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Friday, April 12, 2013

बेमतलब की एक बहस

बेमतलब की एक बहस
Thursday, 11 April 2013 10:52

विजय विद्रोही 
जनसत्ता 11 अप्रैल, 2013: इससे ज्यादा दिलचस्प और बेमतलब बहस कोई दूसरी नहीं हो सकती थी। राहुल गांधी के मधुमक्खी के छत्ते के बिंब को नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से देशभक्ति और भारत मां के साथ जोड़ा और उसके बाद जिस तरह दोनों दलों के नेताओं ने अपने-अपने नेता के बचाव में छत्ते और मधुमक्खी पर शोध करना शुरू किया, वह बहुत विचित्र था। हो सकता है विवाद उठने के बाद राहुल गांधी को अहसास हुआ हो कि अंग्रेजी में भले मधुमक्खी के छत्ते को एक लक्ष्य को ध्यान में रख कर एक साथ काम करने से जोड़ा जाता हो लेकिन हिंदी में तो मधुमक्खी के छत्ते को नकारात्मक रूप से ही लिया जाता है। बहुत संभव है कि मधुमक्खी के छत्ते को मां और देशभक्ति के साथ जोड़ने का बयान देने के बाद नरेंद्र मोदी ने भी सोचा हो कि यह तो सिर्फ बिंब या रूपक जैसा था। लेकिन विवाद तो उठना था और उठ भी गया। अब देखना है कि सत्ता का शहद किसके हिस्से आता है। 
राहुल गांधी के नजरिए से देखा जाए तो भारत में लोग मधुमक्खी की तरह होते हैं। कुछ भुनभुनाते भी रहते हैं और काम भी करते रहते हैं। जिंदगी बरबाद है! कहां फंस गए! दुनिया मौज कर रही है और हमें खटना पड़ रहा है! जिंदगी में कुछ रखा नहीं है! चोर मौज कर रहे हैं! इस देश का बॉस, कुछ हो नहीं सकता है, आदि-आदि की बड़बड़ाहट के साथ काम भी होता रहता है। साथ में एक साथ लग कर, जैसा कि फसल की कटाई के समय होता है। 
काम के साथ-साथ महिलाएं जीवन को कोसती भी रहती हैं। सास-ननद का निंदा पुराण भी जारी रहता है और फसल भी कटती जाती है। कब पूरा खेत साफ हो जाता है पता ही नहीं चलता। वैसा ही कुछ है छत्ता बनाना। भारतीय जनमानस के एक परंपरागत स्वभाव की तरफ शायद राहुल गांधी इशारा कर रहे थे। अगर वे हिंदी में बोलते तो शायद कोई और उपमा देते। ऐसा इसलिए कि हिंदी में मधुमक्खी के छत्ते को सही या अच्छेसंदर्भ में नहीं लिया जाता।
यहां कहावत है मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की। शहद की मिठास का जितना आकर्षण होता है, उससे ज्यादा डर मधुमक्खी के डंक का होता है। बुरे आदमी के लिए कहा जाता है कि उससे उलझने का मतलब है मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालना। या, जानते-बूझते खुद को किसी मुसीबत में डालने के अर्थ में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है। यानी ऐसा काम करोगे तो आपका खुद का ही नुकसान होगा। मधुमक्खी छोड़ेगी नहीं। डंक बहुत दर्द देता है, देर तक दर्द देता है और सुजा देता है यह सबको पता है। कोई लोहे से रगड़ता है तो कोई डॉक्टर के पास भागता है। जब डंक का दर्द ऐसा होता है तो छत्ते से दूर ही रहना चाहिए। जब छत्ते से दूर रहने की सलाह हर कोई देता है तो फिर मधुमक्खी के काम करने की तुलना भारतीय जनमानस की काम करने की शैली से कैसे हो सकती है! 
मधुमक्खियों के छत्ते अब कम ही देखने को मिलते हैं। इन दिनों तो मधुमक्खियों को पाला भी जा रहा है। मधुमक्खी पालन को केंद्र और राज्य सरकारें बढ़ावा दे रही हैं। ये मधुमक्खियां छत्ता नहीं बनातीं। लकड़ी के छोटे-छोटे बक्से होते हैं। मधुमक्खियां पराग के कण लेकर बक्सानुमा छत्तों में आती हैं और यहां शहद बनाने का काम शुरू होता है। यहां मधुमक्खी न तो देवी होती है और न ही डंक मारने वाली खतरनाक जीव। 
अब इस व्याख्या के बाद दूसरी व्याख्या आती है। मधुमक्खी बड़ी मेहनती जीव होती है। चुपचाप दिन भर फूलों पर मंडराती रहती है। रस चुराती है। छत्ते तक लाती है। शहद बनाती है। वह शहद, जिसे नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी, दोनों ने जरूर चाटा होगा। 
मधुमक्खी तब तक किसी पर हमला नहीं करती, जब तक कि कोई उसके छत्ते से छेड़छाड़ नहीं करता। छेड़छाड़ करने पर मधुमक्खी को हमला करने का बिल्कुल हक है। इस व्याख्या को एक भाजपा नेता के सामने रखा गया तो उन्होंने कहा कि वे भी मधुमक्खियों की मेहनत का सम्मान करते हैं लेकिन छत्ते में एक रानी मक्खी भी होती है जो कोई काम नहीं करती। वह सिर्फ आराम करती है। भाजपा नेता जानना चाह रहे थे कि आखिर रानी मक्खी कौन है। 
भाजपा ने बड़ी चतुराई से छत्ते की तुलना को भारत माता से जोड़ दिया। मोदी वैसे भी खुद को सबसे बड़ा देशभक्त समझते हैं! मोदी ने राहुल गांधी को भारतीय सभ्यता-संस्कृति समझ कर ही बोलने की नसीहत दी तो कांग्रेस के मनीष तिवारी ने मधुमक्खी के अवतार रूप को सामने रख साबित करने की कोशिश की कि खुद को धार्मिक-सांस्कृतिक मानने वाले भाजपा नेताओं को मधुमक्खी के भ्रामरी देवी के अवतारका तो इल्म तक नहीं है। 
अभी देश को इंतजार है उत्तराखंड के उस मंदिर की तस्वीरों और वीडियो का, जहां भ्रामरी देवी की पूजा की जाती है। मधुमक्खी वाले भाषण में ही राहुल गांधी ने घोड़े पर सवार एक देवदूत के आने और सारी समस्याएं चुटकियों में हल करने की बात कही थी। इस पर भाजपा ने वार किया तो कांग्रेस नेताओं को फिर जानवर ही याद आया। पार्टी के प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि राहुल गांधी को अगर यह बात मोदी के लिए कहनी होती तो वे घोड़े की जगह भैंस शब्द का इस्तेमाल करते।
जाहिर है कि भैंस पर यमराज ही निकलते हैं। यमराज वाला अर्थ भारी पड़ता लगा तो कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि राशिद साहब को क्या पता कि भैंसा यमराज की सवारी है। इससे नादान बचाव और क्या हो सकता है! राशिद अल्वी को एक दूसरे जानवर ने बचा दिया, क्योंकि उन्होंने भैंसा के साथ-साथ अंग्रेजी में बुल (सांड) शब्द का भी इस्तेमाल किया था। लिहाजा कहा गया कि भाजपा सिर्फ भैंसा शब्द पर जोर क्यों दे रही है, जबकि सांड भी तो बोला गया था!
पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले दो दलों की तुलना कुत्तों से कर दी थी। इस पर बवाल मचा तो गडकरी ने कह दिया कि मीडिया ने उनका बयान तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। मोदी और कांग्रेस नेताओं में गुजरात चुनावों के समय सांप-चूहे की उपमा को लेकर विवाद चला था। शशि थरूर को तो कैटल क्लास वाली अपनी टिप्पणी के चलते लालबत्ती की गाड़ी का सुख ही छोड़ना पड़ा था। यह वह दौर था जब सोनिया गांधी से लेकर अन्य कांग्रेस नेता सरकारी खर्चे कम करने का संदेश दे रहे थे और 'कैटल क्लास' (विमान के इकोनॉमी क्लास) में सफर कर रहे थे। शशि थरूर तो चले गए लेकिन कांग्रेस नेताओं ने कब कैटल क्लास में सफर करना बंद कर दिया यह जनता को पता ही नहीं चला। 
मोदी ने एक बार सोनिया-राहुल की तुलना गाय-बछड़े से की थी। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में राहुल ने मायावती के हाथी को भ्रष्टाचार से जोड़ा था। वे कहते रहे कि दिल्ली से पैसा तो आता है लेकिन लखनऊ में बैठा हाथी खा जाता है। यह जुमला खासा लोकप्रिय हुआ लेकिन वोट मुलायम बटोर ले गए और राहुल गांधी की पार्टी को अब अपनी सरकार बचाने के लिए मायावती के हाथी की ही सवारी करनी पड़ रही है! हमारे देश के नेता चाहे तो अमेरिका से सीख ले सकते हैं जहां एक दल को गधे और दूसरे को हाथी से जोड़ा जाता है और कोई बुरा नहीं मानता। हमारे यहां नेताओं में हास्यबोध का अभाव नजर आता है।           
राहुल गांधी बहुत अच्छा भाषण नहीं देते हैं। उनके पास शब्दों का भी अभाव देखा गया है। यह बात बहुत-से अन्य नेताओं पर भी लागू होती है। दरअसल, भाषण कला धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। अब लच्छेदार भाषा में झूठ को परोसने वालों या रस लेकर अपमानजनक टिप्पणियां करने वालों को वाहवाही मिलने लगी है। मुहावरों, कहावतों, देसी शब्दों, लोकोक्तियों, रूपकों, बिंबों का इस्तेमाल करने वालों का अकाल पड़ता जा रहा है। किस्से-कहानियों के माध्यम से अपनी बात सामने रखने वाले भी कम होते जा रहे हैं। 
इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो राहुल गांधी के भाषण में से अकेले मधुमक्खी वाले बिंब को निकाल कर उसे जबर्दस्ती भारत मां और देशभक्ति से जोड़ना सस्ती सियासत की ही कोशिश लगता है। जैसे कि कोई कहे कि नेताजी रोज बयान बदलते रहते हैं, लिहाजा उन्हें समझना टेढ़ी खीर है। अब इस पर कोई कह दे कि खीर टेढ़ी कैसे हो सकती है या हर दल में जा चुका नेता थाली का बैंगन कैसे हो सकता है। किसी को नाच न आए तो वह बिल्डर के पास जाकर शिकायत करे कि आंगन टेढ़ा क्यों बनाया या कोई कहे कि राधा के नाचने का नौ मन तेल से क्या रिश्ता? आदि-आदि। 
यहां अटल बिहारी वाजपेयी का एक जुमला याद आता है। तब उनकी सरकार थी। अटलजी चुनावी सभाओं में कहा करते थे कि कांग्रेस बिल्ली की तरह सत्ता के छींके की तरफ ललचाती नजरों से देख रही है। लेकिन यह छींका उसके हाथ लगने वाला नहीं है। लेकिन तब कांग्रेस ने शोर नहीं मचाया। आज कोई ऐसा कह दे तो बिल्ली को किससे जोड़ दिया जाएगा यह बताने की जरूरत नहीं है।
यह सिर्फ भारत में हो सकता था और हो भी रहा है। जिस देश में सैंतालीस फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हों, अस्सी करोड़ लोग रोज बीस रुपए से ज्यादा खर्च करने की हालत में न हों, सबसे अमीर और सबसे गरीब के बीच चौदह लाख गुने का फर्क हो, महंगाई लगातार बढ़ रही हो, विकास दर घट रही हो, बेरोजगारी दर दस फीसद को छू रही हो, उस देश में मधुमक्खी के छत्ते पर बहस हो रही है! कोई कह रहा है कि देश मधुमक्खी का छत्ता नहीं बल्कि हमारी मां है। कुछ कह रहे हैं कि मधुमक्खी भी तो देवी भ्रामरी का रूप है और इस देवी की तो उत्तराखंड में पूजा तक होती है। 
इस बेमतलब की बहस से यही साबित होता है कि नेताओं के पास कोई काम नहीं है, मीडिया के पास खबरों का अकाल है और देश की जनता को हर दल बेवकूफ समझ रहा है। वैसे अच्छी बात है कि हमारे यहां बहस लंबी नहीं चलती। अगले ही दिन कोई नेता नया बयान दे देता है और उसी भाषा में उसका जवाब भी आ जाता है। बहस का रूप बदल जाता है।


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