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Thursday, June 14, 2012

अब के वे बिछड़े तो शायद..

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शहंशाह-ए-गजल मेहदी हसन का खामोशी से यूँ गुजर जाना दुनिया भर में मौजूद उनके प्रशंसकों को द्रवित कर गया। १९२७ में राजस्थान के लूणा गाँव में पैदा हुए हसन का परिवार भले ही १९४७ के बंटवारे में अपना मादरे-वतन छोड़ पाकिस्तान आ गया किन्तु हसन के जेहन में हिन्दुस्तान; खासकर अपने गाँव के प्रति लगाव कभी कम नहीं हुआ। समय के साथ उनके जन्मस्थल की दीवारें भले ही जमींदोज हो गई हों मगर गाँव की उस मिट्टी को वे कैसे भुला सकते थे जिसपर कई सीकिया पहलवानों को उन्होंने धोबी-पछाड़ दिया था।

पाकिस्तान जाने के बाद से दो बार हसन अपने गाँव आए और हर बार कुछ न कुछ देकर ही आए| एक बार तो झुंझुनू में गजल गायकी का कार्यक्रम कर उन्होंने लूणा में पक्की सड़क का निर्माण करवा दिया। हसन का अपने पैतृक गाँव के प्रति ऐसा निश्छल प्रेम सरहदों के बहाने लोगों में भरते ज़हर से इतर मिसाल कहा जा सकता है| किसी को हसन की गायकी में खुदा नज़र आया तो किसी को हसन में ही खुदा का दीदार हुआ मगर जिसकी गायकी का लोहा दुनिया मानती रही वही खुदा के साथ गाने से महरूम रही। लता-हसन का एक अलबम आया भी तो उसकी रिकार्डिंग हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच बंट गई| दोनों चाहकर भी ताउम्र साथ नहीं गा सके। यह दोनों फनकारों के साथ ही तमाम चाहने वालों के लिए ऐसा ही था जैसे किसी को बीच समंदर में लाकर यूँही छोड़ दिया जाए।

 कहते हैं, कला सरहदों की मोहताज़ नहीं होती। जिस तरह हवाओं को बहने से नहीं रोका जा सकता ठीक उसी प्रकार फनकारों के फ़न को सीमाओं में नही बाँधा जा सकता किन्तु १९४७ के ज़ख्म आज तलक इतने गहरे हैं कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के फनकारों को उनके ही मुल्क में वह तवज्जो नहीं मिली जिसके वे हकदार थे| उदाहरण के लिए, मेहदी हसन हिन्दुस्तान में पैदा हुए किन्तु ताउम्र पाकिस्तान में रहकर भी वहां की तहजीब को मन से स्वीकार नहीं कर पाए| इसके उलट गुलज़ार का जन्म पाकिस्तान में हुआ लेकिन उन्होंने हिन्दुस्तान को अपनी कर्मभूमि बनाया और यहाँ की गंगा-जमुनी तहजीब के नुमाइंदे बन गए| हसन के पिता और दादा ध्रुपद घराने से ताल्लुक रखते थे किन्तु उन्होंने ठुमरी को अपनी आवाज देकर अमर कर दिया। ऐसा नहीं है कि हसन से पूर्व गजल गायकी ही नहीं थी मगर यह हसन की आवाज़ का जादू ही था जिसने गजल गायकी तो हरदिल अजीज बना दिया। खासकर टूटे दिलों के लिए मरहम का काम करने लगी गजल। हसन की जमात को आगे बढ़ाने वालों में नामों की एक लम्बी फेरहिस्त है जिन्होंने कहीं न कहीं हसन की आवाज़, उनकी गायकी की अदा, उर्दू लफ़्ज़ों का इस्तेमाल इत्यादि की नक़ल की।

सन २०१० में हसन हिन्दुस्तान आना चाहते थे और अमिताभ बच्चन, दिलीप कुमार व लता मंगेशकर से मिलना चाहते थे किन्तु दोनों मुल्कों के बीच के तल्ख़ संबंध उनकी इच्छा का गला घोंट गए। हसन दोनों देशों के संबंधों को पटरी पर लाने का ऐसा जरिया बन सकते थे जो दोनों ही देशों में स्वीकार्य नाम था लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें उनके नाम के अनुरूप सम्मान के लायक ही नहीं समझा। शायद तभी उनकी देह पाकिस्तान में रही किन्तु दिल हमेशा हिन्दुस्तान के लिए धड़कता रहा। अब जबकि हसन अपनी आवाज़ को अपने करोड़ों प्रशंसकों के दिल में हमेशा के लिए गूंजती छोड़ गए तो यह उम्मीद भी बेमानी साबित होती है कि पाकिस्तान उन्हें मरने के बाद भी सम्मानोचित ढंग से सुपुर्दे ख़ाक करेगा? उनकी देह को दफनाने से लेकर उनके इलाज़ में खर्च हुए रुपये से जुड़ा विवाद तो शुरू भी हो चुका है और इसका अंजाम पूरे विश्व में पाकिस्तान की फनकार विरोधी मानसिकता को उजागर करेगा। इलाज़ के लिए हिन्दुस्तान आने के इच्छुक हसन को डॉक्टरों की सलाह पर अपने यहाँ रोकने वाले मुल्क से और उम्मीद भी क्या करें? गुलज़ार साब ने कभी हसन के हिन्दुस्तान न आ पाने की मजबूरी देखते हुए कहा था- आंखों को वीजा नहीं लगता/सपनों की सरहद नहीं होती/बंद आंखों से रोज मैं सरहद पर चला जाता हूं मिलने मेहदी हसन से/ सुनता हूं, उनकी आवाज को चोट लगी है/अब कहते हैं सूख गए हैं फूल किताबों में/ यार फराज भी बिछड़ गए हैं, शायद वो मिले कभी ख्वाबों में/..फिलहाल तो हसन की रूह पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है की तर्ज़ पर बेबसी के आंसू बहा रही होगी।

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