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Saturday, April 21, 2012

नवउदारवाद के खिलाफ नवदलित आन्दोलन

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 नवउदारवाद के खिलाफ नवदलित आन्दोलन

नवउदारवाद के खिलाफ नवदलित आन्दोलन

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नवउदारवाद के खिलाफ नवदलित आन्दोलन

दुनियाभर में हर साल नस्लीय भेदभाव और ऊंच नीच के खिलाफ 21 मार्च को विरोध दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस साल भी दुनिया के अधिकांश देशों में 21 मार्च को नस्लीय भेदभाव के खिलाफ कैंडल लाइट विरोध किया गया. इस मौके पर भारत में भी करीब 20 स्थानों पर लोगों ने मोमबत्तियां जलाकर अपना विरोध प्रदर्शित किया. इस मौके पर जातीय भेदभाव के खिलाफ काम करनेवाली मानवाधिकारवादी संस्था पीवीसीएचआर ने देश में नवदलित आंदोलन के शुरूआत करने की घोषणा की है.

पीवीसीएचआर के डायरेक्टर डॉ. लेनिन रघुवंशी का मानना है कि "भारतीय सामन्ती समाज जातिवादी व पितृ सत्ता पर खड़ा रहा और आज भी उसके अवशेष'न्याय में देरी या फिर अन्याय'पर खड़ा है. गाँवों में अभी भी अनेको लोग हैं, जो 'चुप्पी की संस्कृति के शिकार हैं. इसी परम्परा को नवउदारवादी ताकतें आगे बढ़ाकर लोगों का श्रम,संस्कृति, कला व प्राकृतिक संस्थानों पर बेशर्मी से कब्जा कर रही हैं. लूटने वाली ताकते हमेशा लोगों को आपस में धर्म व जाति में बांटकर व लड़ाकर 'विभाजन'के आधार पर अपनी सत्ता को बनाते हैं और कायम रखते हैं. विभाजन की राजनीति के खिलाफ एक ही विकल्प है-एकता!"

रघुवंशी पूछते हैं "लुटेरों की एकता के खिलाफ हमारी एकता क्या होगी?" और आगे बताते हैं कि "पहली एकता जातिवाद के खिलाफ. जातिवाद से ऐतिहासिक रूप से सताये गये जातियों की एकता एवं उनकी ऊँची जाति के प्रगतिशील लोग, जो जातिवाद के खिलाफ हैं, उनके साथ एकता. यह पहली तरह की एकता, जो न तो किसी ऊँची जाति में पैदा व्यक्ति के खिलाफ है और न ही किसी धर्म के खिलाफ." एकता को भारतीय संदर्भों में परिभाषित करते हुए डॉ लेनिन कहते हैं "साम्प्रदायिक फासीवाद एवं दंगे फसाद से टूटे हुए धार्मिक लोगों की एकता एवं साम्प्रदायिक सद्भाव व धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास करने वाले सभी धर्मो की एकता-साम्प्रदायिक फासीवाद के खिलाफ,यह दूसरी तरह की एकता है."

डॉ लेनिन कहते हैं कि देश में नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण जातीय बंधन टूटे हैं लेकिन एक नये तरह के दलित वर्ग का उदय हुआ है जो शोषित जन हैं. इसलिए अब एक तीसरी एकता की जरूरत है जो कि नवउदारवादी नीतियों के कारण गरीबी से टूट रहे गरीबों की एकता है. वे कहते हैं कि नवउदारवादी नीतियों के विरोध का अर्थ 'लोकतांत्रिक पूँजीवाद' का विरोध नहीं है. इसी को स्पष्ट करते हुए डॉ लेनिन कहते हैं कि "टूटे हुए लोग का अर्थ दलित होता है इस तरह तीन तरह के लोगों की एकता 'नवदलित आन्दोलन' है. राजनैतिक पार्टी के स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर 'नवदलित आन्दोलन'को खड़ा करके राजनैतिक दलों को जनता के पक्ष में मजबूर करना होगा."

अपने इसी तीन सूत्रीय कार्यक्रम को लेकर डॉ लेनिन रघुवंशी नवदलित आंदोलन की शुरूआत कर चुके हैं जिसका आगाज 21 मार्च को हो चुका है.

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