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Thursday, August 22, 2013

डर के आगे हार है

डर के आगे हार है


एक ही झटके में तकरीबन साढ़े तीन सौ पत्रकारों की छंटनी ने दिल्ली के पत्रकारों को अन्दर और बाहर से हिला कर रख दिया है. जब एक-एक करके पत्रकार, कैमरामैन और अन्य कर्मचारियों को मैनेजमेंट अन्दर बुलाकर इस्तीफे पर दस्तख़त करवा रहा था, दफ़्तर के अन्दर एक मायूस सा सन्नाटा पसरा हुआ था. जो बच गए और बचा लिए गए, उनके अन्दर भी वही डर पैबस्त था, जो निकाल दिए गए लोग महसूस कर रहे थे. अन्दर के ही सूत्रों ने बताया कि स्क्रीन पर दहाड़ने वाले संपादकों के चेहरे पर मुर्दनी छाई हुयी थी और वे सर झुकाकर मैनेजमेंट वालों के पीछे लगी कुर्सियों पर धंसे हुए थे.

ऐसे अद्भुत पत्रकार-संपादकनुमा अदाकार ही इस कॉरपोरेट मीडिया के वो स्पिन-मैनेजर हैं जिनकी सहमति से सैंकड़ों पत्रकारों को पलक झपकते सड़क पर उतार दिया गया. जैसे भेड़ के वेश में भेड़िया होता है, वैसे ही ये पत्रकार के वेश में मालिक या मालिकों के दलाल है! मुनाफ़ा निचोड़ने के लिये ये किसी भी हद तक जा सकते हैं. सरोकार इनके लिये एक वर्जित शब्द है और डर पैदा करना इनका पसंदीदा शगल. सन्दर्भ और हैं जिन पर चर्चा हो सकती है पर मेरा सुझाव है कि छंटनी की घटना को इसी सन्दर्भ में समझा जाना चाहिये.


छंटनी के आर्थिक वज़हों की आड़ में बड़े पूंजीपति और उनके शोहदे संपादक जो काम सबसे शिद्दत से करना चाह रहे थे, वो यही था : पत्रकारों में डर पैदा करना! नौकरी खोने का डर, फिर कहीं भी नौकरी ना मिल पाने का डर, विरोध करने पर ब्लैक-लिस्टेड हो जाने का डर! पत्रकारों के अन्दर का यही डर कॉरपोरेट घरानों को खाद-पानी देता है और फिर उगती है कॉरपोरेट मीडिया में डरते हुए काम कर रहे पत्रकारों की फ़सल! आज मीडिया में अगर दोयम दर्जे की वाहियात ख़बरों या ख़बरों की शक्ल में विज्ञापन की बहुलता है तो इसके पीछे भी डरे हुए पत्रकारों की भूमिका है. 

पत्रकार काम करना भी चाहें तो उन्हें हतोत्साहित किया जाता है. जुमला चलता है कि "कृपया ज्ञान ना बाँटें-यहाँ सब ज्ञानी हैं!" अब इन्हें कौन समझाए कि ज्ञान बांधता नहीं, मुक्त करता है-निर्भीक बनाता है. मालिकों का सीधा समीकरण ये है कि पढने-लिखने और काम करने की आज़ादी देने की बजाय एक "फीयर साइकोसिस" में काम कराया जाय. इसी शाश्वत-सनातन डर की पृष्ठभूमि में पत्रकारों का एक बड़ा हिस्सा मुख्यधारा की मीडिया में काम करने को मजबूर है. पिछले दो दशकों में हमारे मुल्क की गति भी ऐसी ही रही है. पत्रकारिता से इतर भी तकरीबन हर सेक्टर में काम कर रहे नौजवानों में यही "इनबिल्ट डर" काम कर रहा है. 

अपने चारों तरफ देखते हुए महसूस होता है मानो हम डरे हुए नौजवानों के मुल्क में रह रहे हों. जहाँ हर तरफ डर और खामोशी हो. मानो नौजवानों में ज़िन्दगी और भरोसे का कोई मतलब ना बच गया हो. दो जून की रोटी जुगाड़ने के लिए अपने हौसले और आत्मसम्मान को गिरवी रख देने का चलन इस "नव-उदार भारत" के नौजवानों के दैनिक जीवन का हिस्सा हो चला है. ये देख-समझकर कर घबराहट होती है कि आने वाले दौर में जब हर तरह का दमन और शोषण और बढ़ने की ही संभावना है, तब नौजवान क्या अपनी ज़िन्दगी और अपने मुल्क को बचाने भी सामने नहीं आयेंगे? या फिर वही नौकरी छीने जाने के बाद वाली चुप्पी और डर का निज़ाम होगा?

जब "युवराज" ग़रीबी को महज़ एक मानसिक स्थिति बता रहे हों, मैं आपको बता दूं कि असल में डर एक "मानसिक स्थिति" है. एक ऐसी मानसिक स्थिति जिसे सिर्फ लड़ कर ही दूर किया जा सकता है. वरना ये डर नौजवानों और उनकी तमाम संभावनाओं को खतम कर देगा. एक बार डर के दायरे से बाहर कदम तो रखिये, फिर देखिये नौजवान होना कितना सुंदर होता है! इस मुल्क में अब भी बहुत कुछ ऐसा है जिस पर अम्बानी जैसों का कब्ज़ा नहीं है और उन्हीं में से एक है आपका नौजवान होना! आपका बेख़ौफ़ नौजवान होना!

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