 या उपधारा-2 के तहत दंडनीय अपराध करने वाले व्यक्ति, जिसके अपराध के फलस्वरूप कोई जख्मी होता है और बाद में उसकी मौत हो जाती है या फिर वह कोमा जैसी स्थिति में पहुंचता है तो उसे कड़े कारावास की सजा होगी।

यह सजा 20 साल से कम नहीं होगी, लेकिन इसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है यानी उसके स्वाभाविक जीवन के शेष बचे हिस्से के दौरान उसे कारावास में ही रहना होगा या फिर उसे सजा-ए-मौत हो सकती है।

ऐसे मामलों में जहां किसी व्यक्ति के साथ एक या अधिक लोग यौन हिंसा करते हैं तो हर अपराधी को कम से कम 20 साल के कड़े कारावास की सजा हो सकती है। इसे बढ़ाकर आजीवन कारावास भी किया जा सकता है यानी उसके शेष बचे जीवन के हिस्से के दौरान उसे जेल में रहना होगा और पीड़िता को मुआवजा भी देना होगा।

अध्यादेश के मुताबिक तेजाब फेंकने से यदि किसी को स्थाई या अस्थाई नुकसान पहुंचता है या वह गंभीर रूप से जख्मी होता है तो ऐसे अपराध के लिए अपराधी को कम से कम दस साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा हो सकती है। इसके अलावा इस अपराध के लिए उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है, जो अधिकतम दस लाख रुपए हो सकता है।

इस मुद्दे पर आज मीडिया संबंधी मंत्री समूह की बैठक में चर्चा हुई, जिसके अध्यक्ष चिदंबरम हैं। यौन हिंसा का अपराध बार-बार करने वाले को आजवीन कारावास होगा। इसका मतलब है कि उसे स्वाभाविक जीवन का शेष हिस्सा जेल में गुजारना पड़ सकता है या फिर उसे मौत की सजा हो सकती है।

यदि कोई पुलिस अधिकारी या सरकारी कर्मचारी या सशस्त्र सेनाओं का कोई कर्मी यौन हिंसा का दोषी पाया जाता है तो उसे कम से कम दस साल के सश्रम कारावास की सजा मिलेगी। इस सजा को आजीवन कारावास में तब्दील भी किया जा सकता है। इस अपराध के लिए जुर्माने का भी प्रावधान है।

किसी का पीछा करना, गलत नीयत से घूरना या महिलाओं के प्रति अन्य किस्म के अपराधों के लिए भी दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं। अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन अनुग्रह या मांग या इस इरादे से किसी की ओर बढ़ना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है और इसके लिए पांच साल की कैद या जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है।

अश्लील टिप्पणी या अश्लील फिल्म दिखाना, मौखिक या गैर मौखिक रूप से कोई यौन दुराचरण करने की स्थिति में सजा का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर एक साल किया जा सकता है या जुर्माना भी हो सकता है या फिर दोनों का प्रावधान है।

गलत नीयत से किसी को घूरने की स्थिति में कम से कम एक साल की कैद का प्रावधान है जिसे तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है। ऐसे मामलों में पहली बार अपराध के लिए जुर्माना किया जाएगा। दूसरी बार या इसके बाद कई बार इस तरह का अपराध करने की स्थिति में सात साल का कारावास हो सकता है और जुर्माना लगाया जाएगा।

पीछा करने के लिए कम से कम एक साल के कारावास का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर तीन साल किया जा सकता है और ऐसे मामलों में दोषी को जुर्माना भी देना होगा। नाबालिग की तस्करी में यदि कोई व्यक्ति एक से अधिक बार दोषी पाया जाता है तो ऐसे अपराध के लिए कम से कम 14 साल और अधिकतम आजीवन कारावास की सजा होगी।

मानव तस्करी कर लाए गए किसी बच्चे को रोजगार देने वाले को कम से कम पांच साल की सजा का प्रावधान किया गया है। इसे बढ़ाकर सात साल किया जा सकता है और इसमें जुर्माने का भी प्रावधान है। एक से अधिक व्यक्ति की तस्करी करने वाले को कम से कम दस साल का कारावास हो सकता है, जिसे बढ़ाकर आजीवन कारावास किया जा सकता है।

इस अपराध के लिए जुर्माने का भी प्रावधान होगा। मानव तस्करी में लिप्त होने के दोषी पाए गए सरकारी कर्मचारी या पुलिस अधिकारी के लिए अध्यादेश में आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है।

नाबालिग की परिभाषा फिर होगी तय, एक्‍ट की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय कानून में 'किशोर' की परिभाषा की सांविधानिक वैधता के सवाल पर गौर करने का निश्चय किया है। इसमें अपराध की संगीनता के बावजूद 18 साल से चंद सप्ताह कम आयु का होने पर भी ऐसे अपराधी को नाबालिग ही माना गया है।

न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने कहा कि हम इस मामले पर गौर करेंगे क्योंकि यह आयु निर्धारण से संबंधित है। न्यायाधीशों ने कहा कि यह कानून का सवाल है और गंभीर अपराध में आरोपी पर बालिग के रूप में मुकदमा चलाने का निर्णय करते समय उसकी आयु के निर्धारण का अपराध की गंभीरता से कुछ तो तालमेल होना चाहिए। न्यायालय ने इसके साथ ही इस मामले में उठाए गए मसलों पर विचार के लिए अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती से सहयोग करने का आग्रह किया है। इस याचिका में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून में प्रदत्त किशोर की परिभाषा को निरस्त करने का भी अनुरोध किया गया है।

न्यायालय ने अटार्नी जनरल को इस मामले में विधि मंत्रालय और गृह मंत्रालय की ओर से हलफनामा तथा संबंधित रिपोर्ट 29 मार्च तक दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले में अब तीन अप्रैल को आगे सुनवाई होगी। यह याचिका कमल कुमार पांडे और सुकुमार नाम के वकीलों ने दायर की है। याचिका में किशोर न्याय कानून की धारा 2 (एल), धारा 10 और 17 के प्रावधानों के तर्कहीन, मनमाना और असंवैधानिक होने का दावा किया गया है। अटार्नी जनरल ने कहा कि न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति की रिपोर्ट ने सभी बिंदुओं पर गौर किया है लेकिन उसने किशोर का वर्गीकरण करने के लिए उसकी उम्र कम करने की सिफारिश करने से परहेज किया है। इस पर न्यायाधीशों ने कहा कि वे न्यायमूर्ति वर्मा समिति की रिपोर्ट पर गौर नहीं करेंगे क्योंकि उसके समक्ष शुद्ध रूप से कानून का मसला था।

अटार्नी जनरल वाहनवती ने कहा कि केन्द्र सरकार इस मामले में न्यायालय के साथ सहयोग के लिए तैयार है और राज्य सरकारों से भी इस विषय पर गौर करने के लिए कहा जा सकता था। उन्होंने कहा कि कुछ गैर सरकारी संगठन भी इस विषय पर काफी सक्रिय हैं। न्यायाधीशों ने इस पर कहा कि राज्यों की इसमें कोई भूमिका नहीं है और हम गैर सरकारी संगठनों को नहीं सुनेंगे। न्यायालय ने कहा कि चूंकि यह मामला आयु निर्धारण से संबंधित है और किशोर न्याय कानून अंतरराष्ट्रीय कंनवेन्शन पर आधारित है। ऐसे भी कई देश हैं, जिन्होंने किशोर की उम्र परिभाषित करने के इरादे से इसे 16 साल निर्धारित किया है तो कुछ ने 18 साल ही रखा है।

न्यायाधीशों ने कहा कि हम सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के संदर्भ में ही इस पर विचार कर रहे है। इससे पहले, जनहित याचिका में आरोपी व्यक्ति को 'किशोर' के रूप में वर्गीकृत करना विधि के विपरीत है और किशोर न्याय कानून में प्रदत्त संबंधित प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि इस कानून में प्रदत्त किशोर की परिभाषा कानून के प्रतिकूल है। उनका तर्क है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 82 और 83 में किशोर की परिभाषा में अधिक बेहतर वर्गीकरण है। धारा 82 के अनुसार सात साल से कम आयु के किसी बालक द्वारा किया गया कृत्य अपराध नहीं है जबकि धारा 83 के अनुसार सात साल से अधिक और 12 साल से कम आयु के ऐसे बच्चे द्वारा किया गया कोई भी कृत्य अपराध नहीं है जो किसी कृत्य को समझने या अपने आचरण के स्वरूप तथा परिणाम समझने के लिये परिपक्व नहीं हुआ है।

न्‍यायालय का यह निश्चय दिल्ली में पिछले साल 16 दिसंबर को 23 साल की लड़की से सामूहिक बलात्कार की घटना में शामिल छह आरोपियों में से एक के नाबालिग होने की बात सामने आने के बाद से अधिक महत्वपूर्ण है। इस वारदात के बाद से ही किशोर न्याय कानून के तहत किशोर की आयु का मामला चर्चा में है। वाहनवती ने कहा कि इस मसले पर गौर करते समय यह ध्यान रखना होगा कि यह किशोर के कृत्य का सवाल नहीं है बल्कि यह भी सोचना होगा कि उसने ऐसा क्यों किया और यह भी संबंधित तथ्य है कि समाज ने उसे विफल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि किशोर को वर्गीकृत करते समय उसकी उम्र सीमा कम करके 16 साल की जाये या फिर इसके 18 साल रखा जाये या इस मसले पर निर्णय का सवाल अदालत के विवेक पर छोड़ना होगा।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की वर्ष 2011 की रिपोर्ट के अपराध के आंकड़ों से पता चलता है कि 18 साल से कम आयु के किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में कुल मिलाकर करीब दो फीसदी का इजाफा हुआ है। यही नहीं, 2011 में किशोरों ने 33887 अपराध किये जिसमें से 4443 अपराध करने वाले किशोरों ने उच्चतर माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त की थी और 27577 किशोर अपराधी अपने परिवारों के साथ रह रहे थे जबकि सिर्फ 1924 किशोर ही बेघर थे।

याचिका के अनुसार इन किशोर अपराधियों में से लगभग दो तिहाई किशोर 16 से 18 आयु वर्ग के हैं। याचिका में कहा गया है कि 2010 की तुलना में 2011 में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

पॉस्को परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण, पुलिस-प्रदर्शनकारी भिड़े

ओड़िशा में पॉस्को की बहुप्रचारित इस्पात परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण का काम प्रशासन की एक साल से अधिक समय तक की चुप्पी के बाद आज पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प के बीच फिर शुरू हो गया।

दक्षिण कोरिया की इस्पात कंपनी पॉस्को की ओड़िशा के जगतसिंहपुर में 52,000 करोड़ रुपये की लागत से इस्पात परियोजना लगाना चाहती है। इसके लिए जमीन अधिग्रहण का एक साल से भी अधिक समय से ठप्प था।

अधिग्रहण प्रक्रिया कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शुरू हुई लेकिन इस दौरान हिंसा को लेकर दावे व प्रतिदावे किए गये हैं। आरोप है कि पुलिस ने परियोजना का विरोध कर रहे लोगों पर लाठियां चलाईं जिसमें कुछ गांव वाले घायल हो गए।

जिला कलेक्टर एस के मलिक ने कहा, ेपारादीप के निकट गोबिंदपुर में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई। पान की खेती करने वाले जो किसान जमीन देना चाहते हैं उनके जमीन के हस्तांतरण तक यह काम चलता रहेगा। े अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट सुरजीत दास ने कहा, ''जिन लोगों ने पहले ही सहमति दे दी है उनकी भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है।''
सूत्रों का कहना है कि पॉस्को परियोजना का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया जिसमें पुलिस प्रशासन के पांच वाहन क्षतिग्रस्त हो गए। उन्होंने कहा कि पुलिस ने गोबिंदपुर को जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए हैं। पुलिस ने गोबिंदपुर-धिनकिया सड़क को भी बंद कर दिया। पड़ोसी इरसामा, कुजांग तथा जगतसिंहपुर के लोग आगे की कार्रवाई के लिए इकट्ठे हो रहे हैं।

परियोजना के खिलाफ 2005 से आंदोलन चला रही पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जो अधिग्रहण टीम के गोबिंदपुर में प्रवेश का विरोध करने की कोशिश कर रहे थे। लाठीचार्ज में महिलाओं सहित छह लोग घायल हुए हैं। जबकि दास ने पुलिस बल के इस्तेमाल के आरोप का खंडन किया है।

दास ने कहा कि काम शांतिपूर्ण ढंग से चला और दावा किया कि घटना में किसी को चोट नहीं पहुंचे। बालीटिकिरा, गोबिंदपुर में पॉस्को परियोजना के विरोधी बीते 20 दिन से धरने पर बैठे हैं। उस इलाके में लगभग 400 पुलिसकर्मी तैनात हैं। भूमि अधिग्रहण के समय ओड़िशा औद्योगिक ढांचा निगम तथा पोस्को इंडिया के अधिकारी मौजूद थे।

स्विट्जरलैंड लाया नया 'सेफ हेवन'

मुल्क कोई हो, अमीर कोई हो, बात जब सेफ हेवन की आती है तो दिमाग में सबसे पहले स्विस बैंकों का नाम आता है। ऐसा माना जाता है कि दुनिया भर के अमीरों की काली कमाई स्विट्जरलैंड के बैंकों में सुरक्षित है। इस कमाई को रेग्युलेटरों और टैक्स अथॉरिटी की निगाहों से बचाने के लिए स्विस बैंकों ने अमीरों के सामने नई पेशकश की है। वह उनके लिए ऐसे खाते लाया है जिनमें सोने की छड़ें और ऊंची कीमत वाले स्विस फ्रैंक वाले नोट रखे जा सकते हैं।

हाल ही में दावोस में हुई वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की सालाना बैठक में मौजूद कई स्विस बैंकरों ने पहचान न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि इन गोल्ड अकाउंट्स और कैश वॉल्ट को दुनियाभर में मौजूद उनके क्लाइंट्स ने हाथोंहाथ लिया है। इसमें भारत के क्लाइंट भी शामिल हैं।

एक टॉप स्विस बैंकर के मुताबिक, इसके चलते कई बड़े बैंकों ने इन गोल्ड अकांउट्स और सुरक्षित डिपॉजिट बॉक्स की फीस बढ़ा दी है। इन्हें गोल्ड, डायमंड और पेंटिंग्स आदि रखने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। बैंकर्स ने दावा किया कि इन सेफ डिपॉजिट बॉक्सों के विदेशी सरकारों की निगाह में आने का कम खतरा है, यही वजह है कि इन्हें हाथोंहाथ लिया जा रहा है। कई विदेशी सरकारों ने बैंकिंग इन्फर्मेशन के आदान-प्रदान के लिए संधियां की हैं।

बैंकर अपने अमीर ग्राहकों को यह बता रहे हैं कि भारत और दूसरे देशों के साथ स्विट्जरलैंड की टैक्स और सूचनाओं के आदान-प्रदान से जुड़ी संधियां कस्टमर्स सेविंग्स, डिपॉजिट और इन्वेस्टमेंट अकाउंट में डाली जाने वाली राशि तक सीमित हैं। ये सेफ डिपॉजिट बॉक्सों पर लागू नहीं होतीं।

विदेशी चंदे पर कांग्रेस, भाजपा से जवाब तलब

दिल्ली उच्च न्यायालय ने दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से विदेशी चंदा प्राप्त करने को लेकर जवाब तलब किया है। न्यायालय ने सोमवार को दोनों पार्टियों को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगे हैं।

न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए दोनों पार्टियों को नोटिस जारी किए, जिसमें आरोप लगाया गया है कि दोनों दल ब्रिटेन के वेदांता समूह की सहायक कम्पनियों से कथित तौर पर चंदा प्राप्त करते हैं। याचिका में इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो या विशेष जांच दल (एसआईटी) से करवाने की मांग की गई है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल तथा न्यायमूर्ति इंदरमीत कौर की खंडपीठ ने दोनों राजनीतिक दलों से तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा और मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख 19 मार्च तय की।

न्यायालय ने इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय और मुख्य निर्वाचन आयोग से इस मामले में जवाब मांगा था। न्यायालय ने कहा था कि वह उनके जवाब सुनने के बाद कांग्रेस और भाजपा से जवाब मांगेगी। निर्वाचन आयोग ने न्यायालय को बताया कि इसने इस बारे में दो बार केंद्रीय गृह मंत्रालय को लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि कांग्रेस और भाजपा से जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है।

गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और केंद्र सरकार में सचिव रह चुके ई. ए. एस. सरमा की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि दोनों दलों ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 तथा विदेशी अनुदान (नियमन) अधिनियम (एफसीआरए) का उल्लंघन किया है। याचिका में कहा गया है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम राजनीतिक पार्टियों को सरकारी कम्पनियों तथा विदेशी स्रोतों से अनुदान लेने से मना करता है। इसी तरह एफसीआरए भी किसी विदेशी स्रोत या कम्पनी को भारत में पंजीकृत राजनीतिक पार्टी को चंदा देने से रोकता है।

एयरटेल के बाद अब आइडिया से कॉल करना हुआ महंगा

टेलिकॉम कंपनियों द्वारा दरें बढ़ाने का सिलसिला जारी है। एयरटेल के बाद अब देश की तीसरी सबसे बड़ी कंपनी आइडिया से भी बात करना महंगा हो गया है।आइडिया के मुंबई के प्रीपेड ग्राहकों को वॉयस कॉल के लिए 20 फीसदी ज्यादा कीमत चुकानी होगी। यही नहीं कंपनी ने 2जी डेटा की दरें भी दोगुनी कर दी है। 1 केबी के लिए 1 पैसे के बजाय 2 पैसे देने होंगे।पिछले महीने एयरटेल ने भी 2जी डेटा प्लान की दरें 25 फीसदी बढ़ाई थी। साथ ही, कंपनी ने वॉइस कॉल दरें बढ़ाने के भी संकेत दिए हैं।

भारत आने के लिए वालमार्ट की लॉबिंग जारी

अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट के भारत में प्रवेश के लिये लॉबिंग किए जाने की जांच के बावजूद कंपनी अमेरिकी सांसदों और अन्य के साथ लॉबिंग को जारी रखे हुये है.

कंपनी ने 2012 के दौरान इस मद पर लगभग 61.3 लाख डॉलर खर्च किए.

अमेरिकी संसद में लॉबिंग संबंधी खुलासे की नयी रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है.

इसके अनुसार अमेरिकी वालमार्ट स्टोर्स ने 31 दिसंबर 2012 में विभिन्न मुद्दों पर लॉबिंग के लिए 14.8 लाख डॉलर 'लगभग आठ करोड़ रुपये' खर्च किए.

इसमें भारत में एफडीआई से जुड़े मुद्दे पर विचार विमर्श पर खर्च शामिल है.

आंकड़ों के अनुसार कंपनी ने 2012 में कुल मिलाकर इस मद में 61.3 लाख डॉलर 'लगभग 33 करोड़ रुपये' खर्च किए.
अमेरिका में कंपनियों द्वारा लॉबिंग मद में किए जाने वाले खर्च का खुलासा करना जरूरी है.

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने इस बात की जांच शुरू की है कि वालमार्ट ने भारतीय बाजार में प्रवेश के लिए अमेरिका में किस तरह की लॉबिंग की. इस मुद्दे को लेकर भारत में खासा विवाद हुआ था.

वालमार्ट बरसों से भारत में सुपर मार्केट खोलने के लिए अनुमति का इंतजार कर रही है और वह इस मुद्दे पर 2008 से ही लॉबिंग कर रही है.

तब से लेकर अब तक लॉबिंग गतिविधियों पर उसका कुल खर्च 3.40 करोड़ डॉलर '180 करोड़ रुपये' से ऊपर निकल गया है. हालांकि, वालमार्ट के लॉबिंग खर्च में वर्ष 2011 के मुकाबले कमी आई है और इस दौरान यह 78 लाख 40 हजार डॉलर से घटकर 2012 में 61 लाख 30 हजार डॉलर रह गया. इससे पहले कंपनी ने 2010 में कुल 73 लाख 90 हजार डॉलर लॉबिंग पर खर्च किये थे.

फिर बढ़ सकता है रेल किराया : बंसल

रेल सफर और महंगा हो सकता है। रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने किराया बढ़ाने के संकेत दिए हैं। जबकि अभी 21 जनवरी को ही रेल किराया बढ़ाया गया है। रेलमंत्री पवन कुमार बंसल ने चंडीगढ़ में शनिवार को कहा कि 'घाटे की भरपाई के लिए रेल किराया बढ़ाना हमारी मजबूरी है।पिछले महीने बढ़े किराए से एक साल में 6600 करोड़ रुपए की आमदनी होती। लेकिन डीजल महंगा होने के कारण इसमें से करीब 3300 करोड़ रुपए ईंधन पर ही खर्च हो जाएगा। इससे रेलवे पुराने प्रोजेक्ट ही पूरा कर पाएगा। नए प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए और पैसों की जरूरत है।' 21 जनवरी को किराए में दो से 30 पैसे प्रति किलोमीटर तक का इजाफा किया गया था।

बैंकों ने की हड़ताल की घोषणा, दो दिन रहेंगे बंद

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की 20 फरवरी से दो दिन की हड़ताल को बैंक कर्मचारी यूनियनों ने भी समर्थन देने का फैसला किया है। बढ़ती महंगाई की वजह से मजदूरी में वृद्धि की मांग को लेकर इस हड़ताल का आह्वान किया गया है।

यूनाइटेड फोरम आफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) के तहत नौ बैंक यूनियनों ने भी 20 और 21 फरवरी को हड़ताल पर जाने का फैसला किया है। नेशनल आर्गेनाइजेशन आफ बैंक वर्कर्स (एनओबीडब्ल्यू) ने यह जानकारी दी।

भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक), अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस), सेंटर आफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) और आल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर (एआईयूटीयूसी) सहित सभी केंद्रीय 11 ट्रेड यूनियनों ने हड़ताल पर जाने की धमकी दी है।

एनओबीडब्ल्यू ने कहा कि बैंक यूनियनें कर्मचारियों के वेतन संशोधन को जल्द से जल्द लागू करने की मांग कर रही हैं। यह नवंबर, 2012 से किया जाना है। इसके अलावा बैंक द्वारा बैंकिंग क्षेत्र सुधारों का विरोध किया जा रहा है। साथ ही वे बैंकों के विलय की किसी भी योजना का विरोध कर रहे हैं।

पिछले महीने बैंकिंग नियमन कानून और बैंकिंग कंपनीज कानून में संशोधन के विरोध में चार बैंक यूनियनें हड़ताल पर गई थीं। इसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में विदेशी पूंजी लाने का प्रावधान है।

`संविधान के अंगों को सीमाओं का सम्मान करना चाहिए`

खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने के सरकार के फैसले पर उच्चतम न्यायालय द्वारा सवाल उठाये जाने के कुछ ही दिनों बाद कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने कहा है कि न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका को एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए तथा एक दूसरे के साथ सामंजस्य के साथ काम करना चाहिए।

उन्होंने एक नये विधेयक के उस विवादास्पद उपबंध का बचाव किया जिसमें न्यायाधीशों को खुली अदालत में लोगों के खिलाफ मौखिक टिप्पणी करने से रोका गया है। कानून मंत्री ने कहा कि इस प्रावधान के पीछे मजबूत तर्क है क्योंकि न्यायाधीशों को टिप्पणी को संदर्भ से हटाकर पेश किया जाता है, जिससे लोगों की छवि प्रभावित होती है।

अश्विनी कुमार ने कहा, ''मैं केवल यही कहना चाहता कि शासन के तीनों अंगों :कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका: को आपसी सामंजस्य के साथ काम करना चाहिए तथा अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए।'' उन्होंने पीटीआई को दिये साक्षात्कार में कहा, ''मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि प्रत्येक अंग को दिये गये अधिकार क्षेत्र के संवैधानिक मानकों ने संविधान की योजना के अनुरूप ही कमोबेश काम किया है। न्यायाधीशों ने भी स्वयं यह बात कई बार कही है कि वह नीति निर्माण के क्षेत्र में नहीं जाना चाहते।'' उन्होंने यह बात इस सवाल के जवाब में कही कि ऐसी धारणा है कि न्यायपालिका अपने कार्यक्षेत्र से बाहर आ रही है। इसी संबंध में उन्हें पिछले माह उच्चतम न्यायालय द्वारा खुदरा क्षेत्र एफडीआई को मंजूरी देने के सरकार के निर्णय पर उठाये सवाल का भी हवाला दिया गया।

उच्चतम न्यायालय ने सरकार से पूछा था कि क्या खुदरा क्षेत्र में एफडीआई एक ''राजनीतिक तमाशा'' है। शीर्ष न्यायालय ने सरकार से यह भी जानने का प्रयास किया है कि वह खुदरा क्षेत्र को खोलने के बाद छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा कैसे करेगी। उच्चतम न्यायालय के सवालों पर कोई टिप्पणी किये बिना अश्विनी कुमार ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले ''न्यायिक अधिकार क्षेत्र के संबंध में संवैधानिक दायरों के उल्लेख के जरिये आये हैं।'' शीर्ष न्यायालय के सवालों के मद्देनजर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने हाल में कहा था, ''सभी संस्थानों को कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका के बीच के संवैधानिक विभाजन का सम्मान करना चाहिए।'' शर्मा कह चुके हैं, ''यह महत्वपूर्ण है कि सभी संस्थान कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका के बीच संवैधानिक विभाजन का सम्मान करें। इस संतुलन में ऐसा कोई भी बदलाव जिससे भारत में निवेश करने को उत्सुक लोग भ्रमित हों, बचा जाना चाहिए। ऐसे निवेश से नौकरियों का सृजन, प्रौद्योगिकी उन्नयन तथा आधारभूत सुविधाओं का विकास होगा।'' संसद में विचाराधीन न्यायिक मानक एवं जवाबदेही विधेयक की चर्चा करते हुए कानून मंत्री ने उस विवादास्पद उपबंध का बचाव किया जो खुली अदालतों में लोगों के खिलाफ मौखिक टिप्पणियां करने से न्यायाधीशों को रोकता है। पिछले साल दिसंबर में सरकार ने न्यायिक मानकों संबंधी विधेयक पर इस उपबंध को बरकरार रखने का निर्णय किया था। उन्होंने कहा कि सरकार नहीं बल्कि स्वयं न्यायाधीशों को तय करना होगा कि अदालत में की गयी टिप्पणी अनिवार्य थी या नहीं।

अश्विनी कुमार ने कहा, ''अंतत: न्यायिक प्रणाली के भीतर उनके वरिष्ठ न्यायाधीशों को ही यह निर्णय करना पड़ेगा कि कोई विशेष व्यवस्था या टिप्पणी जरूरी थी या नहीं..किसी भी तरह से निर्णय करने के न्याय क्षेत्र के अधिकार में घुसपैठ की कोई भी मंशा नहीं है।'' उन्होंने कहा कि प्रावधान के पीछे एक मजबूत तर्क है क्योंकि कई अवसरों पर देखा गया है कि न्यायाधीशों की टिप्पणियों को संदर्भ से हटा दिया जाता है। इससे उनके समक्ष पेश कारण को नुकसान पहुंचता है या उनके समक्ष पेश व्यक्ति की छवि प्रभावित होती है।

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने न्यायिक मानक एवं जवाबदेही कानून में संशोधनों को मंजूरी दी है। यह विधेयक लोकसभा में पारित हो चुका है और राज्यसभा में विचाराधीन है। सूत्रों ने बताया कि सरकार ने विवादास्पद उपबंध को बरकरार रखते हुए कुछ बदलाव किये हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 की भावना के अनुरूप हो। इस अनुच्छेद के अनुसार कानून के समक्ष सब समान हैं।

इससे पूर्व के अनुबंध में न्यायाधीशों को किसी संवैधानिक या सांविधिक प्राधिकार या सांविधिक निकाय या सांविधिक संस्थान या किसी अध्यक्ष या किसी सदस्य या किसी अधिकारी के आचरण, किसी लंबित मामले अथवा न्यायिक निर्धारण के लिए उठने वाले संभावित मामलों में अवांछित टिप्पणी करने से रोका गया था। संशोधित उपबंध में न्यायाधीशों को किसी संवैधानिक निकाय या अन्य व्यक्तियों के खिलाफ अवांछित टिप्पणी करने से रोका गया है।

अश्विनी कुमार ने इस बात पर बल दिया कि सरकार कानून के जरिये यह स्पष्ट करने का प्रयास करना चाहती है कि ''न्यायिक प्रणाली में आत्म अनुशासन का तत्व निहित है। लिहाजा किसी को भी, उच्च न्यायपालिका के सभी सदस्यों सहित, कोई आपत्ति क्यों होनी चाहिए।'' उन्होंने यह बात इस सवाल के जवाब में कही कि क्या उपबंध से न्यायापालिका अप्रसन्न हो सकती है। यह विधेयक पिछले साल लोकसभा में बजट सत्र के दौरान तेलंगाना मुद्दे पर हंगामे के बीच पारित हुआ था।

प्रख्यात न्यायविदों एवं उच्च न्यायपालिका के कड़े विरोध के बाद सरकार ने उपबंध पर पुनर्विचार करने पर सहमति जतायी और उसे मानसून सत्र में राज्यसभा में पारित होने के लिए नहीं रखा गया। विधेयक में नागरिकों को अधिकार दिया गया है कि वे भ्रष्ट न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। विधेयक के इस उपबंध की आलोचना हो रही है कि इसमें खुली अदालत में न्यायाधीशों के बोलने पर पाबंदी लग जायेगी। उच्च सदन में पारित होने के बाद इस विधेयक को फिर से लोकसभा में मंजूरी के लिए भेजा जायेगा।

महज कम्युनिज्म की ओर आकृष्ट होने से कोई आतंकवादी नहीं हो जाता: कोर्ट

बंबई उच्च न्यायालय ने प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के चार कथित सदस्यों को जमानत देते हुए कहा कि सिर्फ कम्युनिस्ट विचारधारा की ओर आकृष्ट होना किसी व्यक्ति को आतंकवादी समूह का सदस्य घोषित करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

न्यायमूर्ति अभय थिप्से ने पिछले सप्ताह धवल धेंगेल, सिद्धार्थ भोंसले, मयूरी भगत और अनुराधा सोनुले प्रत्येक को 30-30 हजार रुपये के मुचलके पर जमानत दी थी।

चारों को आतंकवाद निरोधक दस्ते ने अप्रैल 2011 में भाकपा (माओवादी) का सदस्य होने के आरोप में गिरफ्तार किया था। भाकपा (माओवादी) को केंद्र सरकार एक आतंकवादी संगठन घोषित कर चुकी है।

अधिवक्ता मिहिर देसाई ने इनके लिए जमानत मांगते हुए दलील दी कि प्रथम दृष्टया आरोपियों के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता और अभियोजन पक्ष की कहानी भरोसेमंद नहीं है क्योंकि यह कम्युनिस्ट दर्शन पर आधारित कुछ साहित्य और सीडी की आरोपियों के पास से बरामदगी पर आधारित है।

न्यायमूर्ति थिप्से ने कहा, ''ऐसा कोई आरोप नहीं है कि आवेदकों ने हिंसा की किसी घटना को अंजाम देने की साजिश रची थी। उनकी दिलचस्पी सामाजिक मुद्दों को उठाने में लगती है। इन सामाजिक मुद्दों को उठाने और सामाजिक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है इस बात को उठाने में कुछ भी गलत नहीं है।'' उन्होंने कहा कि इसी तरह की राय कुछ राष्ट्रीय और प्रमुख नेताओं ने जाहिर की। इस तरह के नजरिए की अभिव्यक्ति किसी व्यक्ति को भाकपा :माओवादी: जैसे किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य नहीं घोषित कर सकती।

अदालत ने कहा, ''ऐसा लगता है कि आवेदक कम्युनिस्ट दर्शन की ओर आकृष्ट हैं लेकिन महज इतने से ही वे आतंकवादी या अपराधी नहीं हो जाएंगे।'' अदालत ने कहा, ''भ्रष्टाचार, सामाजिक विषमता और गरीबों के शोषण का विरोध करना और बेहतर समाज की आकांक्षा रखना हमारे देश में प्रतिबंधित नहीं है। हमारे समाज में ये खामियां हैं इनको उजागर करने को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता और न ही दंडनीय बनाया जा सकता है।'' अदालत ने इन मुद्दों में आवेदकों की दिलचस्पी और सामाजिक जागरूकता पैदा करने के उनके प्रयासों को सराहनीय बताया।

पुणे से गिरफ्तार किए गए सात आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, आपराधिक साजिश और गैर कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

FII ने जनवरी में किया 22,000 करोड़ रु का निवेश

विदेशी निवेशकों ने जनवरी में भारतीय शेयर बाजारों में 22,000 करोड़ रुपए (4 अरब डॉलर) से अधिक का निवेश किया।

सेबी के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने जनवरी में 77,859 करोड़ रुपए मूल्य के शेयरों की लिवाली की, जबकि इस दौरान उन्होंने 55,800 करोड़ रुपए मूल्य के शेयर बेचे। इस तरह से उनका शुद्ध निवेश 22,059 करोड़ रुपए रहा।

यह लगातार सातवां महीना रहा जब एफआईआई ने भारतीय शेयर बाजारों में निवेश किया। एफआईआई जुलाई, 2012 से ही घरेलू शेयर बाजारों में निवेश कर रहे हैं।

बाजार विश्लेषकों ने कहा कि सरकार द्वारा गार का क्रियान्वयन दो साल तक के लिए टालने और डीजल मूल्यों को आंशिक रूप से नियंत्रण मुक्त करने सहित विभिन्न उपायों से शेयर बाजार में एफआईआई का निवेश प्रवाह बना हुआ है।

इसके अलावा, रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति में नरमी का रुख अपनाने से भी विदेशी निवेशक भारत की ओर आकषिर्त हो रहे हैं।

एफआईआई ने शेयर बाजारों के अलावा जनवरी में ऋण बाजार में 2,947 करोड़ रुपए का निवेश किया।

समाज में बढ़ती असहिष्णुता को दर्शाता है नंदी-हसन विवाद: थरूर

केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने कहा है कि कमल हासन की फिल्म 'विश्वरूपम' या समाजशास्त्री आशीष नंदी की कथित दलित विरोधी टिप्पणी को लेकर हुआ हालिया विवाद समाज का बिंब है जो लगता है कि प्रतिस्पर्धी असहिष्णुता की संस्कृति बनता जा रहा है।

उन्होंने लेखक सलमान रुश्दी को पिछले हफ्ते कोलकाता में प्रवेश की अनुमति नहीं दिए जाने पर भी खेद प्रकट किया।

किसी व्यक्ति की भावना आहत न हो और हिंसा न भड़के इसके लिए व्यक्ति की अभिव्यक्ति में सतर्क संतुलन स्थापित करने पर जोर देते हुए थरूर ने कहा कि देश अब तक उस स्थिति तक नहीं पहुंचा है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ठेस पहुंचने के अधिकार को शामिल किया जाना चाहिए।

एक समाचार चैनल पर थरूर ने कहा, 'मेरी राय में यह कहने के अधिकार को शामिल किया जाए जो किसी को ठेस पहुंचा सकता है और उससे विरोधी दलील चर्चा तथा वाद-विवाद पैदा होता है लेकिन इस बिंदु तक नहीं जहां कोई सरकार या न्यायाधीश इस बात को निर्धारित करे कि यह जन व्यवस्था के लिए खतरा है।'

उन्होंने कहा, 'एक समाज के तौर पर हमारे लिए सही संतुलन ढूंढना चुनौती है जिसका पलड़ा स्वतंत्रता की ओर अधिक भारी हो, न कि दमन की ओर।'

नंदी की कथित दलित विरोधी टिप्पणी के बारे में पूछे जाने पर थरूर ने कहा, 'समाजशास्त्री ने जो कहा उससे असहमत होने के वैध आधार थे लेकिन राजनैतिक वर्ग के एक तबके की ओर से उनकी गिरफ्तारी की मांग करना बिल्कुल अनावश्यक था।'
हालांकि, उन्होंने महसूस किया कि नंदी किसी को ठेस पहुंचाने से बचने के लिए अपनी बात बेहतर तरीके से रख सकते थे।

उन्होंने यह भी कहा कि सेंसर बोर्ड की अनुमति मिलने के बाद कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए था।

उन्होंने कहा, 'एक बार फिल्म को सेंसर बोर्ड का प्रमाण पत्र मिल जाने के बाद उसे दिखाया जाना चाहिए और अगर फिल्म में कही गई बात को आप नहीं समझते हैं तो आप फिल्मकार से संवाद करें, जरूरत पड़ने पर दलील दें, प्रदर्शन करें लेकिन फिल्म का प्रदर्शन न रोकें।'

इन तमाम मुद्दों की समीक्षा करते हुए थरूर ने कहा कि पिछले हफ्ते जो अशांति देखने को मिली वो इसलिए थी 'क्योंकि हम प्रतिस्पर्धी असहिष्णुता की संस्कृति बनते जा रहे हैं।'

ब्लैक मनी पर चुप तो नहीं बैठी है सरकार

नवभारत टाइम्स | Sep 20, 2012, 09.00AM
अवधेश कुमार

काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर जो तूफान खड़ा है उसमें सच और झूठ के बीच निर्णय करना कठिन हो गया है। खासकर विदेशों में जमा काले धन के बारे में ऐसे-ऐसे आंकड़े दिए जा रहे हैं, जिनको सुनने वाला पहली बार में ही अचंभित हो जाता है। पहले विपक्षी दलों ने इन आंकड़ों को आधार बनाकर सरकार पर हमला आरंभ किया, फिर स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के अभियानों से इन पर बहस चरम तक पहुंच गई। इन दोनों अभियानों तथा विपक्षी दलों का आरोप यही है कि सरकार जानबूझकर काले धन को बाहर निकालने के लिए कठोर उपाय नहीं कर रही है, क्योंकि सरकार में शामिल लोगों का ही अवैध धन विदेशों में पड़ा हुआ है। राजनीति के लिए यह इतना बड़ा मुद्दा है कि इसके आधार पर विपक्षी दल अगले आम चुनाव में अपनी जीत की उम्मीद करने लगे हैं। लेकिन क्या सच भी यही है? क्या वाकई सरकार काले धन के मामले में हाथ पर हाथ धरे बैठी है?

पांच सूत्री रणनीति
अगर आप तटस्थ होकर तथ्यों का विश्लेषण करेंगे तो इसका उत्तर आएगा, नहीं। सच यह है कि वर्तमान राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय ढांचे में इस सरकार ने जितने कदम उठाए हैं, उतने इसके पूर्व कभी नहीं उठाए गए। अगर आप उनकी संक्षिप्त सूची भी बनाएंगे तो विपक्ष के हमले और बाबा-अन्ना अभियानों के कारण बने वातावरण से अलग तस्वीर नजर आने लगेगी। सरकार ने इस मामले में पांच सूत्री रणनीति बनाई है। ये हैं- आंतरिक कानूनी ढांचों में बदलाव, उसके अनुरूप कुशल मानव संसाधन का विस्तार, देश-विदेश में स्थित काले धन का वास्तविक आकलन, अंतरराष्ट्रीय संधियों से जुड़ना, द्विपक्षीय संधियां करना और उनके क्रियान्वयन पर तत्काल आगे बढ़ना। मार्च 2011 में काले धन का मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी तीन संस्थानों को दी गई, जिन्हें 18 महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी।

बहु स्तरीय सक्रियता
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष की अध्यक्षता में एक समिति 27 मई 2011 को गठित की गई, जिसका मकसद काले धन को जब्त करने, उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने तथा कठोर सजा के प्रावधान सुझाना है। मनी लॉन्ड्रिंग कानून में 1 जून 2009 को किए गए संशोधन के बाद अवैध धन को वैध बनाने के घोषित क्षेत्र का विस्तार हुआ है और कार्रवाई ज्यादा आसान हुई है। काले धन के लिए विशेष तौर पर अपराध छानबीन संबंधी निदेशालय का गठन किया जा चुका है। अंतरराष्ट्रीय कर एवं मूल्य हस्तांतरण निदेशालय को मजबूत किया गया है और भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की संख्या 71 करने का निर्णय हो चुका है। मौजूदा वित्त वर्ष के बजट प्रावधानों के अनुरूप घरेलू स्तर पर वित्त कानून 2012 के तहत विदेशों की परिसंपत्तियों की घोषणा अनिवार्य की गई है और विदेशी संपत्ति संबंधी मामलों में पिछले 16 वर्ष तक के मूल्यांकन का प्रावधान किया गया है।

वैदेशिक मोर्चे पर आएं तो भ्रष्टाचार से संबंधित संयुक्त राष्ट्रसंघ व्यवस्था को भारत ने अनुमोदित कर दिया है। 26 जनवरी 2012 को भारत ने कर मामलों पर परस्पर प्रशासनिक सहायता बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय समझौते (एएएमए) पर हस्ताक्षर किया। इसमें कर दावों से संबंधित सूचनाओं के स्वयमेव आदान-प्रदान, पूर्व सूचनाओं के आदान-प्रदान और वसूली में सहायता का प्रावधान है। 1 जून 2012 से इसे लागू किया जा चुका है। कर उद्देश्यों के मूल्यों से संबंधित सूचना के आदान-प्रदान के लिए कार्यरत वैश्विक मंच पीयर रिव्यू ग्रुप का उप सभापति पद भारत के पास है।

भारत मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी कार्रवाई एवं आतंकवाद के वित्त पोषण पर रोक (सीएफटी) को बल प्रदान करने के लिए उत्तरदायी फाइनैंशल एक्शन टास्क फोर्स का सदस्य बन चुका है। वित्तीय शुचिता और आर्थिक विकास संबंधी टास्क फोर्स, मनी लॉन्ड्रिंग के विरुद्ध एशिया पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) और दुनिया भर की वित्तीय खुफिया इकाइयों के बीच संपर्क, संचार और अंत:क्रिया को बढ़ावा देने संबंधी तंत्र (एग्मॉन्ट) से भी भारत जुड़ चुका है।

द्विपक्षीय वैश्विक मोर्चे पर देखें तो दोहरे कराधान से बचने वालों को पकड़ने से संबंधित समझौता डबल टैक्सेशन एवॉएडेंस एग्रीमेंट्स यानी डीटीएए पर हस्ताक्षर हो रहे हैं। कर सूचना विनिमय समझौता टीआईईए उन देशों के साथ किया गया है जो डीटीटीए नहीं चाहते। आज की स्थिति में 65 देशों के साथ संधि पर बातचीत पूरी है तथा दोनों मिलाकर 33 संधियों पर हस्ताक्षर हो चुके हैं। स्विस बैंकों के लिए बदनाम स्विट्जरलैंड सहित ऐसे कई देश इसमें शामिल हैं जिन्हें टैक्स हैवन कहा जाता है। टीआईईए के तहत हमें संबंधित व्यक्ति की पहचान बतानी होती है, जिसे टाले जाने की संभावना मौजूद रहती है। स्विट्जरलैंड के साथ सूचना विनिमय के लिए पहचान बताने की व्यवस्था की उदार व्याख्या लिबर इंटरप्रिटेशन ऑफ आइडेंटिटी संबंधी समझौता हुआ जो 1 अप्रैल 2011 से लागू है।

पकड़े लाख करोड़
इन कदमों से भारतीय नागरिकों द्वारा विदेशों में संपत्तियों एवं भुगतान संबंधी 12 हजार 500 सूचनाएं मिलीं जिनकी समीक्षा और छानबीन जारी है। जर्मनी और फ्रांस से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर 600 करोड़ रुपए की कर चोरी पकड़ी गई, जिसमें 200 करोड़ की वसूली की जा चुकी है। देश के अंदर संदिग्ध लेनदेन की 30, 765 सूचनाएं मिली जिनकी जांच संबंधित एजेंसियों द्वारा की जा रही है। काले धन के प्रवाह में सबसे बड़ा योगदान गलत मूल्य का है। मूल्य हस्तांतरण निदेशालय ने गत वित्तीय वर्ष 67, 768 करोड़ रुपए और इस वर्ष 43, 531 करोड़ के गलत मूल्य के मामले पकड़े हैं।

अंतरराष्ट्रीय कर निदेशालय ने गत दो वित्तीय वर्ष में 48, 951 करोड़ रुपए सीमापार लेनदेन से कर में प्राप्त किया। गत तीन वर्षों में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड की अन्वेषण इकाई ने 32 हजार करोड़ रुपए की अघोषित आय पकड़ी है तथा 2600 करोड़ की अघोषित संपत्ति जब्त की है। आयकर विभाग ने व्यवसायी कंपनियों की छानबीन में 17, 325 करोड़ रुपए की अघोषित आय पकड़ी है। इतने सब के बाद भी देश भरोसा क्यों नहीं कर पा रहा है कि यह सरकार काला धन बाहर ला सकेगी?
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/16465883.cms




জাতিব্যবস্থার বাস্তব তাঁরা মেনে নিয়েছেন এবং ক্ষমতায়ণের তত্বও তাঁরা মানছেন।গত লোকসভা নির্বাচনে মায়াবতীকে সামনে রেখে তাঁরা পরিবর্তনের সংকেতও দিয়েছিলেন, কিন্তু ভোটে হেরে সেই বিপ্লবের অকাল গর্ভপাত হয়ে গেল।আশিস নন্দীর জয়পুর মন্তব্যের বিরুদ্ধে সিপিএম এর সাহিত্যিক মন্চ জনবাদী লেখক সংঘ কিন্তু সবার আগে পত্রপাঠ বক্তব্য দিয়েছিল। কিন্তু দু দিন যেতে না যেতে শ্রেণী স্বার্থে তাঁদে�

জাতিব্যবস্থার বাস্তব তাঁরা মেনে নিয়েছেন এবং ক্ষমতায়ণের তত্বও তাঁরা মানছেন।গত লোকসভা নির্বাচনে মায়াবতীকে সামনে রেখে তাঁরা পরিবর্তনের সংকেতও দিয়েছিলেন, কিন্তু ভোটে হেরে সেই বিপ্লবের অকাল গর্ভপাত হয়ে গেল।আশিস নন্দীর জয়পুর মন্তব্যের বিরুদ্ধে সিপিএম এর সাহিত্যিক মন্চ জনবাদী লেখক  সংঘ কিন্তু সবার আগে পত্রপাঠ বক্তব্য দিয়েছিল। কিন্তু দু দিন যেতে না যেতে শ্রেণী স্বার্থে তাঁদের সেই বক্তব্য রাতারাতি বদলে গেল।এখন তাঁরা আশিস নন্দীর বাক্ স্বাধীনতার পক্ষে। আমরাো ত পক্ষে। আমরা ত দাবি করছি, তাঁর বক্তব্যের নিরিখে যে বাংলায় গত একশো বছরে ওবিসি, এসসি ও এসটির কোনো ক্ষমতায়ন হয়নি, এই জন্য বাংলায় দুর্নীতি এত কম।সারা দেশ সারা বিশ্বের লোক এতদিন জানত বামপন্থীদেরই কৃতিত্ব যে তারা দীর্ঘ পয়ত্রিশ বছরে ক্ষমতায় থাকা সত্বেও দুর্নীতিগ্রস্ত ছিলেন না।কমরেড মাণিক সরকার সারা দেশে সবচেয়ে দরিদ্র মুখ্যমন্ত্রী।এখন জানা গেল মতাদর্সের কোনো কৃতিত্বই নেই, যাবতীয় কৃতিত্ব বহুজন বহিস্কারের, ব্রাহ্মণ্যতান্ত্রিক কর্তৃত্বের, ব্যবস্থার।কিন্তু বাংলার বিপ্লবী বামপন্থীরা এই প্রসঙ্গে রা কাড়ছেন না।মা মাটি সরকারের প্রধান মতুয়া দিদিও কম যান না।তিনি হরিচাঁদ গুরুচাঁদ মতবাদে দীক্ষিত হয়েই বাংলার মতুয়া দলিত ভোট জিতে আজ মুখ্যমন্ত্রী।তিনি আবার অকুতোভয়।উচিত কথা বলতে ছাড়েন না।তিনিও ত কোনো কথা বলছেন না। বাম জমানার সরকারী অর্থশাস্ত্রী অমর্ত্য সেন লিট মিটে সলমান রুশদি প্রসঙ্গে খামোশ থাকলেন সেটা নিয়ে বড় খবর, তিনি ত আবার আম বাঙ্গালির মত স্থানীয় রাজনীতির উলু খাগড়া নন, তাছাড়া দলিত  আদিবাসিদের ক্ষমতায়ন নিয়ে সর্বদাই সরব।কেউ তাঁকে আশীষ নন্দী নিয়ে একটি প্রশ্নও করলেন না।তিনি নিজে থেকেই বার বার ক্ষমতায়নের কথা বলতে অভ্যস্ত, তাহলে?

২০১৩-১৪ অর্থবর্ষে আর্থিক ঘাটতি ৪.৮ শতাংশ বেঁধে রাখতে চান অর্থমন্ত্রী পি চিদম্বরম৷ প্রথম রাতেই বেড়াল মারতে তাই বাজেট ঘোষণায় পরিকল্পিত প্রকল্প খাতে বরাদ্দ ছাঁটতে পারেন অর্থমন্ত্রী৷ তবে, চলতি অর্থবর্ষে কোন প্রকল্পে বরাদ্দের কত টাকা ব্যয় করা হয়েছে তার হিসাব খতিয়ে দেখে তবেই আগামী অর্থবর্ষে কোনও প্রকল্পের জন্য অর্থ বরাদ্দ করা হবে বলে অর্থমন্ত্রক সূত্রের খবর৷ 

পলাশ বিশ্বাস

যত কান্ড, বইমালা লিট মিটে

সলমান রুশদি ও তসলিমা নাসরিন নিয়ে সারা বাংলা তোলপাড়

জগতবিখ্যাত সমাজবিজ্ঞানীর বহুজনবিরোধী মন্তব্য নিয়ে সেখানে কিন্তু কোনো আলোচনাই হল না

বাংলার বিদ্বতজনেরা দেশের খবর রাখেন না।আম জনতা ত সিপিএম তৃণমুল স্থানীয় সন্ত্রাস রাজনীতির মুড়ি মুড়কি চিবিয়ে জীবন যাপন করতে অভ্যস্ত

টিভি চ্যানেলে দিনরাত রগরগে বিতর্ক সভা

কখনো জ্যোতি প্রিয় মল্লিক লাইভ ত কখনো আবার মদনমিত্র লাইভ।আরাবুলরা আছেন।আছেন শুভেন্দু অধিকারিরা

আরোও আছেন বিদ্বতজনেরা , প্রতিটি বিতর্কে তাঁদের জমজমাট বাইট

চ্যানেলে চ্যানেলে সবজান্তা বক্তারা, বাংলা জমে দই

তবু বইমেলা প্রসঙ্গে সলমান তসলিমাদের প্রসঙ্গ ওঠে।সুবিধাজনক প্রসঙ্গ

আনন্দবাজারে ইতিমধ্যে কান্চা ইলাইয়ার বক্তব্য প্রকাশিত হয়ে গেছে

 এখন ত কেউ বলতে পারেন না যে নন্দী কি বলেছেন জানিনা

তবু কোনও মন্তব্য নেই কেন?

মনে রাখা দরকার, বিগত লোকসভা নির্বাচনে বামপন্থীরা মায়াবতীকে ভাবী প্রধানমন্ত্রী ঘোষিত করে মাঠে নেমে গো হারা হেরেছেন

মন্ডল কমিশন নিয়ে তাংরাই ছিলেন সবচেয়ে সোচ্চার

বিমানবসুরা বর্ণ ব্যবস্থার বিরুদ্ধে জেহাদ ঘোষণা করতে অভ্যস্ত

বামপন্থীদের এক মন্ত্রী. যদিও তিনি ত্রিপুরার মন্ত্রী, দলিত কবি আছেন বেশ সর্বভারতীয় স্তরের, আমাদের অতি প্রিয় অনিল সরকার। 

গত কয়েক সিপিএম  কংগ্রেস ধরে শুনে আসছি, কমরেড প্রকাশ কারত, কমরেড বৃন্দা কারত, কমরেড সীতারাম ইয়েচুরি, কমরেড বিমান বসু, কমরেড অনিল সরকার ভারতবর্ষের সমাজবাস্তবের নিরিখে শ্রেণী সংঘর্ষের যুক্তিতে আর খারিজ করছেন না

জাতিব্যবস্থার বাস্তব তাঁরা মেনে নিয়েছেন এবং ক্ষমতায়ণের তত্বও তাঁরা মানছেন

গত লোকসভা নির্বাচনে মায়াবতীকে সামনে রেখে তাঁরা পরিবর্তনের সংকেতও দিয়েছিলেন, কিন্তু ভোটে হেরে সেই বিপ্লবের অকাল গর্ভপাত হয়ে গেল

আশিস নন্দীর জয়পুর মন্তব্যের বিরুদ্ধে সিপিএম এর সাহিত্যিক মন্চ জনবাদী লেখক  সংঘ কিন্তু সবার আগে পত্রপাঠ বক্তব্য দিয়েছিল। কিন্তু দু দিন যেতে না যেতে শ্রেণী স্বার্থে তাঁদের সেই বক্তব্য রাতারাতি বদলে গেল।এখন তাঁরা আশিস নন্দীর বাক্ স্বাধীনতার পক্ষে। 

আমরাো ত পক্ষে। আমরা ত দাবি করছি, তাঁর বক্তব্যের নিরিখে যে বাংলায় গত একশো বছরে ওবিসি, এসসি ও এসটির কোনো ক্ষমতায়ন হয়নি, এই জন্য বাংলায় দুর্নীতি এত কম, এই প্রসঙ্গে তদন্ত চাইছি।বিতর্ক চাইছি 

 সারা দেশ সারা বিশ্বের লোক এতদিন জানত বামপন্থীদেরই কৃতিত্ব যে তারা দীর্ঘ পয়ত্রিশ বছরে ক্ষমতায় থাকা সত্বেও দুর্নীতিগ্রস্ত ছিলেন না

কমরেড মাণিক সরকার সারা দেশে সবচেয়ে দরিদ্র মুখ্যমন্ত্রী

এখন জানা গেল মতাদর্সের কোনো কৃতিত্বই নেই, যাবতীয় কৃতিত্ব বহুজন বহিস্কারের, ব্রাহ্মণ্যতান্ত্রিক কর্তৃত্বের, ব্যবস্থার

কিন্তু বাংলার বিপ্লবী বামপন্থীরা এই প্রসঙ্গে রা কাড়ছেন না

মা মাটি সরকারের প্রধান মতুয়া দিদিও কম যান না।তিনি হরিচাঁদ গুরুচাঁদ মতবাদে দীক্ষিত হয়েই বাংলার মতুয়া দলিত ভোট জিতে আজ মুখ্যমন্ত্রী

তিনি আবার অকুতোভয়।উচিত কথা বলতে ছাড়েন না

তিনিও ত কোনো কথা বলছেন না

 বাম জমানার সরকারী অর্থশাস্ত্রী অমর্ত্য সেন লিট মিটে সলমান রুশদি প্রসঙ্গে খামোশ থাকলেন সেটা নিয়ে বড় খবর, তিনি ত আবার আম বাঙ্গালির মত স্থানীয় রাজনীতির উলু খাগড়া নন, তাছাড়া দলিত  আদিবাসিদের ক্ষমতায়ন নিয়ে সর্বদাই সরব।কেউ তাঁকে আশীষ নন্দী নিয়ে একটি প্রশ্নও করলেন না

তিনি নিজে থেকেই বার বার ক্ষমতায়নের কথা বলতে অভ্যস্ত, তাহলে?

২০১৩-১৪ অর্থবর্ষে আর্থিক ঘাটতি ৪.৮ শতাংশ বেঁধে রাখতে চান অর্থমন্ত্রী পি চিদম্বরম৷ প্রথম রাতেই বেড়াল মারতে তাই বাজেট ঘোষণায় পরিকল্পিত প্রকল্প খাতে বরাদ্দ ছাঁটতে পারেন অর্থমন্ত্রী৷ তবে, চলতি অর্থবর্ষে কোন প্রকল্পে বরাদ্দের কত টাকা ব্যয় করা হয়েছে তার হিসাব খতিয়ে দেখে তবেই আগামী অর্থবর্ষে কোনও প্রকল্পের জন্য অর্থ বরাদ্দ করা হবে বলে অর্থমন্ত্রক সূত্রের খবর৷ 

চলতি অর্থবর্ষে আর্থিক ঘাটতি ৫.৩ শতাংশ থেকে বাড়বে না বলে প্রতিশ্রীতি দিয়েছেন চিদম্বরম৷ সে কারণে বছরের শেষ ত্রৈমাসিকে বিভিন্ন মন্ত্রকের খরচের উপর কোপ ফেলেছেন অর্থমন্ত্রী৷ অর্থমন্ত্রকের কড়া নির্দেশ, গোটা অর্থবর্ষের মোট বরাদ্দের মাত্র ৩৩ শতাংশ জানুয়ারি-মার্চে করতে পারবে বিভিন্ন মন্ত্রক৷ এবং শুধু মার্চ মাসে ব্যয় যেন মোট বরাদ্দের ১৫ শতাংশ না ছাড়ায়৷ 

অর্থমন্ত্রী চিদম্বরম বলেছিলেন, এ বছর আর্থিক ঘাটতি যেমন করেই হোক জাতীয় উত্পাদনের ৫.৩ শতাংশে সীমিত রাখা হবে৷ ২০১৩-১৪ বর্ষে সেটা নামিয়ে আনা হবে ৪.৮ শতাংশ৷ ২০১৬-১৭ বর্ষে ঘাটতির পরিমাণ কমিয়ে আনা হবে জিডিপি-র ৩ শতাংশ৷ সেই লক্ষ্যপূরণের জন্য আর্থিক সংহতিকরণের পাশাপাশি ব্যয়সঙ্কোচনের উপরও জোর দিয়েছেন চিদম্বরম৷ 

কন্ট্রোলার জেনারেল অফ অ্যাকাউন্টস (সিজিএ)-র হিসেব বলছে, পরিকল্পিত খাতে ২০১২ সালের এপ্রিল থেকে ডিসেম্বর পর্যন্ত প্রায় তিন লক্ষ কোটি টাকা ব্যয় করেছে সরকার, যা ২০১২-১৩ অর্থবর্ষে মোট বরাদ্দের মাত্র ৫৮.৬ শতাংশ৷ সেখানে পরিকল্পনা বহির্ভূত খাতে ব্যয় হয়েছে প্রায় সাত লক্ষ কোটি টাকা, যা বাজেট বরাদ্দের ৭২ শতাংশ৷ পরিকল্পিত খাতে খরচ কম হওয়ায় আগামী বছর বরাদ্দ অর্থের অনেকটাই কমিয়ে দেওয়া হবে বলে মনে করছেন বিশেষজ্ঞরা৷ 

সুইস ব্যাঙ্কগুলিতে বিদেশিরা আগে কেবল টাকাই রাখতে পারতেন৷ এখন ব্যাঙ্কগুলি তাদের গ্রাহকদের বিশেষ অ্যাকাউন্ট এবং ক্যাশ ভল্টের সুবিধা দিচ্ছে যেখানে সোনা বা বিদেশি মুদ্রাও রাখা যাবে৷ সুইস ব্যাঙ্কগুলি এই বিশেষ সুবিধা দেওয়ার ঘোষণা করছে যখন ভারতের মতো বিশ্বের বিভিন্ন দেশে সরকার কালো টাকা এবং কর ফাঁকি আটকাতে তত্‍পর হচ্ছে৷ 

সুইস ব্যাঙ্কগুলির এই বিশেষ অ্যাকাউন্টের সুবিধা দেওয়ায় ধনীরা নিজের দেশের কর ফাঁকি দেওয়া অর্থ সোনায় বদলে গচ্ছিত রাখতে পারবেন সুইস ব্যাঙ্কের ভল্টে৷ ওই ভল্টে রাখা যাবে সুইস ফ্রাঁ-এর মতো বিদেশি মুদ্রাও৷ সম্প্রতি ১০০০ সুইস ফ্রাঁ নোটের চাহিদা বেড়ে গিয়েছে বলে জানিয়েছে সুইত্জারল্যান্ডের কেন্দ্রীয় ব্যাঙ্ক৷ কালো টাকা নিয়ে বিতর্কের জেরে বেশ কয়েকটি দেশকে তাদের অ্যাকাউন্ট হোল্ডারদের সম্বন্ধে তথ্য দিতে বাধ্য হয়েছে বিভিন্ন 'সুইস ব্যাঙ্ক'৷ কিন্ত্ত ধনী অ্যাকাউন্ট হোল্ডারদের হারাতে চায় না সুইস ব্যাঙ্কগুলি৷ তাই বিভিন্ন দেশের সঙ্গে তাদের ব্যাঙ্কিং তথ্য আদানপ্রদান নিয়ে যে চুক্তি হয়েছে, তা থেকে গ্রাহকদের বাঁচাতে নতুন পন্থা নিয়েছে ব্যাঙ্কগুলি৷ এই পদ্ধতিতে অ্যাকাউন্ট হোল্ডারদের পরিচয় গোপন রাখার সমস্যা অনেক কম৷ 

পরিচয় গোপন রাখা প্রসঙ্গে সম্প্রতি ডাভোসে ওয়ার্ল্ড ইকোনমিক ফোরামের বার্ষিক বৈঠকে সুইস ব্যাঙ্কের কর্তারা জানান যে ভারত সহ বিশ্বের অন্য দেশের ধনীদের সুবিধা দিতেই এই ধরনের অ্যাকাউন্ট৷ প্রথম শ্রেণির সুইস ব্যাঙ্কের এক কর্তার কথায়, ইতিমধ্যেই বেশ কয়েকটি বড় ধরনের ব্যাঙ্ক তাদের সেফ ডিপোজিট বক্সের ভাড়া বাড়িয়ে দিয়েছে৷ এই সব সেফ ডিপোজিট বক্সে সোনা, হিরে, পেন্টিং ও অন্য দামি সামগ্রী রাখতে পারেন অ্যাকাউন্ট হোল্ডাররা৷ 

ব্যাঙ্কের গ্রাহকদের তথ্য আদানপ্রদান নিয়ে সুইত্জারল্যান্ডের সঙ্গে বিভিন্ন দেশ চুক্তি সই করলেও নয়া পদ্ধতি যথেষ্ট 'নিরাপদ', কারণ সরকারের শিকারি দৃষ্টি খুব একটা সুবিধা করতে পারবে না৷ চুক্তি অনুযায়ী ভারত সহ বিভিন্ন দেশ সঞ্চয়, জমা ও বিনিয়োগ সংক্রান্ত তথ্য চাইতে পারে সুইস ব্যাঙ্কগুলি থেকে৷ কিন্ত্ত, সেফ ডিপোজিট বক্স সংক্রান্ত তথ্য চুক্তির বাইরেই রয়েছে৷ ব্যক্তিগত স্তরে এ সব কথা বললেও কোনও ব্যাঙ্কের কোনও কর্তাই সরকারি ভাবে এই ধরনের অ্যাকাউন্টের চাহিদা নিয়ে মুখ খোলেননি৷ 

তবে, মনে করা হচ্ছে এই ধরনের বক্সের চাহিদা বেড়েই চলবে৷ একই সঙ্গে বাড়বে ১০০০ সুইস ফ্রাঁ ব্যাঙ্ক নোটের চাহিদাও৷ সুইস ন্যাশনাল ব্যাঙ্কের (এসএনবি) তথ্য অনুযায়ী, সুইত্জারল্যান্ডে মোট নোটের চাহিদার ৬১ শতাংশই ১০০০ সুইস ফ্রাঁ নোটের৷ এক সুইস ফ্রাঁ মোটামুটি ভাবে ভারতীয় ৫৯ টাকার সমতুল৷ ২০১১ সালের তুলনায় এই চাহিদা ৫০ শতাংশ বেড়ে গিয়েছে৷ ১০০০ ফ্রাঁর নোট এখন ভারতের ৫৯ হাজার টাকার সমতুল হওয়ার অল্প সংখ্যক নোটের মাধ্যমেই বিপুল অর্থ গচ্ছিত রাখা যাবে যা ব্রিটিশ পাউন্ড (সর্বোচ্চ ৫০ পাউন্ডের নোট, ভারতীয় মুদ্রায় ৪২৫০ টাকা), মার্কিন ডলার (সর্বোচ্চ ১০০ ডলার, ভারতীয় মুদ্রায় ৫৪০০ টাকা) ও ইউরোর (সর্বোচ্চ ৫০০ ইউরো, ভারতীয় মুদ্রায় ৩৬ হাজার টাকা) তুলনাতেও অনেক কম সংখ্যক নোট হবে৷ এখন বাজারে চালু ১০০০ ফ্রাঁর নোটের মোট মূল্য ভারতীয় টাকায় ২ লক্ষ কোটি (৩৫০০ কোটি সুইস ফ্রাঁ)৷ কালো টাকা সুইস ব্যাঙ্কে রাখা নিয়ে ভারতের রাজনীতি বারে বারে সরগরম হয়েছে৷ সুইত্জারল্যান্ডের বিভিন্ন ব্যাঙ্কে ভারতীয়দের ২১৮ কোটি সুইস ফ্রাঁ বা ১২,৮৫২ কোটি টাকা গচ্ছিত আছে, যা সে দেশের মোট বৈদেশিক মুদ্রার ০.১৪ শতাংশ৷ সুইত্জারল্যান্ডের বাইরে একই মডেলে তৈরি ব্যাঙ্কেও (লিখটেনস্টাইন, সিঙ্গাপুর ও বিভিন্ন দ্বীপরাষ্ট্রে এই ধরনের ব্যাঙ্ক রয়েছে) ভারতীয়দের কালো টাকা রয়েছে বলে অভিযোগ৷ 


এপ্রিল-ডিসেম্বর পর্যন্ত দেশের আর্থিক ঘাটতি দাঁড়িয়েছে প্রায় ৪.০৭ লক্ষ কোটি টাকা, যা লক্ষ্যমাত্রার ৭৯ শতাংশ৷ ঘাটতি পূরণে আপাতত বিলগ্নিকরণকেই হাতিয়ার করেছে সরকার৷ চলতি অর্থবর্ষে রাষ্ট্রায়ত্ত সংস্থার বিলগ্নিকরণের মাধ্যমে ৩০,০০০ কোটি টাকা তোলার লক্ষ্যমাত্রা নিয়েছিল সরকার৷ তবে, এখনও পর্যন্ত উঠেছে ১০,০০০ কোটি টাকা৷ 

সরকারের ভর্তুকির খরচ কমাতে ডিজেলের দামও বাড়িয়েছে৷ ভর্তুকি যুক্ত সিলিন্ডারকেও মহার্ঘ করার চেষ্টা হচ্ছে৷ তবে এরই মধ্যে নভেম্বরে সরকার অতিরিক্ত ৩২,১২০ কোটি টাকা খরচ করার অনুমোদন চায় লোকসভায়৷ তার মধ্যে ২০০০ কোটি টাকা দেওয়া হয় এয়ার ইন্ডিয়ার পুনরুজ্জীবনে৷ বাকি টাকা দেওয়া হয়েছে জ্বালানি ভর্তুকি খাতে৷

ভারতের বাজার ধরতে মার্কিন মুলুকে 'লবি' করেছে ওয়ালমার্ট৷ এই ইস্যুতে ভারতীয় রাজনৈতিক মহলে চাপানউতোর এখনও জারি রয়েছে৷ সম্প্রতি, ওয়ালমার্টের লবিং নিয়ে তদন্তে অনুমোদন দিয়েছে মন্ত্রিসভা৷ তবে ওয়ালমার্ট বহাল তবিয়তে মার্কিন মুলুকে 'লবিং' চালিয়ে যাচ্ছে৷ ৩১ ডিসেম্বর শেষ হওয়া ত্রৈমাসিকে লবিং খাতে মার্কিন প্রশাসনের কাছে প্রায় ৮ কোটি টাকা খরচ করেছে ওয়ালমার্ট৷ মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের আইন অনুযায়ী 'লবি' খাতে খরচ হওয়া অর্থের খতিয়ান দিতে গিয়ে এ কথা জানা গিয়েছে৷ 

গত ৯ ডিসেম্বর জানা গিয়েছিল ভারতের বাজারে ঢোকার সুযোগ করে দিতে গত চার বছর ধরে মার্কিন সেনেটকে তদবির করে এসেছে ওয়ালমার্ট৷ আর মার্কিন রাজনৈতিক মহলে এই 'লবি' করতে গিয়ে ১২৫ কোটি টাকা খরচও করেছে ওই সংস্থা৷ গত ৩০ সেপ্টেম্বর শেষ হওয়া ত্রৈমাসিকেই মার্কিন সেনেটে ১০ কোটি টাকা দিয়েছে সংস্থাটি৷ প্রত্যক্ষ বিদেশি বিনিয়োগ ইস্যুতে ভারতের অবস্থানকে প্রভাবিত করার জন্য পার্লামেন্টের উচ্চকক্ষে ওই টাকা পাঠিয়েছে ওয়ালমার্ট৷ সেপ্টেম্বর ত্রৈমাসিকের রিপোর্ট বলছে, ভারতে ওয়ালমার্টের ব্যবসার পথ সুগম করতে মার্কিন সেনেট, মার্কিন হাউজ অফ রিপ্রেজেন্টেটিভস, মার্কিন ট্রেড রিপ্রেজেন্টেটিভ ও মার্কিন বিদেশ দপ্তরকে পয়সা দিয়েছে সংস্থাটি৷ 

মার্কিন প্রশাসনের সাম্প্রতিক রিপোট বলছে, ২০১২ সাল লবিং খাতে প্রায় ৩৩ কোটি টাকা খরচ করেছে ওয়ালমার্ট৷ ভারতে খুচরোয় এফডিআই চালু করা থেকে শুরু করে বিভিন্ন বিষয়কে তাঁদের অনুকূলে আনতে মার্কিন কংগ্রেসের দ্বারস্থ হয়েছে ওয়ালমার্ট৷ গত চার বছর ধরে এখনও পর্যন্ত প্রায় ১৮০ কোটি টাকা লবিংয়ের জন্য মার্কিন প্রশাসনকে দিয়েছে বিশ্বের বৃহত্তম খুচরো ব্র্যান্ড৷ দেখা যাচ্ছে, প্রতি ত্রৈমাসিকে অন্তত ৫০টি বিষয়ে লবি করার জন্য মার্কিন সরকারকে কাজে লাগিয়েছে ওয়ালমার্ট৷ আর বরাবরই ভারতের বিনিয়োগ ও ভারতীয় বাজারে প্রবেশের বিষয়টিতে গুরুত্ব দিয়েছে ওয়ালমার্ট৷ 

বছরের ৪৪ হাজার কোটি ডলারের টার্নওভার রাখা ওয়ালমার্টের পাখির চোখ ছিল ভারত৷ কারণ ৫০ হাজার কোটি মার্কিন ডলারের খুচরো বাজার রয়েছে ভারতে৷ বিশেষজ্ঞদের মতে, ২০২০ সালের মধ্যে ভারতে খুচরো বাজারের মূল্য হবে এক লক্ষ কোটি মার্কিন ডলার৷ সেখানে আন্তর্জাতিক ব্যবসা দরজা খোলার কোনও সুযোগ ছেড়ে দেবে কেন৷ এ বছর ১৪ সেপ্টেম্বর বহুব্র্যান্ডের খুচরো ব্যবসায় প্রত্যক্ষ বিদেশি বিনিয়োগের প্রস্তাবে সিলমোহর দেয় ইউপিএ সরকার৷ যদিও ২০১১-র আগে খুচরো ব্যবসায় বিদেশি পুঁজি প্রবেশ করানোর বিরোধিতা করেছে এসেছিল খোদ সরকারই৷ এক বছরের মধ্যে সরকারের অবস্থান বদলে গেল কেন? এর পিছনে মার্কিন সরকারের প্রভাব রয়েছে বলেই দাবি জানিয়ে এসেছেন বিরোধীরা৷ 

সলমন রুশদি, বা বিশ্বরূপম নিয়ে আলোচনার থেকে মুসলিমদের অন্যান্য গুরুতর সমস্যা সমাধানের দিকে বেশি নজর দেওয়া উচিত।  মন্তব্য করলেন নোবেলজয়ী অর্থনীতিবিদ অর্মত্য সেন। বইমেলায় এক অনুষ্ঠানে তিনি বলেন,  রুশদি কিংবা বিশ্বরূপম নিয়ে বেশি আলোচনা করলে মুসলিম সমাজের অন্যান্য গুরুতর সমস্যা আড়াল হয়ে যাবে।

সলমন রুশদির কলকাতায় আসার ওপর নিষেধাজ্ঞা জারির ঘটনায় তোলপাড় পড়ে যায় রাজ্য রাজনীতিতে। সমালোচনার ঝড় ওঠে সংস্কৃতি মহলে। রুশদিকে কলকাতায় আসতে না দেওয়ার ঘটনায় রাজ্য সরকারের কড়া সমালোচনা করেন চিত্র পরিচালক অপর্না সেনও। তবে, সলমান রুশদি বা বিশ্বরূপম ঘিরে সম্প্রতি তৈরি হওয়া বিতর্ক মুসলিমদের গুরুত্বপূর্ণ সমস্যাগুলি থেকে মানুষের নজর ঘুরিয়ে দিচ্ছে বলে মনে করেন নোবেলজয়ী অর্থনীতিবিদ অর্মত্য সেন। তাঁর আশঙ্কা, এনিয়ে তৈরি হওয়া বিতর্কে সংঘ্যালঘু সম্প্রদায়ের অন্নুয়নের দিকটা ঢাকা পড়ে যেতে পারে।
 

অভিনেতা রাহুল বোস  রুশদির কলকাতা সফরের ওপর নিষেধাজ্ঞার কড়া নিন্দা করেছেন।  
দেখুন কী বললেন রাহুল বোস 

রবিবার কলকাতা বইমেলায় অনুষ্ঠানে যোগ দিয়েছিলেন অর্মত্য সেন। ছিলেন শর্মিলা ঠাকুর।


মানব উন্নয়ন, নারী-পুরুষ সাম্যে বাংলাদেশ ভারতের চেয়ে এগিয়ে
-----------অমর্ত্য সেন
বিশেষ প্রতিনিধি
নোবেল বিজয়ী অর্থনীতিবিদ অর্মত্য সেন বলেছেন, মানব উন্নয়নের প্রতিটি সূচকেই বাংলাদেশ ভারতের চেয়ে এগিয়ে আছে। মানব উন্নয়ন সূচকে লৈঙ্গিক সমতা খুবই গুরুত্বপূর্ণ। এক্ষেত্রে ভারতকে ছাড়িয়ে যাচ্ছে বাংলাদেশ। শনিবার ভারতের বাণিজ্যিক রাজধানী মুম্বাই-এ জিএল মেহতা মেমোরিয়াল বক্তৃতায় অর্মত্য সেন একথা বলেন। অর্মত্য সেন আরো বলেন, কিছুুদিন আগেও বাংলাদেশ মানব উন্নয়ন সূচকে ভারতের পেছনে ছিল। অথচ অল্প সময়ে এ চিত্র পাল্টে গেছে। বাংলাদেশ এখন একমাত্র দেশ যেখানে স্কুলে ছেলেদের চেয়ে মেয়েদের সংখ্যা বেশি। বাংলাদেশের গড় আয়ু বেড়েছে। মৃত্যুহার কমেছে এবং কর্মক্ষেত্রসহ সর্বত্র নারীর অংশগ্রহণ বেশি। বাংলাদেশের রাজনীতিতেও লৈঙ্গিক সমতার গুরুত্ব দিন দিন বাড়ছে।

ভারতের বিভিন্ন রাজ্যে মানব উন্নয়ন, বিশেষ করে লৈঙ্গিক সমতার বিষয়টি নিয়ে যেভাবে কাজ করা হচ্ছে তার কড়া সমালোচনা করেন অর্মত্য সেন। সম্প্রতি নয়াদিল্লীতে চলন্ত বাসে এক ছাত্রীকে গণধর্ষণ ও হত্যাকাণ্ড প্রসঙ্গে তিনি বলেন, খোদ রাজধানীতে এমন ঘটনা ঘটেছে বলে সবার দৃষ্টি আকর্ষণ করেছে; কিন্তু পুরো ভারত বর্ষের গ্রামাঞ্চলে নিম্নবর্ণের দলিত নারীরা এমন অসম্মানজনক পরিস্থিতির মুখোমুখি হচ্ছে। অর্মত্য সেন আরো বলেন, জনস্বাস্থ্য সেবা খাতে ভারত মোট জিডিপির এক দশমিক দুই শতাংশ বরাদ্দ দেয়। চীন দেয় দুই দশমিক সাত শতাংশ। আর ইউরোপীয় দেশগুলো দেয় সাত থেকে আট শতাংশ। বাজার অর্থনীতিকে গুরুত্ব দিতে হবে; কিন্তু বাজার অর্থনীতিতে ডুবে গেলে চলবে না। অনেকের মধ্যেই ভুল ধারণা রয়েছে যে, চীন বাজার অর্থনীতিকে পুরোপুরি দখল করে নিয়েছে। আসলে চীন জনস্বাস্থ্য সেবায় গুরুত্ব দিচ্ছে এবং এর ফলশ্রুতিতে ভারতের অনেক উপরে আছে।

20 December 2012, Thursday
ভারতে অগ্রগতির মূল বাধা অশিক্ষা : অমর্ত্য সেন
আন্তর্জাতিক ডেস্ক : অন্যান্য দেশের তুলনায় ভারতের পিছিয়ে পড়ার অন্যতম কারণ শিক্ষার অভাব। প্রতীচি ট্রাস্টের এক সেমিনারে বৃহস্পতিবার এই মন্তব্য করেন নোবেলজয়ী অর্থনীতিবিদ অর্মত্য সেন। তার অভিযোগ স্বাধীনতা পরবর্তী দশকগুলিতে ভারতের শিক্ষার প্রসারে যথেষ্ট উদ্যোগ নেওয়া হয়নি।

যে কোনও সমাজের অগ্রগতির মূলে রয়েছে শিক্ষা। শিক্ষার অভাবেই অন্যান্য দেশের তুলনায় ক্রমশ  পিছিয়ে পড়ছে ভারত। এমনই মনে করেন নোবেলজয়ী অর্থনীতিবিদ অর্মত্য সেন। তার অভিযোগ, স্বাধীনতার পরবর্তী দশকগুলিতে প্রত্যাশিত হারে এদেশে শিক্ষার প্রসার ঘটেনি। বিষয়টি নিয়ে শঙ্কাও প্রকাশ করেছেন তিনি। শিক্ষার প্রসারে কেন্দ্র এবং রাজ্য সরকারগুলিকে আরও গুরুত্ব দেওয়ার পরামর্শ দিয়েছেন অর্মত্য সেন।

সমস্যা সমাধানে সাধারণ মানুষের সচেতন অংশগ্রহণেরও প্রয়োজন রয়েছে বলে মনে করেন অর্মত্য সেন। নোবেলজয়ী এই অর্থনীতিবিদের পরামর্শ, শিক্ষার গুরুত্ব সম্পর্কে সচেতনতা বৃদ্ধির কাজে রাজনীতিবিদদের আরও সক্রিয় হওয়া উচিত। 
(২১১২২০১২-ফাস্টনিউজ/এআরজে/১১.১৯)

কলকাতা: রান্নার গ্যাস, বিদ্যুতের দামবৃদ্ধি-সহ বিভিন্ন ইস্যুতে বামেদের কেন্দ্র-বিরোধিতা নিয়ে প্রশ্ন তুললেন অমর্ত্য সেন৷ রবিবার বইমেলায় লিটারেরি মিটে অমর্ত্যের বার্তা, যেসব ইস্যুকে হাতিয়ার করে বামেরা আন্দোলনে সরব হচ্ছে, তা পাল্টাতে হবে৷ বামেদের আন্দোলন-কৌশল নিয়ে প্রশ্ন তোলার পাশাপাশি নেতৃত্ব নিয়ে ভাবারও পরামর্শ দেন তিনি৷  
২০০৮ সালে ভারত-মার্কিন পরমানু চক্তির বিরোধিতায় সরব হয় বামেরা৷ ইউপিএ ওয়ান সরকারের উপর থেকে তারা সমর্থনও প্রত্যাহার করে৷ পরমাণু চুক্তির বিরোধিতায় কেন্দ্রের উপর থেকে বামেদের সমর্থন প্রত্যাহারের এই সিদ্ধান্ত ভুল ছিল বলেও অভিমত অমর্ত্যর৷ 

বাম রাজনীতির কার্যত রাজধানী পশ্চিমবঙ্গ৷ ২০১১র বিধানসভা ভোটে এ রাজ্যে বামেদের চৌত্রিশ বছরের দূর্গে ধস নামে৷  সাধারণ মানুষের কাছ থেকে নেতাদের দূরত্ব তৈরি হওয়াকে ভোটে বিপর্যয়ের অন্যতম কারণ হিসেবে ব্যাখ্যা করেছে বাম নেতৃত্বই৷ এদিন অমর্ত্য সেনও জনসংযোগ বাড়ানোর উপর জোর দিতে বলেন৷ পরামর্শ দেন নেতৃত্ব নিয়ে ভাবার৷ 
রান্নার গ্যাসের দামবৃদ্ধি, এফডিআই-সহ কেন্দ্রের একাধিক সিদ্ধান্তের প্রতিবাদে, ২০ থেকে ২১শে ফেব্রুয়ারি টানা ৪৮ ঘণ্টার ধর্মঘট ডেকেছে কেন্দ্রীয় শ্রমিক সংগঠনগুলি৷ ধর্মঘটকে সমর্থন করছে সিপিএম৷ কিন্তু যে গরিবের স্বার্থরক্ষার কথা বলে বাম রাজনীতি, টানা ৪৮ ঘণ্টার ধর্মঘট ডেকে সেই প্রান্তিক মানুষের রুটি-রুজিরই ক্ষতি করা কেন, এ নিয়ে সিপিএমের অন্দরেই উঠেছে প্রশ্ন৷ এই পরিস্থিতিতে বামেদের আন্দোলনের ইস্যুগুলিকে বদলানো নিয়ে এদিন অমর্ত্য যে মন্তব্য করেছেন, তা যথেষ্ট তাত্‍‍পর্যপূর্ণ বলে মনে করছে ওয়াকিবহাল মহল৷ 


রুশদি বিতর্কে দুরকম কথা বললেন রাজ্য সরকারের দুই মন্ত্রী। পঞ্চায়েতমন্ত্রী সুব্রত মুখার্জির বক্তব্য, রুশদির কলকাতায় না আসা নিয়ে, সরকারের বক্তব্য সুলতান আহমেদই বলে দিয়েছেন। অন্যদিকে, পরিবহণমন্ত্রী মদন মিত্রের দাবি, রুশদির কলকাতা সফর বাতিল হওয়া নিয়ে সরকারি স্তরে কোনও বক্তব্যই পেশ করা হয়নি। এর আগে রুশদির কলকাতা সফর বাতিল হওয়ার জন্য মুখ্যমন্ত্রীকে ধন্যবাদ জানিয়েছিলেন তৃণমূল সাংসদ সুলতান আহমেদ। তখন তাঁর বক্তব্য ছিল, সলমন রুশদিকে কলকাতা না আসতে দিয়ে ভাল করেছেন মুখ্যমন্ত্রী। 

অন্যদিকে সলমন রুশদিকাণ্ডে রহস্য আরও বাড়ল। রুশদি আগেই জানিয়েছিলেন, তাঁর কাছে কলকাতা সফরের আমন্ত্রণ পত্র এমনকি বিমানের টিকিটও রয়েছে। সংবাদমাধ্যমে সেই টিকিটের ছবিও প্রকাশিত হয়। প্রশ্ন উঠেছে, এই বিমানের টিকিট রুশদির কাছে পৌঁছে দিল কে ? গিল্ডকর্তা ত্রিদিব চট্টোপাধ্যায়ের মন্তব্য, কিছু কিছু বিষয় রহস্যাবৃত থাকাই ভালো। 

বিস্ফোরক ট্যুইটে সফর বাতিলের জন্য মুখ্যমন্ত্রীকেই দায়ী করেছিলেন বিশিষ্ট সাহিত্যিক। সরকার মুখে কুলুপ আঁটলেও, তৃণমূল সাংসদ সুলতান আহমেদ এজন্য সরকারকে ধন্যবাদ জানান।  রুশদি জানিয়েছিলেন তাঁর কাছে আমন্ত্রণ পত্রের ইমেল ও বিমানের  টিকিট  রয়েছে।  সংবাদমাধ্যমে ইতিমধ্যেই সেই টিকিটের ছবিও প্রকাশিতও হয়েছে। বিতর্কে দাঁড়ি টানতে সোমবার সাংবাদিকদের মুখোমুখি হয়েছিলেন  গিল্ড কর্তৃপক্ষ। 

তাহলে, বিশিষ্ট সাহিত্যিকের কাছে বিমানের টিকিট পৌঁছে দিল কে?


স্পষ্ট কথা স্পষ্ট করে বলেননি গিল্ড কর্তা। উল্টে রুশদিকাণ্ডে আরও রহস্য বাড়িয়ে দিলেন।  


ই-মেলে রুশদির 'উড়ান টিকিট'


Monday, 04 February 2013

সলমন রুশদির কলকাতায় আসার উড়ানের টিকিট প্রকাশ্যে আনল দ্য টেলিগ্রাফ৷ বইমেলার উদ্যোক্তাদের তরফেই পাঠানো হয়েছিল টিকিট৷ যদিও, পুরনো অবস্থানেই অনড় বুক সেলার্স অ্যান্ড পাবলিশার্স গিল্ড৷ তাদের পাল্টা দাবি, ই-মেল থেকে প্রমাণ হয় না যে রুশদিকে লিটারেরি মিটে আসার আমন্ত্রণ জানানো হয়েছিল৷

রুশদিকাণ্ড নিয়ে তুমুল বিতর্কের মধ্যেই প্রকাশ্যে চাঞ্চল্যকর তথ্য৷কলকাতা বইমেলায় প্রখ্যাত লেখক সলমন রুশদিকে আমন্ত্রণ জানানো এবং পরে তাঁকে আসতে না দেওয়া নিয়ে যে বিতর্ক চলছে তারইমধ্যে  'দ্য টেলিগ্রাফ' পত্রিকার হাতে এসেছে কলকাতা লিটারেরি মিটের আয়োজক সংস্থা গেমপ্ল্যানের ই-মেল থেকে নেওয়া সলমন রুশদির পাঠানো বিমান টিকিটের ই-মেল৷ সেই মেলে বলা হয়েছে, ৩০ জানুয়ারি মুম্বই থেকে কলকাতা আসার জন্য রুশদির নামে সকাল ৭.৩৫-এর একটি উড়ানের টিকিট কাটা হয়৷ ৩১ জানুয়ারি কলকাতা থেকে মুম্বই ফেরার টিকিটও কাটা হয়৷ দুটি উড়ানের টিকিটই কাটা হয় ২৫ জানুয়ারি৷ একদিকে যখন কলকাতা বইমেলার আয়োজক বুক সেলার্স অ্যান্ড পাবলিশার্স গিল্ডের দাবি, লেখককে আমন্ত্রণই জানানো হয়নি, তখন মিডনাইটস চিলড্রেনের ভারতীয় ডিস্ট্রিবিউটরকে পাঠানো গেমপ্ল্যানের মালবিকা বন্দ্যোপাধ্যায়ের ই-মেল-এ স্পষ্ট লেখা রয়েছে, লিটারেরি মিটের একটি সেশনের জন্য প্রয়োজন৷


'দ্য টেলিগ্রাফ' সূত্রে খবর, গেমপ্ল্যান এবং ওই ডিস্ট্রিবিউটরের মধ্যে আলোচনার পর লেখকের সম্ভাব্য কলকাতা সফরের একটি সূচিও ঠিক হয়েছিল৷ সেই সূচি অনুযায়ী-
৩০ জানুয়ারি সকাল সাড়ে ৯টায় রুশদির কলকাতায় নামার কথা ছিল৷ ১১.৩০টায় পৌঁছনর কথা হোটেলে৷ 
মধ্যহ্নভোজের পর দুপুর দেড়টা থেকে বিকেল সাড়ে ৫টা পর্যন্ত সাংবাদিকদের সঙ্গে কথা৷ 
সন্ধে ৬টায় লিটারেরি মিটের নিকটবর্তী হোটেলের উদ্দেশে রওনা দেওয়ার কথা৷ 
সন্ধে ৬.৪৫৷ রাহুল, দীপা, ডেভিডের সাংবাদিক বৈঠক৷ সলমন পৃথক অনুষ্ঠানে কিছু বই-এ স্বাক্ষর করবেন৷ 
সন্ধে সাড়ে ৭টায় অনুষ্ঠানস্থলে যাবেন রাহুল, দীপা ও ডেভিড৷ 
সন্ধে ৭.৪৫ এ অনুষ্ঠান শুরু৷ 
ঠিক ওই সময়েই দর্শকদের ঢোকার গেট দিয়ে ঢুকবেন সলমন রুশদি৷ 
রাত ৮.৪৫-তে ফিরবেন হোটেলে৷ 
পরের দিন সকাল ৭.১৫ নাগাদ বিমানবন্দরের উদ্দেশে রওনা দেওয়ার কথা ছিল রুশদির৷

প্রথম থেকেই রুশদির দাবি, তাঁকে বইমেলার লিটারেরি মিটে আমন্ত্রণ জানানো হয়েছিল৷ সফর আটকানোর জন্য সরাসরি মুখ্যমন্ত্রীকে কাঠগড়ায় তুলে তিনি টুইটারে লেখেন, আমার কলকাতায় আসা আটকাতে পুলিশকে নির্দেশ দেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়৷ লিটারারি মিট উদ্যোক্তারা বলছেন, আমাকে আমন্ত্রণ জানানো হয়নি৷ তাঁরা মিথ্যা কথা বলছেন৷ প্রমাণ হিসেবে আমার কাছে একাধিক ই-মেল এবং তাঁদের পাঠানো বিমানের টিকিট রয়েছে৷ কিন্তু, রুশদির এই দাবিকে মিথ্যে বলে খারিজ করে দেন গিল্ড কর্তা ত্রিদিব চট্টোপাধ্যায়৷

বইমেলায় লিটারারি মিট শেষ গিয়েছে রবিবার৷ কিন্তু, রুশদি বিতর্ক এখনও পিছু ছাড়ছে না গিল্ডের৷ তবে অস্বস্তির মুখেও গিল্ড অবশ্য অনড় পুরনো অবস্থানেই৷ এমনকী, রুশদিকে পাঠানো ই-মেল প্রকাশ্যে আসার পরেও নিজের অবস্থানে অনড় গিল্ড৷ গিল্ডকর্তা ত্রিদিব চট্টোপাধ্যায়ের দাবি, ই-মেল থেকে প্রমাণ হয় না যে রুশদিকে লিটারেরি মিটে আসার আমন্ত্রণ জানানো হয়েছিল৷ বইমেলায় এক সাংবাদিক সম্মেলনে ত্রিদিবের সাফাই, সব রহস্যের সমাধান হয় না, রুশদিকাণ্ডে বারমুডা ট্র্যায়াঙ্গল রহস্যও উদাহরণ হিসেবে টেনে প্রসঙ্গ এড়াতে চেয়েছেন তিনি ৷ জবাব এড়াতে বিতর্কের জন্য সংবাদমাধ্যমকেও কটাক্ষ করেছেন গিল্ড কর্তা৷ 
রুশদিকাণ্ডে উত্তাল রাজ্য৷ তীব্র সমালোচনার মুখে রাজ্য সরকার৷ এই পরিস্থিতিতে রুশদিকে পাঠানো এই ইমেল বার্তা প্রকাশ্যে আসায়, সেই বিতর্কে ঘৃতাহুতি পড়ল বলেই মনে করছে ওয়াকিবহাল মহল৷

http://abpananda.newsbullet.in/kolkata/59/33202


রুশদি-বিতর্কে এবার মুখ খুললেন সাহিত্যিক মহাশ্বেতা দেবী৷ রবিবার, কলকাতা বইমেলায় তাঁকে সংবর্ধনা দেয় প্রদেশ কংগ্রেস৷ সেখানেই মহাশ্বেতা জানান, রুশদিকে এই রাজ্যে না ঢুকতে দেওয়ার ঘটনায় তিনি দুঃখিত৷ বলেন, স্বচ্ছন্দেই শহরে আসতে পারতেন রুশদি৷ ক্ষুণ্ণ হত না নিরাপত্তা৷

রবিবারই সকালে কলকাতা হাফ ম্যারাথনে অংশ নিতে এসে অভিনেতা রাহুল বসুও ফের সরব হন রুশদি-ইস্যুতে৷ তাঁর মন্তব্য, যা হয়েছে তা অত্যন্ত দুঃখজনক৷ আসল সত্যিটা জানা যাবে না বলেও কটাক্ষ রাহুলের৷ তাঁর প্রশ্ন, ভারতে আসার ব্যাপারে লেখকের কোনও নিষেধ না থাকা সত্ত্বেও তিনি স্বাধীন ভাবে চলাফেরা করতে পারবেন না, তা সংবিধানে কোথায় বলা আছে?  
রুশদির লেখা বই মিডনাইটস চিলড্রেনের উপর তৈরি ছবির প্রচারে গত বুধবার একলাই শহরে আসেন রাহুল৷ তিনি ছবিটিতে জুলফিকারের চরিত্রে অভিনয় করেছেন৷ সেদিনও রুশদি-বিতর্ককে দুঃখজনক বলে মন্তব্য করেন রাহুল৷ এ ধরনের ঘটনা এড়াতে সরকারকে আরও যত্নবান হওয়ারও আবেদন জানান রাহুল৷ 

http://abpananda.newsbullet.in/kolkata/59-more/33189-2013-02-04-04-24-38


ফের নিশানায় বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য। এবার একুশে জুলাই কমিশনে গিয়ে ১৯৯৩ সালের ২১ শে জুলাই যুব কংগ্রেসের মিছিলের ওপর পুলিসের গুলি চালনার নির্দেশ তিনিই দিয়েছিলেন বলে অভিযোগ করলেন ক্রীড়া ও পরিবহন মন্ত্রী মদন মিত্র। অভিযোগ মিথ্যা প্রমাণিত হলে ক্রীড়ামন্ত্রীর চ্যালেঞ্জ মন্ত্রিত্ব ছেড়ে দেবেন। 
 
 ১৯৯৩ সালের ২১ শে জুলাই যুব কংগ্রেসের মিছিলের ওপর পুলিসের গুলিচালনার ঘটনার তদন্তে গঠিত হয়েছে একুশে জুলাই কমিশন। কমিশনের আজ সাক্ষ্য দেন ক্রীড়া পরবহণ মন্ত্রী মদন মিত্র। তিনি জানিয়েছেন, ঘটনার আগের দিন ২০ জুলাই তিনি লালবাজারে পুলিস কর্তাদের বৈঠক করেন। উপস্থিত ছিলেন পুলিস কমিশনার তুষার তালুকদার, দীনেশ বাজপেয়ি, গৌতমমোহন চক্রবর্তী, দেবেন বিশ্বাস। সেখানেই একথা চলাকালীন তিনি জানতে পারেন বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যের নির্দেশের কথা।

২১ জুলাই কমিশনকে মদন মিত্র যা জানিয়েছেন, তার মোদ্দা কথা হল পরিকল্পনামাফিক পুলিস গুলি চালিয়েছিল


ভাতার পরিবর্তে রাজনৈতিকভাবে ব্যবহারের চেষ্টা হচ্ছে ইমামদের। রাজ্যের শাসক দলের বিরুদ্ধে এমন অভিযোগ ইমামদেরই একাংশের। গতকাল উত্তর চব্বিশ পরগনার বসিরহাটে তৃণমূলের পঞ্চায়েতি রাজ সম্মেলনে সরকারি ভাতাপ্রাপ্ত ইমামদের আমন্ত্রণ জানানো হয়েছিল। আর তারপরই সরব হয়েছেন ইমামদের একাংশ।

অনুরোধের মোড়কে রয়েছে আসলে ক্ষোভ। রবিবার বসিরহাটে তৃণমূলের পঞ্চায়েতি রাজ সম্মেলনে আমন্ত্রণ জানানো হয়েছিল জেলার কয়েকজন ইমামকে। এই আমন্ত্রণই বিতর্কের কারণ।         
  
ইমামভাতা চালুর কথা ঘোষণা করে বিতর্কে জড়িয়েছিলেন মুখ্যমন্ত্রী। তখনই অভিযোগ উঠেছিল, মুসলিম ভোটব্যাঙ্ক হাতে রাখতেই এই সিদ্ধান্ত নিয়েছেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। রবিবার সেই অভিযোগটাই করলেন বসিরহাটের আমিনিয়া মিশনের অধিকর্তা।    
 
অনেক ইমামই সরকারি ভাতা ঠিকমতো পাচ্ছেন না, এমন অভিযোগ উঠেছিল আগেই। এবার উঠল ভাতার বিনিময়ে রাজনৈতিক আনুগত্য কিনতে চাওয়ার অভিযোগ। অভিযোগের তিরটা মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের দলের দিকেই। 


এবার মা মাটি সরকারের মাটি উত্‍সব। রাজ্য সরকারের শূন্য কোষাগার নিয়ে যখন প্রতিদিনই কেন্দ্র ও পূর্বতন বাম সরকারের বিরুদ্ধে ক্ষোভ উগড়ে দিচ্ছেন মুখ্যমন্ত্রী, তখন মাটি উত্‍সবে খরচ হবে দশ কোটি টাকা। 

মূলত কৃষি দফতরের উদ্যোগে হবে এই উত্‍সব। সহযোগিতায় থাকছে আরও আটটি দফতর। পানাগড়ে নয় ফেব্রুয়ারি উত্‍সবের সূচনা করবেন মুখ্যমন্ত্রী। ওই দিন সব মন্ত্রীকে পরতে হবে মাটি রঙের পাঞ্জাবি। নির্দেশ মুখ্যমন্ত্রীর। মুখ্যমন্ত্রী নিজে পড়বেন মাটি রঙের শাল। 

মাটির সঙ্গে সরকারের ঘনিষ্ঠ সংযোগ, গ্রামীণ জীবনযাত্রার নানা দিক তুলে ধরতে উত্‍সবে স্টল হবে একশোটি। এর মধ্যে বাহাত্তরটি স্টল হবে রাজ্য সরকারের বিভিন্ন দফতরের। প্রতিটি জেলাকেও স্টল করার নির্দেশ দিয়েছেন মুখ্যমন্ত্রী। উত‍সব চলবে ষোলো ফেব্রুয়ারি পর্যন্ত। 

উত্‍সব সফল করতে ৯ জন মন্ত্রীকে নিয়ে তৈরি হয়েছে টাস্ক ফোর্স। আগামিকালই বেলা একটায় বসছে টাস্ক ফোর্সের মিটিং।


মহিলাদের ওপর অত্যাচার রুখতে বিচারপতি জে এস ভার্মা কমিটির করা কোনও সুপারিশকেই কেন্দ্রীয় সরকার বাতিল করবে না বলে জানিয়ে দিলেন অর্থমন্ত্রী পি চিদাম্বরম। সোমবার তিনি বলেন, "প্রত্যেককে আবেদন করব, গুরুত্ব সহকারে এই ধরনের ঘটনার তদন্ত করতে।" মহিলাদের নিরাপত্তা সুনিশ্চিত করতে বর্তমানের আইনেরও পরিবর্তন করা দরকার বলে মনে করছেন তিনি। 

ধর্ষণ বিরোধী আইন কঠোর করা নিয়ে আরও কয়েক দফা আলচনা এখনও বাকি বলে জানিয়েছেন অর্থমন্ত্রী। এ দিন চিদাম্বরম বলেন, "মহিলাদের নিরাপত্তা সুনিশ্চিত করতে ও দোষীদের কড়া শাস্তির ব্যবস্থা করতে বিলটির গঠনে সমস্ত স্তরে আলোচনা করা হবে।" 


কড়া আইন বলবৎ হওয়া পর্যন্ত কঠোর ভাবেই দোষীদের বিরুদ্ধে ব্যবস্থা নেওয়া যাবে বলে আশা করছে কেন্দ্র। আজ এমনটাই জানিয়েছেন কেন্দ্রীয় অর্থমন্ত্রী।


রাজধানীর রাজনীতিতে মোদীর পক্ষে-বিপক্ষে হাওয়া এখন চরমে। ২০১৪-র নির্বাচনে যুব সমর্থন যে একটা বড় ফ্যাক্টর হতে চলেছে। সম্ভবত সেটা আঁচ করেই আগামি বুধবার রাজধানীতে পা রাখতে চলেছেন গুজরাত মুখ্যমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদী।

স্থানীয় সংবাদ মাধ্যম সূত্রে জানা গিয়েছে, বুধবার দিল্লির শ্রীরাম কলেজের ছাত্রদের উদ্দেশ্যে বক্তব্য রাখবেন মোদী। লোকসভা নির্বাচন নিয়ে উত্তেজনার পারদ যখন কার্যত চড়তে শুরু করেছে, তখন মোদীর ভাষণে ভাবি প্রধানমন্ত্রীর সুরই শোনা যাবে। এমনটাই আশা রাজনৈতিক মহলের। কলেজের ছাত্রদের সঙ্গে আলাপচারিতায়ও মাতবেন তিনি। বিজেপির একাংশের মতে, দলের নেতারা চান, তরুণ সমাজের সঙ্গে বেশি করে মেশা প্রয়োজন মোদীর। সেই কারণের শ্রীরাম কলেজে আলোচনাচক্রের আয়োজন বলে মনে করা হচ্ছে। 

অন্যদিকে সংঘ পরিবারের কাছের ধর্মীয় সংগঠন বলে পরিচিত ভিএইচপি আগামী ৫ ও ৬ তারিখ এলাহাবাদে কুম্ভ মেলায় মোদীর প্রধানমন্ত্রিত্বের যৌক্তিকতা নিয়ে আলোচনা করবে। ৬ তারিখ কুম্ভ প্রদর্শনে যাওয়ার কথা বিজেপি সভাপতি রাজনাথ সিংয়েরও। প্রসঙ্গত, গত সপ্তাহে বিজেপি ও আরএসএস নেতৃত্বের সঙ্গে বৈঠকের পর ভিএইচপি-র তরফে স্পষ্ট করে দেওয়া হয়, মোদীকেই প্রধানমন্ত্রী হিসাবে দেখতে চান তাঁরা।

যদিও মোদীকে এখনই প্রধানমন্ত্রীর পদপ্রার্থী ঘোষণা করার কথা অস্বীকার করেছে বিজেপি শীর্ষ নেতৃত্ব। বিতর্ক উস্কে দিয়ে এনডিএ শরিক জেডি(ইউ) নেতারা জানিয়েছেন, "প্রধানমন্ত্রী পদের প্রতিন্দ্বিতা কে করবেন সেটা ঠিক করবে রাজনৈতিক দলগুলিই।" ধর্মীয় আখারায় তার সিদ্ধান্ত হয় না বলে মন্তব্য করেছেন জেডি(ইউ) নেতা শিবানন্দ তিওয়ারি। 

প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী হিসেবে নরেন্দ্র মোদীর নাম নিয়ে যখন জেডি(ইউ)য়ের সঙ্গে বিবাদ তুঙ্গে, তখন নরেন্দ্র মোদীকেই ঢালাও সার্টিফিকেট দিয়েছেন বিজেপি সভাপতি রাজনাথ সিং। রবিবার মধ্যপ্রদেশের ভোপালে এক সাংবাদিক সম্মেলনে রাজনাথ সিংয়ের মন্তব্য, মোদী অত্যন্ত যোগ্য। মোদীই সবচেয়ে জনপ্রিয় নেতা। তাহলে কি ২০১৪-র লোকসভা নির্বাচনে প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রীই? বিজেপি সভাপতির অবশ্য দাবি, শরিক দলের সঙ্গে আলোচনা করেই দলের সংসদীয় বোর্ড চূড়ান্ত সিদ্ধান্ত নেবে। মোদীকে প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী হিসেবে তুলে ধরার পক্ষে সওয়াল করায়, বিশ্ব হিন্দু পরিষদকে কটাক্ষ করেছে এনডিএ শরিক জেডি(ইউ)। সেই বিতর্কে নতুন মাত্রা যোগ করল বিজেপি সভাপতির এই মন্তব্য।


এক মুহূর্তের স্তব্ধতা, তবে রুশদি নিয়ে
'বিশদে' গেলেন না অমর্ত্য
জাগরী বন্দ্যোপাধ্যায়
ইমেলায় লিট মিটের শেষ দিন। বক্তার আসনে 'তর্কশীল ভারতীয়ে'র লেখক। এ বারের লিট মিট ঘিরে সবচেয়ে তর্ক তোলা বিষয়টি নিয়ে প্রশ্ন উঠতেই এক মুহূর্তের নীরবতা।
সলমন রুশদিকে লিট মিটে আসতে না দেওয়া নিয়ে লিট মিটেরই মঞ্চে দাঁড়িয়ে কী বলবেন অমর্ত্য সেন? 
রবিবারের ভরদুপুর হলে কী হবে, সভাগৃহে উপছে পড়া ভিড়। অর্মত্য সেনের সঙ্গে আলাপচারিতায় শর্মিলা ঠাকুর! জানতে চাইছেন, হোয়াট মুভস ইন্ডিয়া, হোয়াট স্টপস ইট! 
মুহূর্তটাও মোক্ষম। রুশদি-বিতর্ক তো আছেই। তা বাদে দিল্লি গণধর্ষণ এবং নাগরিক বিক্ষোভ গোটা দেশকেই আন্দোলিত করেছে, করছে। অমর্ত্য সেন এবং শর্মিলা ঠাকুর, দু'জনেই একাধিক বার মুখ খুলেছেন এই সময়-পর্বে। দু'দিন আগে লিট মিট-এর আসরেই ধর্ষণে প্রাণদণ্ডের বিরোধিতা করেছেন শর্মিলা। সুতরাং এ দিনের আলোচনায় বিষয়গুলো যে আসবে, সেটা এক প্রকার প্রত্যাশিতই ছিল। 
শর্মিলা শুরু করলেন যুবসমাজের ভূমিকার কথা তুলে। ভারতের গড় বয়স এখন কুড়ি, যুবসমাজ সংখ্যাগুরু। অণ্ণা হজারে থেকে দিল্লি ধর্ষণ, নাগরিক বিদ্রোহে তাদের উপস্থিতি এখন সরব। "তারা রাস্তায় নামছে, এটা ঠিক। কিন্তু কী বলছে? কী চাইছে? অনেক সময়ই একটা ভাসা-ভাসা দৃষ্টিভঙ্গি কাজ করছে না কি?" এই সূত্রেই শর্মিলার জিজ্ঞাসা, সমাজের বাকি স্তরের মানুষের ভালমন্দ নিয়ে তারা কতটা ভাবে? অমর্ত্যদের প্রজন্মের তুলনায় আজকের যুবসমাজ কি বেশি আত্মকেন্দ্রিক?
অমর্ত্য অবশ্য এর জন্য আলাদা করে যুবসমাজকে দোষ দিলেন না। বললেন, গত দু'দশকে উদারীকরণের ফলে একটা বড় অংশের কাছে অর্থনৈতিক সুযোগসুবিধার ক্ষেত্রটা অনেকটা বিস্তৃত হয়েছে। স্বাভাবিক ভাবেই মানুষের উচ্চাকাঙ্খাও বেড়েছে। "উচ্চাকাঙ্খী হওয়ার মধ্যে আমি দোষের কিছু দেখি না। আসল কথাটা হচ্ছে, সুযোগসুবিধার জায়গাটা কত জনের কাছে বিস্তৃত করে দেওয়া গেল।" কিন্তু এই প্রশ্নটাই কি আদৌ মধ্যবিত্তকে ভাবায়? শর্মিলা প্রশ্ন করলেন, "তারা তো সামর্থ্য থাকা সত্ত্বেও গ্যাসের ভর্তুকি ছাঁটাই আর বিদ্যুৎ মাসুল বাড়া নিয়ে প্রতিবাদে গলা ফাটায়!"
লিট মিট-এর শেষ দিনে এ দেশের নোবেলজয়ীদের নিয়ে এমটা সংস্থার তৈরি একটি ক্যালেন্ডার
উদ্বোধন করলেন অমর্ত্য সেন। ছিলেন শর্মিলা ঠাকুরও। কর্ণধার উজ্জ্বল উপাধ্যায় চাইছিলেন, নিজের
ছবিওয়ালা পাতাটি ধরে দাঁড়িয়ে একটা ছবি তুলুন অমর্ত্য। বিড়ম্বিত মুখে, লাজুক হেসে "না না!" বলে
কোনও মতে এড়িয়ে গেলেন। পাশে একটি স্ট্যান্ডে খুলে রাখা ছিল ওই পাতাটি। "ওখানে একটা
সই করে দিন!" এই অনুরোধটা কিন্তু রাখতেই হল তাঁকে। —নিজস্ব চিত্র
উত্তরে পুরোপুরি সহমত পোষণ করলেন অমর্ত্য। "ভর্তুকি টিকিয়ে রাখার ব্যাপারে মধ্যবিত্ত কেন যে এত মরিয়া! মাসে পাঁচশো টাকা বেশি খরচ করার সামর্থ্য তো তাদের আছে!" কিন্তু দেশের বৃহত্তর জনতা এর চেয়ে অনেক খারাপ অবস্থায় আছে, তাদের গ্যাসও নেই। বহু ক্ষেত্রে বিদ্যুৎও নেই। সেই অংশের উন্নয়ন নিয়ে মধ্যবিত্তের মাথাব্যথাও নেই। বামপন্থীরাও এ ক্ষেত্রে প্রার্থিত ভূমিকা নেননি বলেই মনে করেন অমর্ত্য। পরমাণু চুক্তি বা গ্যাসের দাম নিয়ে বিরোধিতা 
করতে তাঁরা যতটা তৎপরতা দেখিয়েছেন, শৌচাগারের অভাবের ব্যাপারে দেখাননি। অমর্ত্য এ ব্যাপারে সরকারের ভূমিকা নিয়েও কড়া কথাই বললেন। খাদ্য সুরক্ষা বিল আনার ব্যাপারে সরকার রাজকোষে অনটনের দোহাই দেয়, কিন্তু সম্পন্ন অংশের কাছ থেকে রাজস্ব আদায়ে যা করণীয়, তা করে না।
শর্মিলার প্রশ্ন, কথায় কথায় বেসরকারিকরণের পক্ষে সওয়াল করা হয় আজকাল। সেটাই কি সব সমস্যার সমাধান? অমর্ত্যের জবাব, "বেসরকারিকরণে এমনিতে আপত্তির কিছু নেই। কিন্তু কোন ক্ষেত্রে, কী ভাবে বেসরকারিকরণ?" একটা অংশে স্বাস্থ্যক্ষেত্রে বেসরকারি পরিষেবার রমরমা হচ্ছে। অন্য দিকে সামগ্রিক ভাবে দেশের স্বাস্থ্য পরিষেবা ভয়াবহ অবস্থার মধ্যে দিয়ে যাচ্ছে। খোলা জায়গায় শৌচকার্য সারার নিরিখে ভারত এখনও এক নম্বর! অমর্ত্যের মতে, "অর্থনৈতিক বৃদ্ধি নিয়ে এখানে একটা চূড়ান্ত অস্বচ্ছ ধারণা কাজ করছে।" চিনের অর্থনৈতিক বাড়বৃদ্ধির কথা বলা হয়। চিন কিন্তু স্বাস্থ্যক্ষেত্রে ভারতের চেয়ে অনেক বেশি অর্থ বরাদ্দ করে থাকে। সামাজিক জীবনযাত্রার মানের সূচকে শ্রীলঙ্কা বা বাংলাদেশও ভারতকে পিছনে ফেলে দিয়েছে। বাংলাদেশে অর্থনৈতিক ও সামাজিক ক্ষেত্রে মহিলাদের অংশগ্রহণের হার অনেক বেশি। সেটা দেশের সার্বিক উন্নয়নে একটা বড় ভূমিকা নিয়েছে। 
শর্মিলা রাজনীতিকদের মধ্যে বৃহত্তর চিন্তনের অভাবের কথা তুলছিলেন, নাগরিক জীবনে নৈতিক দায়বদ্ধতার অনুপস্থিতির কথা বলছিলেন। মানসিকতার বদল হবে কীসে? অমর্ত্য সেন বললেন, নৈতিকতা রোজকার জীবনযাপনের অঙ্গ। নৈতিকতা যুক্তিবোধেরও অঙ্গ। সেটা উপলব্ধি করলে অনেকটা কাজ হয়। অজ্ঞানতাই গোড়ায় গলদ। সেটা কাটাতেই হবে। 
এ বার দর্শকাসন থেকে প্রথম প্রশ্নটাই এল, "আপনি তর্কশীল ভারতীয়ের কথা বলেছেন। সলমন রুশদি-কমলহাসনকে নিয়ে যা হচ্ছে, তা নিয়ে কী বলবেন?" 
আসর এক মিনিটের জন্য স্তব্ধ। হোয়াট মুভস ইট-এর পরে হোয়াট স্টপস ইট-এর পালা যেন! উদ্যোক্তারা মুখে অস্বস্তির রেখা চাপছেন। অমর্ত্য সেন বললেন, আমি তিনটে কথা বলব—
এক, এই নিয়ে বিশদ কিছু বলতে চাইছি না, কারণ তা হলে আর অন্য কিছুই ছাপা হবে না।
দুই, ধর্ম বিষয়ে কাউকে আঘাত না দেওয়াটা ভারতের গঠনমূলক তর্ক-পরম্পরার মধ্যে রয়েছে।... পশ্চিমবঙ্গেও সংখ্যালঘু সম্প্রদায় অনেকটা বঞ্চিত অবস্থায় রয়েছেন। তাঁদের খারাপ থাকার সত্যিকার কারণগুলো থেকে নজর ঘোরাতে ভাবাবেগে আঘাত আনার প্রসঙ্গগুলো বড় করে দেখানো হয়।
তিন, আমি কিন্তু শুধু এই কথাগুলোই বলিনি আজ। আরও অনেক কিছু বলেছি। 
http://www.anandabazar.com/4cal3.html

আলোর বিপরীতে স্বামী বিবেকানন্দ

শর্মিলা মাইতি

রিভিউ: দ্য লাইট, স্বামী বিবেকানন্দ
রেটিং: *

স্বামী বিবেকানন্দের দেড়শতম জন্মশতবর্ষে নানা ষোড়শোপচারের সঙ্গে, অবশ্যই প্রয়োজন ছিল একটি পূর্ণদৈর্ঘের চলচ্চিত্রের। অনেক কিছুই তো হল, ছবিটাই বা বাকি থাকে কেন! তবে এমন নয় যে, স্বামীজিকে নিয়ে আমরা এই প্রথম আড়মোড়া ভেঙে উঠলাম। প্রত্যেক মধ্যবিত্ত বাড়ির স্টাডিরুমে এঁর ছবি অবশ্যই টাঙানো থাকে বাণীসমেত, যতই দরজার পেছনে ফিল্ম বা স্পোর্টসস্টারেরা শোভা পাক। প্রতিটি ছাত্র কোনও-না-কোনও বয়সে একবার স্বামীজি হওয়ার স্বপ্ন দেখে। বাংলা ও সর্বভারতীয় চলচ্চিত্র জগতেও একাধিক ছবি তৈরি হয়েছে স্বামীজিকে নিয়ে। অনেকে হয়তো জানেন না, প্রথম স্বামী বিবেকানন্দের ওপর ছবি প্রোডিউস করেছিলেন প্রয়াত অভিনেত্রী ভারতী দেবী। ১৯৩৪ সালের বাজারে প্রায় পাঁচ লক্ষ টাকা খরচ করে। কিন্তু সে-ছবিতে শ্রীরামকৃষ্ণ-বিবেকানন্দের সম্পর্ক দেখে দর্শকের একাংশ বলেছিল, `ওই বুড়োটা ছোঁড়াটাকে নিয়ে এত টানাটানি করছে কেন বল দেখি?` যাই হোক, ছয়ের দশকে মানুষের কাছে এই সম্পর্ক একটা স্বর্গীয় স্বীকৃতি পায়, যা তখনও ছিল না।

১৯৬৪ সালে নির্মিত মধু বসুর ছবি বীরেশ্বর বিবেকানন্দ তামাম বাঙালির মন ছুঁয়েছিল। অভিনেতা অমরেশ দাসের সঙ্গে স্বামীজির আদল নিয়ে হয়ত আজকের দর্শক কিঞ্চিত্ উষ্মাপ্রকাশ করতেই পারেন। কিন্তু অভিনয়ের গভীরতা প্রশ্নাতীত। যে ছবি ২০১৩ সালে মুক্তি পাচ্ছে, সে ছবির কাছে প্রত্যাশার কোনও শেষ থাকবে না এটাই স্বাভাবিক। পরিচালক টুটু সিনহা যে নবাগতকে নিয়ে এলেন স্বামীজির ভূমিকায়, তার মুখের আদল অনেকটাই মেলে নরেন্দ্রনাথ দত্তের সঙ্গে। অবশ্য সামান্য লক্ষ্মীট্যারা। সেটাও ওভারলুক করা যায়। বাহবা অবশ্যই প্রাপ্য কাস্টিং ডিরেক্টরের। তাছাড়া, আরও কিছুদিন পিছিয়ে যদি পোস্টারের দিকে চোখ মেলি, সেটিও ধন্যবাদার্হ। প্রথম পোস্টারে শুধু একপাটি খড়ম। পুরাণ ও বাস্তবের আবাহন। রক্তমাংসের চরিত্র স্বামীজির ব্যক্তিত্ব দেবত্বে উন্নীত। তার পরের পোস্টারে স্বামীজির বেশে এক নতুন মুখ। প্রত্যাশাকে লালন করবার সেরা উপায়। সুন্দর বিজ্ঞাপন।

আসি মূল ছবিতে। মুখের আদল মিললেই যে স্বামীজির মতো চ্যালেঞ্জিং ও ব্যক্তিত্বপূর্ণ চরিত্রে খাপে খাপ ঢুকে যাবে, এমন কোনও নিশ্চয়তা নেই। দীপ ভট্টাচার্যের বডি ল্যাঙগোয়েজেই স্পষ্ট যে তিনি ক্যামেরার সামনে এখনও সড়গড় নন। মুখে মুখে প্রচারিত স্বামী বিবেকানন্দের বেশ কিছু কাহিনি জোড়া দিয়ে বানানো ছবির চিত্রনাট্য। প্রায় রিভাইজ না করেই নামানো হয়েছে। ছেলেবেলার বিলে গোলগাল গড়নের। জানালা দিয়ে শাড়ি-জামা-কাপড় দরিদ্রকে দান করার সেই বহুল প্রচলিত গল্প দিয়ে ছবি শুরু। কিশোর বয়সের বিবেকানন্দের চরিত্রে যাঁকে দেখি, তাঁর সঙ্গে বিবেকানন্দের চেহারার কোনও মিল নেই। অনায়াসে এই পর্ব থেকেই নবাগত দীপ ভট্টাচার্যকে ব্যবহার করা যেত। সে যাই হোক, সবচেয়ে উল্লেখযোগ্য যে বিষয়টি হতাশ করে তা হল, বিলে থেকে নরেন হওয়ার সময়টাকে অনাবশ্যক বেশি সময় নিয়ে দেখানো এবং আসল বিষয়, দ্য লাইট, মানে স্বামী বিবেকানন্দের আলো হয়ে ওঠার পর্বটি বড়ই ক্ষুদ্র। প্রায় একপাশে ঠেলে দেওয়া। মায়ের সঙ্গে, পরিবারের সঙ্গে নরেনের সম্পর্ক, বাবার মৃত্যুর পর হন্যে হয়ে চাকরির খোঁজ, ঠাকুর শ্রীরামকৃষ্ণের শরণাপন্ন হওয়া, শ্রীরামকৃষ্ণের স্পর্শে বিশ্বরূপ দর্শন, এ সব কিছু নিশ্চয়ই বিবেকজীবনীর অন্যতম অংশ। বাদ দেওয়া যেত মাত্রাতিরিক্ত কিছু গানের সিকোয়েন্স। (এমনকি একটি বাঈজিনৃত্যও আছে যা না থাকলেও কোনও ক্ষতিবৃদ্ধি হয় না)। 

শ্রীরামকৃষ্ণের ভূমিকায় প্রেমাঙ্কুর চক্রবর্তী অসাধারণ অভিনয় করেছেন। ভাবসমাধির সময়ে তাঁর কম্পমান শরীর, তুঙ্গ অভিব্যক্তি সত্যিই ছুঁয়ে যায় হৃদয়। বীরেশ্বর বিবেকানন্দ ছবিতে গুরুদাস চট্টোপাধ্যায়কেও ছাড়িয়ে যাওয়ার ক্ষমতা রাখেন স্থানবিশেষে। এ প্রসঙ্গে জিভি আইয়ারের ছবি স্বামী বিবেকানন্দ-এ মিঠুন চক্রবর্তীর কথা বলা জরুরি। তারকার খোলস ছেড়ে শ্রীরামকৃষ্ণের চরিত্রচিত্রণ যে কী উচ্চতায় নিয়ে যেতে পেরেছিলেন তিনি, বলাই বাহুল্য। পাশাপাশি তিনজন শ্রীরামকৃষ্ণকে রাখলে প্রেমাঙ্কুর মিঠুন চক্রবর্তীর সঙ্গে সমানে লড়তে পারতেন। বাধ সেধেছে অমনোযোগী স্ক্রিপ্ট। জিভি আইয়ারের সেই ছবিতে স্বামীজি হয়ে ওঠার চিত্রটি ছিল খুব সত্ এবং সাবলীল। অবশ্য তার পেছনে ঐতিহাসিক কারণও আছে। স্বামীজি যে-সময়ে দক্ষিণ ভারতে গিয়েছিলেন, তখন তিনি শ্রীরামকৃষ্ণের আদর্শে দীক্ষিত। তাঁর অসমাপ্ত কাজ সারা ভারতে ছড়িয়ে দিতে বদ্ধপরিকর। কাজেই দক্ষিণী পরিচালকের কাছে, স্বামীজির দৃপ্ত, ব্যক্তিত্বময় দিকটিই সবচেয়ে বেশি পরিচিত। অভিনেতা সর্বদমন ব্যানার্জিকে আমরা যেভাবে আত্মবিশ্বাসী হয়ে স্বামীজির ভেতরে ঢুকে যেতে দেখেছি, তার পঞ্চাশ শতাংশও পেলাম না দীপ ভট্টাচার্যের কাছ থেকে। আবেগের ওভারটোনে হারিয়ে গেল নরেন থেকে স্বামীজি হয়ে ওঠার পর্ব। হিন্দি এবং ইংরেজি ভাষার উচ্চারণে এখনও জড়তা রয়েছে দীপের। আমেরিকায় বিদেশিদের সঙ্গে ইংরেজি কথোপকথন এত ব্যাকরণভ্রান্তিতে ভারাক্রান্ত যে, বসে দেখার ইচ্ছেটাই চলে যায়। দক্ষিণের আইয়ার ব্রাহ্মণরা যখন নিজেদের মধ্যে কথা বলেন স্বামীজিকে শিকাগো যাওয়ার অনুরোধ করতে, তখন তাঁরা দক্ষিণী টানে হিন্দিতে কথা বলেন। আধুনিক দর্শকের কাছে পরিচালকের এই অমনোযোগিতা ধরা পড়বেই। তেমনিই ধরা পড়বে, `নমোবিষ্ণু` করে সাজানো শিকাগো ধর্মমহাসভার সেট। থার্মোকলের দেওয়াল, কাঁচা তেলরং আর স্বল্পমূল্যের ভেলভেটের পর্দা, সর্বোপরি এমন একটি আন্তর্জাতিক ধর্মসভায় মাত্র গুটিকয় শ্রোতার উপস্থিতি, কোনও মতেই দর্শকমননকে তুষ্ট করতে পারবে না। কারণ, ইতিমধ্যে দর্শক অনেক ভাল সেট এবং টেকনোলজির ব্যবহার দেখে ফেলেছে। বাংলা ছবিতেই। স্ক্রিনটাইমে স্বামীজি মাত্র দু মিনিট বক্তৃতা দেন। সামনে ক্যামেরা বসিয়ে নিতান্ত দায়সারাভাবে সবচেয়ে গুরুত্বপূর্ণ দৃশ্যটি সেরে ফেলা হয়েছে। তেমনই হতাশ করে শিকাগো শহরে তুষারকণার বদলে পেঁজা তুলো উড়তে থাকার দৃশ্য। নাঃ, নিরাশা প্রায় তলানি ছুঁয়ে যায়।
হতাশ করার উপকরণ অসংখ্য। একটি দুটি উল্লেখ করে সংক্ষেপে সারছি। পরিচালক টুটু সিনহা কম বাজেটে কাজ করেছেন, সেটা কোনও কাজের কথা নয় এ যুগের নিরিখে। এমন একটি ছবি যেখানে, আমেরিকায় শুটিং অথবা বিশ্বাসযোগ্য সেট দরকার ছিল, সেখানে এতটা আপস করা মানে একটি অত্যন্ত সংবেদনশীল ও সম্ভাবনাময় বিষয়কে খুন করা। কদিন আগেই লাইফ অফ পাই ছবিতে শ্রীকৃষ্ণের বিশ্বদর্শনের একটি স্মরণযোগ্য থ্রি-ডি নমুনা দেখেছি। এখনও ঘোর কাটেনি। মানছি, টু-ডি তে সেই এফেক্ট আনা অসম্ভব। তবু শ্রীরামকৃষ্ণ যখন নরেন্দ্রনাথকে ঈশ্বর-অনুভব করাচ্ছেন, সেই ঝাপসা তৃতীয় মানের ভিএফএক্স আরও একবার মন খারাপ করে দেয়। মনে হয় আমরা প্রায় তিরিশ বছর পিছিয়ে গেলাম! তবে এ ছবি কিছুটা নম্বর পাবে গবেষণার কাজের জন্য। স্বামীজির সঙ্গে প্রিন্স দ্বারকানাথ ঠাকুরের দেখা হওয়া, কিংবা জাহাজে জামশেদজি টাটার সঙ্গে কথোপকথন সেই রিসার্চ ওয়র্কেরই অঙ্গ। (দুঃখের বিষয়, জামশেদজি ও স্বামীজির এই দৃশ্যটিও দায়সারাভাবে ক্রোমায় শুট করা)। ভগিনী নিবেদিতার সঙ্গে সম্পর্কের গতিপ্রকৃতিতেও ওই রিসার্চ টিমের হাত আছে। না-হলেও-হয় এমনই একটি সারদা মায়ের চরিত্রে অভিনয় করেছেন গার্গী রায়চৌধুরী। বিশ্বজিত্ চক্রবর্তী বাদে বাকি কলাকুশলীরা নাটকের গ্রুপের। সবশেষে একটিই কথা, আরও আরও অনেক গুণ বেশি প্রস্তুতি ও অনুশীলন প্রয়োজন ছিল। সততা আর নিষ্ঠার অভাব পরতে পরতে স্পষ্ট হয়ে গিয়েছে।

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