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Wednesday, September 7, 2011

Fwd: भाषा,शिक्षा और रोज़गार



---------- Forwarded message ----------
From: भाषा,शिक्षा और रोज़गार <eduployment@gmail.com>
Date: 2011/9/6
Subject: भाषा,शिक्षा और रोज़गार
To: palashbiswaskl@gmail.com


भाषा,शिक्षा और रोज़गार


शिक्षक और शिक्षा

Posted: 05 Sep 2011 10:42 AM PDT

ऊर्जा शिक्षक और शिक्षा युग-निर्माता होने के कारण योग्य अध्यापक राष्ट्र ऋषि हैं। शिक्षा सबसे बड़ी पूंजी है। शिक्षक संस्कार के अध्याय से संस्कृति बनाते हैं। शिक्षा चरित्र निर्माण का मूल आधार है। यह जीवन को सफल और सुंदर बनाती है। इसका उद्देश्य मात्र साक्षरता नहीं, बल्कि सद्गुणों को सीखना है। लोक मंगल की भावना करने वाला संस्कार जब दक्षता की सीमा तक उद्बुद्ध होता है तो वह विद्या की कोटि में आता है। शिक्षा साधन है, विद्या साध्य और साक्षरता उपकरण। शिक्षा संस्कृति बनाती है तो विद्या विनयाधान करती है। अपने जीवन में सर्वप्रथम सदाचरण उतारकर शिक्षा देने वाले ही सच्चे शिक्षक हैं। नैतिकता शिक्षा का अंग है। शिक्षा जीवन की दृष्टि है। यह जीवन जीने की कला सिखाती है। योग्यता, प्रतिभा को चमकाने के लिए शिक्षा के अलावा दूसरा कोई माध्यम नहीं है। भेदभाव दूर करके यह दूसरों के लिए उदाहरण बनाती है। अर्थ और अधिकार के लिए बढ़ती भूख शिक्षा को खोखला करती है। योग्य शिक्षकों के अभाव में शिक्षा अपूर्ण रहती है। पंचतंत्र में कहा गया है जहां अपूज्यों की पूजा होती है और पूज्यों का अपमान होता है वहां दुर्भिक्ष, भय और मरण ये तीनों होते हैं। अध्यापक शिक्षा के आधारभूत सिद्धांतों के संरक्षण और विकास में माली का काम करते हैं। विवेकानंद ने कहा है-शिक्षा की अवहेलना करना महान राष्ट्रीय पाप है और यही हमारे अध:पतन का कारण भी है। महामना मदनमोहन मालवीय ने उद्बोधन दिया था-किसी को इस बात का दु:ख नहीं होना चाहिए कि मैं अध्यापकों के लिए बहुत मांग रहा हूं। प्राय: सभी सभ्य देशों में देश के राष्ट्रीय उत्थान में अध्यापक का स्थान श्रेष्ठ माना जाता है। इसीलिए विश्वविख्यात वैज्ञानिक पद्मश्री डॉ. लाल सिंह जैसे शिक्षाविद् काशी विवि के कुलपति बनाए गए। अधिकतर महापुरुष पहले शिक्षक ही रहे। विनोबाजी, आचार्य नरेंद्र देव, नानाजी, राधाकृष्णन, डॉ. कलाम, शंकरदयाल शर्मा ने शिक्षा और शिक्षकों के लिए जो आदर्श मूल्य स्थापित किए वे सभी के लिए प्रेरणाश्चोत हैं( डॉ. हरिप्रसाद दुबे,दैनिक जागरण,5.9.11)

यूपीःपॉलीटेक्निक की 1284 सीटें लॉक

Posted: 05 Sep 2011 10:36 AM PDT

संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद की ओर से चल रही पॉलीटेंिक्नक काउंसिलिंग में रविवार को 1013 अभ्यर्थियों ने अपना पंजीयन कराया और 1284 ने सीटें लॉक कीं। सोमवार को 1,70,000 से 2,10,000 रैंक वाले अभ्यर्थियों की काउंसिलिंग होगी। फैजाबाद रोड स्थित राजकीय पॉलीटेक्निक में सुबह से ही अभ्यर्थियों का आना शुरू हो गया था। प्रमाणपत्रों की जांच से लेकर पंजीयन कराने तक सुबह से ही अभ्यर्थियों की लाइन लग गई थी। कड़ी धूप से बचने के इंतजामों के बावजूद अभिभावक व अभ्यर्थी पेड़ के नीचे अपनी बारी का इंतजार करते रहे। संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद सचिव एसके गोविल ने बताया कि ए ग्रुप की चल रही दूसरे चरण की काउंसिलिंग मंगलवार को समाप्त हो जाएगी। सात सितंबर को बी व सी, आठ को डी व ई, नौ को जी, एच आइ और 10 सितंबर को एफ, जे व के ग्रुप की काउंसिलिंग होगी। सचिव ने बताया कि काउंसिलिंग के समापन के बाद सभी संस्थाओं से खाली सीटों का ब्योरा मांगा जाएगा। शासन के निर्णय के बाद ही आगे की रणनीति तय की जाएगी(दैनिक जागरण,लखनऊ,5.9.11)।

शिक्षक दिवस विशेषःशिक्षकों को दोष देना बेमानी

Posted: 05 Sep 2011 10:18 AM PDT

तारीफों की तरह आलोचनाओं का भी सरलीकरण होता है। अब इसे ही लें। आप किसी से भी बात करिए, चाहे वह संदर्भ तक से वाकिफ न हो, लेकिन अगर शिक्षा, शिक्षकों और नई पीढ़ी पर बात होने लगे तो वह छूटते ही कहेगा कि अब अध्यापकों में भला वह जज्बा कहां है, जो पहले हुआ करता था? पहले तो अध्यापक पीढ़ी गढ़ा करते थे। अब तो तनख्वाह के लिए ड्यूटी की खानापूर्ति भर करते हैं। मगर यह सही नहीं है। दरअसल, हम जरूरतें तो वर्तमान की देखते हैं, लेकिन जब बात आदर्शो की होती है तो हम अतीत की तरफ देखना पसंद करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि शिक्षकों के त्याग, बलिदान और अपने विद्यार्थियों के लिए कुछ भी कर जाने, किसी भी हद तक गुजर जाने का समृद्ध इतिहास है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर शिक्षक अपने दौर की जरूरतों को भी ध्यान में रखता है। आज एक तरफ तो हम अपने शिक्षकों पर यह तोहमत मढ़ते हैं कि अब वह सर्वपल्ली राधाकृष्णन और रवींद्र नाथ टैगोर जैसे शिक्षक नहीं हैं, जो अपने छात्रों को जीवनमूल्य दें। दूसरी तरफ हम यह भी उम्मीद करते हैं कि हमारे बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ें, जहां आधुनिक और प्रोफेशनल पढ़ाई होती हो ताकि पढ़ाई पूरी करते ही हमारे बच्चों को आकर्षक पे स्केल मिले। मगर क्या आप जानते हैं कि देश में किन स्कूलों की सबसे ज्यादा मांग है? कौन-से ऐसे व्यावसायिक शैक्षिक संस्थान हैं, जहां हर कोई पढ़ना चाहता है? जी, हां! ये वही देश के गिने-चुने व्यावसायिक शैक्षिक संस्थान हैं, जहां का कैम्पस प्लेसमेंट अखबारों की सुर्खियां बनता है। लोग नामी-गिरामी मैनेजमेंट संस्थानों में कई लाख रुपये सालाना देकर बच्चों की पढ़ाई के लिए तैयार रहते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अभी इनकी पढ़ाई खत्म भी नहीं होगी कि उनके बच्चों को ऐसा प्लेसमेंट मिलेगा, जिसके बारे में उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। दरअसल, यही विरोधभास है। अब हम अगर मान लें कि अध्यापकों का पहला काम मूल्यों का गढ़ना है तो कोई अच्छा अध्यापक मैनेजमेंट संस्थानों में हो ही नहीं सकता। क्योंकि मैनेजमेंट संस्थानों में जीवनमूल्यों के खिलाफ ही पढ़ाया जाता है, खिलाफ ही सिखाया जाता है। हालांकि खिलाफ का मतलब नकारात्मक नहीं है, लेकिन अतिरिक्त सजगता से अधिकतम मुनाफा कैसे हासिल किया जाए, प्रबंधन संस्थानों की शिक्षा का सार और प्रबंधन की सर्वोच्च कला यही है। अब आप जब मुनाफा की बात करते हैं तो कोई भी मुनाफा किसी न किसी की जेब से ही होता है। जब दुकानदार को सौदा बेचकर खूब मुनाफा मिलता है तो ग्राहक का नुकसान होता है। ग्राहक की परेशानी बढ़ती है। इसी तरह जब प्रबंधन की कला के रूप में इस तरह कमाने की तरकीबें सिखाई जाएं कि जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों की जेबें ढीली कराई जा सकें तो भले ही जेबों को ढीली कराना आपराधिक कृत्य न हो, लेकिन परिणाम में तो यह पूरी सजगता से हासिल किया गया वह लाभ है, जिसमें किसी न किसी को तो परेशानी होनी ही है। अब आप ही बताइए कि प्रबंधन संस्थानों के अध्यापक अपने विद्यार्थियों को मुनाफे की कला सिखाएं या जीवन के मूल्य सिखाएं। जीवन के मूल्य तो कहते हैं कि किसी को ठगो मत, लेकिन प्रबंधन की कला का सारा फोकस यही है कि सामने वाले को पता ही न चले और आप उसे अधिक से अधिक खाली करवा लें। दरअसल, हर दौर के जीवनमूल्यों की अपनी एक खास सीमा होती है। हम जिस दौर के अध्यापकों को आज तक आदर्श के सिंघासन से उतार नहीं पाए, वे आजादी के संघर्ष के दौर के अध्यापक हैं, जिनका एक खास तरह का जीवनमूल्य था। जो बच्चों में कूट-कूटकर देशभक्ति की भावनाएं भरते थे। देश को हर हाल में आजाद कराने की भावनाएं भरते थे। दरअसल, यह उस दौर की जरूरत थी और उस दौर के माहौल का हिस्सा था। आज हम आजाद हैं। किसी देश को कभी भी देशभक्त की भावना ओवरडोज नहीं होती। उसकी हमेशा जरूरत रहती है, लेकिन हम जिस दौर के अध्यापक की मूरत अपने दिलो-दिमाग से आज तक नहीं निकाल पाए, उस दौर में देशभक्ति सिर्फ जीवनमूल्य नहीं, बल्कि जीवन ध्येय भी था, क्योंकि हमारे तमाम बेहतरी के रास्ते का आखिरी सिरा आजादी था। अगर आजादी नहीं हासिल होती तो सारे मूल्य बेकार थे। आज ऐसा नहीं है। आज सारा दबाव आगे बढ़ने का है। ग्लोबल विश्व की चुनौतियों के बीच न सिर्फ अपने वजूद को बरकरार रखना है, बल्कि अपने वजूद को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण बनाने की चुनौती का यह दौर है। ऐसे में भला अध्यापक वैसे कैसे रह सकते हैं?(लोकमित्र,दैनिक जागरण,5.9.11)

शिक्षक दिवस विशेषःआदर्श पीढ़ी गढ़ें या प्रोफेशनल

Posted: 05 Sep 2011 10:13 AM PDT

जब हर रिश्ते को बाजार की नजर लग गई है, तब गुरु-शिष्य के रिश्तों पर इसका असर न हो ऐसा कैसे हो सकता है? नए जमाने के नए मूल्यों ने हर रिश्ते पर बनावट, नकलीपन और स्वार्थो की एक ऐसी चादर डाल दी है, जिसमें असली सूरत नजर ही नहीं आती। अब शिक्षा बाजार का हिस्सा है, जबकि भारतीय परंपरा में वह गुरु के अधीन थी, समाज के अधीन थी। बाजार में उतरे शातिर खिलाड़ी पूंजी के शातिर खिलाडि़यों ने जब से शिक्षा के बाजार में अपनी बोलियां लगानी शुरू की हैं, तबसे हालात बदलने शुरू हो गए थे। शिक्षा के हर स्तर के बाजार भारत में सजने लगे थे। इसमें कम से कम चार तरह का भारत तैयार हो रहा था। आम छात्र के लिए बेहद साधारण सरकारी स्कूल थे, जिनमें पढ़कर वह चौथे दर्जे के काम की योग्यताएं गढ़ सकता था। फिर उससे ऊपर के कुछ निजी स्कूल थे, जिनमें वह बाबू बनने की क्षमताएं पा सकता था। फिर अंग्रेजी माध्यमों के मिशनों, शिशु मंदिरों और मझोले व्यापारियों की शिक्षा थी, जो आपको उच्च मध्य वर्ग के करीब ले जा सकती थी। और सबसे ऊपर एक ऐसी शिक्षा थी, जिनमें पढ़ने वालों को शासक वर्ग में होने का गुमान पढ़ते समय ही हो जाता है। इस कुलीन तंत्र की तूती ही आज समाज के सभी क्षेत्रों में बोल रही है। इस पूरे चक्र में कुछ गुदड़ी के लाल भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, इसमें दो राय नहीं। किंतु हमारी व्यवस्था ने वर्ण व्यवस्था के हिसाब से ही शिक्षा को भी चार खानों में बांट दिया है और चार तरह के भारत बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। जाहिर तौर पर यह हमारी एकता- अखंडता और सामाजिक समरसता के लिए बहुत घातक है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बदहाली हालात यह हैं कि कुल 54 करोड़ का हमारा युवा वर्ग उच्च शिक्षा के लिए तड़प रहा है। उसकी जरूरतों को हम पूरा नहीं कर पा रहे हैं। सरकारी क्षेत्रों की उदासीनता के चलते आज हमारे सरकारी विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय लगभग स्लम में बदल रहे हैं। एक लोक कल्याणकारी सरकार जब सारा कुछ बाजार को सौंपने को आतुर हो तो किया भी क्या जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा का बाजार अब उन व्यापारियों के हवाले है, जिन्हें इससे मोटी कमाई की आस है। जाहिर तौर पर शिक्षा अब सबके लिए सुलभ नहीं रह जाएगी। कम वेतन और सुविधाओं में काम करने वाले शिक्षक आज भी गांवों और सूदूर क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाए हुए हैं, किंतु यह संख्या निरंतर कम हो रही है। सरकारी प्रोत्साहन के अभाव और भ्रष्टाचार ने हालात बदतर कर दिए हैं। इससे लगता है कि शिक्षा अब हमारी सरकारों की प्राथमिकता का हिस्सा नहीं रही। बढ़ गई है जिम्मेदारी ऐसे कठिन समय में शिक्षक समुदाय की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि वह ही अपने विद्यार्थियों में मूल्य और संस्कृति प्रवाहित करता है। आज नई पीढ़ी में जो भ्रमित जानकारी या कच्चापन दिखता है, उसका कारण शिक्षक ही हैं। क्योंकि अपने सीमित ज्ञान, कमजोर समझ और पक्षपातपूर्ण विचारों के कारण वे बच्चों में सही समझ विकसित नहीं कर पाते। इसके कारण गुरु के प्रति सम्मान भी घट रहा है। रिश्तों में भी बाजार की छाया इतनी गहरी है कि वह अब डराने लगी है। आज आम आदमी जिस तरह शिक्षा के प्रति जागरूक हो रहा है और अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए आगे आ रहा है, वे आकांक्षाएं विराट हैं। उनको नजरंदाज करके हम देश का भविष्य नहीं गढ़ सकते। सबसे बड़ा संकट आज यह है कि गुरु-शिष्य के संबंध आज बाजार के मानकों पर तौले जा रहे हैं। युवाओं का भविष्य जिन हाथों में है, उनका बाजार तंत्र किस तरह शोषण कर रहा है, इसे समझना जरूरी है। सरकारें उन्हें प्राथमिक शिक्षा में नए-नए नामों से किस तरह कम वेतन पर रखकर उनका शोषण कर रही हैं, यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इसके चलते योग्य लोग शिक्षा क्षेत्र से पलायन कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि जीवन को ठीक से जीने के लिए यह व्यवसाय उचित नहीं है। नई पीढ़ी की व्यापक आकांक्षाएं शहरों में पढ़ रही नई पीढ़ी की समझ और सूचना का संसार बहुत व्यापक है। उसके पास ज्ञान और सूचना के अनेक साधन हैं, जिसने परंपरागत शिक्षकों और उनके शिक्षण के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। नई पीढ़ी बहुत जल्दी और ज्यादा पाने की होड़ में है। उसके सामने एक अध्यापक की भूमिका बहुत सीमित हो गई है। नए जमाने ने श्रद्धाभाव भी कम किया है। उसके अनेक नकारात्मक प्रसंग हमें दिखाई और सुनाई देते हैं। गुरु-शिष्य रिश्तों में मर्यादाएं टूट रही हैं, वर्जनाएं टूट रही हैं, अनुशासन भी भंग होता दिखता है। नए जमाने के शिक्षक भी विद्यार्थियों में अपनी लोकप्रियता के लिए कुछ ऐसे काम कर बैठते हैं, जो उन्हें लांछित ही करते हैं। सीखने की प्रक्रिया का मर्यादित होना भी जरूरी है। परिसरों में संवाद, बहसें और विषयों पर विमर्श की धारा लगभग सूख रही है। परीक्षा को पास करना और एक नौकरी पाना इस दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है। ऐसे में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस पीढ़ी की आकांक्षाओं की पूर्ति करने की है। साथ ही उनमें विषयों की गंभीर समझ पैदा करना भी जरूरी है। शिक्षा के साथ कौशल और मूल्यबोध का समावेश न हो तो वह व्यर्थ हो जाती है। इसलिए स्किल के साथ मूल्यों की शिक्षा बहुत जरूरी है। कॉरपोरेट के लिए पुर्जे और रोबोट तैयार करने के बजाए अगर हम उन्हें मनुष्यता, ईमानदारी और प्रामणिकता की शिक्षा दे पाएं और स्वयं भी खुद को एक रोल मॉडल के तौर पर प्रस्तुत कर पाएं तो यह बड़ी बात होगी। शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए एक दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में सामने आते हैं। वे उनका रोल मॉडल भी हो सकते हैं। सही तस्वीर गढ़ने की जरूरत गुरु-शिष्य परंपरा को समारोहों में याद की जाने वाली वस्तु के बजाए अगर हम उसकी सही तस्वीरें गढ़ सकें तो यह बड़ी बात होगी, लेकिन देखा यह जा रहा है कि गुरु तो गुरु घंटाल बन रहे हैं और छात्र तोल-मोल करने वाले माहिर चालबाज। काम निकालने के लिए रिश्तों का इस्तेमाल करने से लेकर रिश्तों को कलंकित करने की कथाएं भी हमारे सामने हैं, जो शर्मसार भी करती हैं और चेतावनी भी देती हैं। नए समय में गुरु का मान-स्थान बचाए और बनाए रखा जा सकता है। बशर्ते हम विद्यार्थियों के प्रति एक ईमानदार सोच रखें, मानवीय और संवेदनशील व्यवहार रखें, उन्हें पढ़ने के बजाए समझने की दिशा में प्रेरित करें, उनके मानवीय गुणों को ज्यादा प्रोत्साहित करें। भारत निश्चय ही एक नई करवट ले रहा है, जहां हमारे नौजवान बहुत आशावादी होकर अपने शिक्षकों की तरफ निहार रहे हैं, उन्हें सही दिशा मिले तो आसमान में रंग भर सकते हैं। हमारे युवा भारत में इस समय दरअसल शिक्षकों का विवेक, रचनाशीलता और कल्पनाशीलता भी कसौटी पर हैं, क्योंकि देश को बनाने की इस परीक्षा में हमारे छात्र अगर फेल हो रहे हैं तो शिक्षक पास कैसे हो सकते हैं?(संजय द्विवेदी,दैनिक जागरण,5.9.11)

शिक्षक दिवस विशेषः शिक्षा की दशा-दिशा

Posted: 05 Sep 2011 10:10 AM PDT

आज शिक्षक दिवस है, मतलब शिक्षा और शिक्षकों के योगदान और महत्व को समझने का दिन। पर आज जब शिक्षा का पूरा तंत्र एक बड़े व्यवसाय में तब्दील हो रहा है, क्या हम शिक्षा और शिक्षक की गरिमा को बरकरार रख पाए हैं? वास्तव में पूंजीवादी विश्व के बदलते स्वरूप और परिवेश में हम शिक्षा के सही उद्देश्य को ही नहीं समझ पा रहे है। सही बात तो यह है कि शिक्षा का सवाल जितना मानव की मुक्ति से जुड़ा है उतना किसी अन्य विषय या विचार से नहीं। एक बार देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ब्रिटेन के एडिनबरा विश्र्वविद्यालय मे भाषण देते हुए कहा था कि शिक्षा और मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति है। पर जब मुक्ति का अर्थ ही बेमानी हो जाए, उसका लक्ष्य सर्वजन हिताय की परिधि से हटकर घोर वैयक्तिक दायरे में सिमट जाए तो मानव-मन स्व के निहितार्थ ही क्रियाशील हो उठता है और समाज में करुणा की जगह क्रूरता, सहयोग की जगह दुराव, प्रेम की जगह राग-द्वेष व प्रतियोगिता की भावना ले लेती है। इन दिनों जब शिक्षा की गुणात्मकता का तेजी से Oास होता जा रहा है, समाज में सहिष्णुता की भावना लगातार कमजोर पड़ती जा रही है और गुरु-शिष्य संबंधों की पवित्रता को ग्रहण लगता जा रहा है। डॉ. राधाकृष्णन का पुण्य स्मरण फिर एक नई चेतना पैदा कर सकता है। वह शिक्षा में मानव के मुक्ति के पक्षधर थे। वह कहा करते थे कि मात्र जानकारियां देना शिक्षा नहीं है। करुणा, प्रेम और श्रेष्ठ परंपराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। शिक्षा की दिशा में हमारी सोच अब इतना व्यावसायिक और संकीर्ण हो गई है कि हम सिर्फ उसी शिक्षा की मूल्यवत्ता पर भरोसा करते हैं और महत्व देते हैं जो हमारे सुख-सुविधा का साधन जुटाने में हमारी मदद कर सके, बाकी चिंतन को हम ताक पर रखकर चलने लगे हैं। देश में बी.एड. महाविद्यालयों को खोलने को लेकर जिस तरह से राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद धड़ल्ले से स्वीकृति प्रदान कर रहा है, वह एक दुखद गाथा है। प्राय: सभी महाविद्यालय मापदंडों की अवहेलना करते हैं। महाविद्यालय धन कमाने की दुकान बन गए हैं और शिक्षा का अर्थ रह गया है है परीक्षा, अंक प्राप्ति, प्रतिस्पर्धा तथा व्यवसाय। देश में यही हालत तकनीकी शिक्षा की है जहां बिना किसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी के लगातार कॉलेज खुल रहे है। लोगों को यह एक अच्छा व्यवसाय नजर आने लगा है। पिछले दिनों इस पर योजना आयोग ने अपना ताजा दृष्टिकोण-पत्र जारी कर दिया है। आयोग चाहता है कि ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना की अनुमति दे दी जानी चाहिए, जिनका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो। दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक 1 अप्रैल, 2012 से शुरू हो रही 12वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा, खासकर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाने की जरूरत है। अभी इस दृष्टिकोण-पत्र पर सरकार की मुहर नहीं लगी है, इसके बावजूद यह सुझाव पिछले वर्षो के दौरान उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में चली चर्चा के अनुरूप ही है। विदेशी विश्र्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखा खोलने की इजाजत के साथ भी यह बात जुड़ी हुई है कि वे सिर्फ मुनाफे की संभावना दिखने पर ही यहां आएंगे। आज आवश्यकता है देश में प्राचीन समृद्ध ज्ञान के साथ युक्तिसंगत आधुनिक ज्ञान आधारित शिक्षा व्यवस्था की। देशभक्ति, स्वास्थ्य-संरक्षण, सामाजिक संवदेनशीलता तथा अध्यात्म-यह शिक्षा के भव्य भवन के चार स्तंभ हैं। इन्हें राष्ट्रीय शिक्षा की नीति में स्थान देकर स्वायत्त शिक्षा को संवैधानिक स्वरूप प्रदान करना चाहिए। इन सब उपायों से शिक्षा की चुनौतियों का मुकाबला किया जा सकता है। शिक्षा बाजार नहीं अपितु मानव मन को तैयार करने का उदात्त सांचा है। जितनी जल्दी हम इस तथ्य को समझेंगे उतना ही शिक्षा का भला होगा। तभी हम शिक्षक दिवस को सच्चे अर्थो में सार्थक कर सकेंगे और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अधूरे सपनों को पूरा कर पाएंगे (एस के द्विवेदी,दैनिक जागरण,5.9.11)।

परीक्षाओं में अब गोपनीयता का बहाना नहीं चलेगा

Posted: 05 Sep 2011 10:06 AM PDT

प्रतियोगी परीक्षा संचालित कराने वाली संस्थाओं को अब पुरानी मानसिकता को बदलना होगा और सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून के तहत परीक्षार्थियों को परीक्षा से जुड़ी सारी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है। जस्टिस आरवी रवींद्रन और एके पटनाइक की पीठ ने इस फैसले के साथ इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (आइसीएआइ) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था इस पारदर्शिता कानून के तहत एक अधिकारी संस्था होना चाहिए, जो आरटीआइ के लिए आने वाले आवेदनों की छंटनी करे। पीठ ने कहा, गोपनीयता का बहाना अब ज्यादा दिन नहीं चलेगा। प्रतियोगी परीक्षा संचालित कराने वाली संस्थाओं, जैसे आइसीएआइ को समझना होगा यह युग ज्यादा से ज्यादा सूचनाओं के आदान-प्रदान का है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि पारदर्शिता ही एकमात्र रास्ता है, जो भ्रष्टाचार को कम कर सकता है। जजों ने कहा, इसमें संदेह नहीं कि पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त काम करना और रिकॉर्डो को ज्यादा संभाल कर रखना होगा। पीठ ने कहा कि अतिरिक्त काम को सूचना न देने की ढाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इन संस्थाओं को आरटीआइ के प्रावधानों को स्वीकारना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश आइसीएआइ द्वारा दायर उस अपील की सुनवाई करते दिए जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि सभी प्रतियोगी परीक्षाओं की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त कर सकते हैं(दैनिक जागरण,दिल्ली,5.9.11)।

दिल्लीःचौथी के छात्रों को मिलेगा मिनी कंप्यूटर

Posted: 05 Sep 2011 10:04 AM PDT

शिक्षक दिवस के मौके पर दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने अपने शिक्षकों को गत वर्षो की तरह कई तोहफे देने की घोषणा की है। साथ ही इस बार चौथी कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों को मिनी कंप्यूटर देने का भी ऐलान किया है।

सोमवार को राज निवास के समीप शाह ऑडिटोरियम में आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान मेयर रजनी अब्बी ने एमसीडी के 100 शिक्षकों को पुरस्कृत किया। सम्मानित शिक्षकों को सात हजार रुपये नकद, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न भेंट किया गया।

मेयर रजनी अब्बी ने कहा कि एमसीडी के सभी कर्मचारियों के साथ-साथ शिक्षकों को चिकित्सा के बिल के भुगतान के लिए विभिन्न विभागों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। बस अपना कार्ड एमसीडी के सूचीबद्ध अस्पताल में दिखाकर ही चिकित्सा सुविधा का लाभ मिल सकेगा। वहीं इस अवसर पर शिक्षा समिति के चेयरमैन महेंद्र नागपाल ने चौथी कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों को मिनी कंप्यूटर दिए जाने की योजना का ऐलान किया। उन्होंने कहा इस मद में करीब 30 करोड़ रुपये खर्च होंगे, इसके लिए सरकार के साथ बातचीत चल रही है(दैनिक जागरण,दिल्ली संवाददाता,5.9.11)।

कोल इंडिया के 19000 अधिकारियों का 26 से आंदोलन

Posted: 05 Sep 2011 05:37 AM PDT

कोल इंडिया के करीब 19000 अधिकारी प्रबंधन के रवैये से नाराज हैं। रविवार को सीएमपीडीआई में हुई कोल माइंस ऑफिसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएमओएआई) की अपेक्स कमेटी की बैठक में वर्षो से लंबित प्रोन्नति, पीआरपी, कैरियर ग्रोथ आदि मांगों को लेकर 26 सितंबर से आंदोलन का निर्णय लिया गया।

बैठक की अध्यक्षता एसोसिएशन के अध्यक्ष सुखदेव नारायण ने की। मौके पर यू दास, दामोदर बनर्जी, पीके सिंह, पूर्व महासचिव केपी सिंह, सीसीएल अध्यक्ष वीपी सिंह, सीएमपीडीआई अध्यक्ष एवी सहाय, सचिव एसके जायसवाल व प्रमोद उपस्थित थे।

सिर्फ आश्वासन मिला

बैठक के बाद एसोसिएशन के अध्यक्ष सुखदेव नारायण ने प्रेसवार्ता में कहा कि कोल इंडिया प्रबंधन मांगों पर सिर्फ आश्वासन देती है। अधिकारियों की प्रोन्नति का मामला 15 वर्षो से लंबित है। मांगों जल्द पूरी नहीं हुई तो उत्पादन रोक दिया जाएगा।


जन विरोधी है नया माइंस एक्ट

सुखदेव नारायण ने बताया कि केंद्रीय श्रम मंत्रालय माइंस एक्ट में संशोधन की तैयारी में है। यदि यह लागू हुआ, तो काई भी इंजीनियर काम करने की स्थिति में नहीं रहेगा। यदि कोई दुर्घटना हुई, तो सीधे इंजीनियर को दोषी माना जाएगा। जबकि सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाला डीजीएमएस बेदाग बच जाएगा। 

नए एक्ट में खान दुर्घटना होने पर संबंधित इंजीनियर को सात साल की सजा का भी प्रावधान है। पहले यह सिर्फ दो साल थी। इसमें डीजीएमएस को अधिकारियों को बलि का बकरा बनाने का पूरा अधिकार दिया गया है। ऐसे में इस तरह का एक्ट कोयला अधिकारियों को कतई मंजूर नहीं होगा। प्रबंधन इसमें बदलाव लाने के लिए पहल करे।

नहीं लागू हुई पेंशन स्कीम

कोल इंडिया प्रबंधन ने एक जनवरी 2007 को अधिकारियों के लिए पेंशन स्कीम बनाई थी। लेकिन आज तक इसे लागू नहीं किया गया। फंड में पैसा भी नहीं है। स्थिति यह है कि पांच साल बाद यह स्कीम ही बंद हो जाएगी। डीएलआई फंड में अधिकारियों का करीब 400 करोड़ रुपए जमा है, लेकिन अधिकारी की मृत्यु पर उसके आश्रित को इस फंड से फूटी कौड़ी भी नहीं दी गई(दैनिक भास्कर,रांची,5.9.11)।

झारखंड :हाई स्कूल से हटाए जाएंगे प्राथमिक शिक्षक

Posted: 05 Sep 2011 05:36 AM PDT

जिला शिक्षा प्रारंभिक समिति की समीक्षा बैठक पिछले दिन हुई थी। इसमें डीसी ने उच्च विद्यालयों में प्रतिनियोजित प्रारंभिक शिक्षकों का प्रतिनियोजन तत्काल रद्द करने का निर्देश डीएसई को दिया। निर्देश में कहा गया है कि प्लस टू विद्यालयों में प्रतिनियुक्त प्रारंभिक शिक्षकों के बदले मूल विद्यालय में पारा शिक्षक की मांग विभाग से की जाए।

अपर समाहर्ता को सूची उपलब्ध कराएं


भूमिहीन स्कूलों के संबंध में निर्देश दिया गया कि ऐसे स्कूलों को चिह्न्ति कर सूची अपर समाहर्ता और अंचलाधिकारी को उपलब्ध कराएं। लंबित असैनिक कार्य पर करें मामला दर्ज : उपायुक्त ने निर्देश दिया कि वर्ष 2009-10 तक की जो भी योजनाएं अपूर्ण हैं, उन स्थलों के ग्राम शिक्षा समिति के अध्यक्ष एवं सचिव सह प्रधान शिक्षक के विरुद्ध 15 दिनों के भीतर पब्लिक डिमांड रिकवरी एक्ट की धारा 6 और 7 के तहत मामला अनिवार्य रूप से दर्ज कराएं।

31 दिसंबर तक अंकेक्षण करें : 
उपायुक्त ने निर्देश दिया कि सर्व शिक्षा अभियान का प्रारंभिक काल से अद्यतन ग्राम शिक्षा समिति, संकुल संसाधन केंद्र, प्रखंड संसाधन केंद्र, आदर्श संकुल, कस्तूरबा गांधी आवासीय की विभिन्न गतिविधियों के संचालन में हुए व्यय का आंतरिक अंकेक्षण 31 दिसबंर तक करें। 

शिथिलता बरतनेवालों को करें दंडित

सेवानिवृत्तिमामले में उपायुक्त ने निर्देश दिया कि शिक्षक या कर्मी जिस माह में सेवानिवृत्त हो रहे हैं, उसके दो माह पूर्व सेवानिवृत्ति से संबंधित सभी अभिलेख अनिवार्य रूप से डीएसई कार्यालय को उपलब्ध कराएं, ताकि ऐसे मामलों का निष्पादन समय रहते किया जा सके। 

यदि किसी सेवानिवृत्त होने वाले शिक्षक, प्रधानाध्यापक सह निकासी पदाधिकारी के स्तर से शिथिलता बरती जाती है तो तत्काल ऐसे कर्मियों को दंडित करें। यदि किसी लिपिक द्वारा अनावश्यक विलंब किया जाता है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई करें(दैनिक भास्कर,रांची,5.9.11)।

छपरा:सेना बहाली में अव्यवस्था कई बेहोश होकर गिरे,भगदड़

Posted: 05 Sep 2011 05:34 AM PDT

छपरा के हवाई अड्डा मैदान में रविवार को आयोजित सेना बहाली में प्रशासनिक अव्यवस्था एक बार फिर सामने आई। बहाली के दौरान चिलचिलाती धूप में रहने के कारण चार-पांच अभ्यर्थी गश खाकर गिर गए। इसके बाद मैदान में भगदड़ मच गई। इस भगदड़ में कई अभ्यार्थियों को चोटें भी आईं और भगदड़ अनियंत्रित हो गई। स्थानीय पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। बेहोश हुए अभ्यार्थियों को प्रशासन की मदद से इलाज करवाया जा रहा है।

गौरतलब है कि सेना में बहाली के लिए वैशाली, सीवान, गोपालगंज और छपरा जिले के लिए दौड़ के साथ स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है। इसमें उक्त जिले के लिए अलग-अलग दिन बनाये गए हैं। रविवार को छपरा के अभ्यर्थियों को बुलाया गया था(दैनिक भास्कर,छपरा,5.9.11)।

छत्तीसगढ़ :शिक्षा के मंदिर ही नहीं शिक्षक भी हैं माओवादियों के निशाने पर

Posted: 05 Sep 2011 05:30 AM PDT

दूरस्थ और दुर्गम इलाकों में विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा की लौ जलाए रखने वाले इन शिक्षकों का जीवन भी खतरे में ही है।

हालांकि बस्तर और दंतेवाड़ा जिले में घोषित तौर पर चुनाव कार्य को छोड़ शिक्षक माओवादी हिंसा से परे ही रहे हैं, लेकिन बीजापुर और नारायणपुर में कई शिक्षकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।इनमें से कुछ धोखे में मारे गए तो कुछ को माओवादियों ने मुखबिरी के शक में मार डाला है।

बीजापुर जिले में पिछले कुछ सालों में करीब आधा दर्जन शिक्षक माओवादी हिंसा में मारे गए हैं। वर्ष 2009 में बीजापुर के मुर्गाबाजार में माओवादियों की फायरिंग की चपेट में आकर शिक्षाकर्मी वर्ग 3 की मृत्यु हो गई।

बीजापुर जिले में जेवारम के निकट 2007 में यात्री बस पर माओवादियों की गोलीबारी में शिक्षाकर्मी पुनेम शंकर की मौत हो गई थी। मार्च 2006 में बासागुड़ा दुर्गा मंदिर के निकट माओवादियों द्वारा किए गए बारूदी विस्फोट की चपेट में आकर लक्ष्मैया सोड़ी मारा गया था।


वर्ष 2006 में कैका पंचायत के गांव मोसला में देवलाल दुग्गा नामक शिक्षाकर्मी की उसके घर में ही हत्या कर दी गई थी। करीब दस साल पहले भी भद्रकाली-तारलागुड़ा मार्ग पर सूर्यनारायण चापड़ी नामक शिक्षक को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था।

इसी साल फरवरी में नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के रहने वाले शिक्षाकर्मी वर्ग-2 कमलू वर्दा की जन अदालत लगाने के बाद तीन अन्य लोगों के साथ हत्या कर दी गई थी। धुरबेड़ा स्कूल में पदस्थ इस शिक्षाकर्मी पर माओवादियों ने मुखबिरी का आरोप लगाया था(दैनिक भास्कर,जगदलपुर/बीजापुर,5.9.11)।

राजस्थान :सेवानिवृत्त शिक्षक ने खोला स्कूल, यहां नहीं लगती फीस

Posted: 05 Sep 2011 05:28 AM PDT

सेवानिवृत्त शिक्षक सांवरमल शर्मा को देखकर आरक्षण फिल्म का वो सीन सामने आ जाता है, जब अमिताभ बच्चन गरीब तबके के बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने के लिए तबेले में कोचिंग क्लास लगाते हैं। ऐसा ही कुछ सांवरमल कर रहे हैं। 1997 से वे एक ऐसा स्कूल चला रहे हैं, जिसमें न तो फीस लगती है और न ड्रेस व किताबों का खर्चा। खास बात यह है कि वे खुद घर-घर जाकर ऐसे बच्चों को तलाशते हैं, जो पैसे के अभाव में पढ़ नहीं पाते या फिर उनके परिवार में कभी कोई पढ़ा- लिखा नहीं।


सेवाकाल के दरमियान ही अपने सहकर्मियों के साथ चर्चा करते हुए सांवरमल शर्मा ने प्रस्ताव रखा था कि स्कूल में पैसा लेकर खूब पढ़ा लिया अब सेवानिवृत्ति के बाद बिना पैसे लिए ऐसे बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं जो स्कूल नहीं जा सके। सभी ने प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी। इसके बाद 24 जून 1997 को बाल सेवा सदन के रूप में यह अनोखा स्कूल शुरू हुआ और इसमें पहला प्रवेश हुआ। खास बात देखिए कि पहला एडमिशन भी स्कूल में ऐसे सात वर्षीय बच्चे का हुआ, जिसके माता- पिता का बचपन में ही साया उठ चुका था। साथी शिक्षकों के सहयोग और अथक मेहनत से वह बच्चा दसवीं तक पढ़ाई कर स्वावलंबी बना। बकौल सांवरमल, वर्तमान में विद्यालय में 63 बच्चें हैं, जिनको पुस्तकों के अलावा ड्रेस तथा स्वेटर भी दिया जा रहा है।

बेशकीमती जमीन स्कूल के नाम

मोदी संस्थान के ठीक सामने बेशकीमती जमीन होने पर कोई भी शख्स प्रोजेक्ट शुरू कर करोड़ों कमाने की प्लानिंग करेगा। लेकिन, सेवानिवृत्त शिक्षक सांवरमल ने मोदी संस्थान के सामने अपनी जमीन में से दो बीघा इस अनोखे स्कूल बाल सेवा सदन को देकर रजिस्ट्री करवा दी। 15 साल पहले एक खेजड़ी के नीचे शुरू हुए इस अनोखे स्कूल में सांवरमल शर्मा तथा उनके साथी शिक्षकों व कुछ पहचान वालों के सहयोग से तीन चार कमरे तथा पानी की व्यवस्था भी हो गई है। स्कूल में स्वयं सांवरमल के अलावा उनकी बेटी तथा एक अन्य वैतनिक शिक्षक पढ़ा रहा है। स्कूल में पढ़ने वाले कुछ बच्चों के खाने की व्यवस्था भी सांवरमल अपने घर से कर रहे हैं(शशिकांत पुजारी,दैनिक भास्कर,लक्ष्मणगढ़/सीकर,5.9.11)।

इंदौर:चिल्ला-चिल्लाकर पढ़ाना बना मुसीबत

Posted: 05 Sep 2011 05:26 AM PDT

गले में दर्द, सूजन या आवाज भर्राने के मरीजों में इन दिनों 20 फीसदी का इजाफा हुआ है। इनमें भी 70 फीसदी वे शिक्षक हैं जो शहरों में स्कूल या कोचिंग में पढ़ाते हैं। मेडिकल साइंस की भाषा में इसे आवाज की 'फिजूलखर्ची' भी कहा जाता है और इस बीमारी को 'टीचर्स नोड्यूल' नाम दिया गया है। डॉक्टरों की मानें तो बड़े पैमाने पर यह समस्या अभी उभरकर आ रही है।

इसकी वजह शहरों में स्कूल-कॉलेजों के साथ-साथ विद्यार्थियों की बड़ी तादाद, जिसके कारण शिक्षकों को लंबे समय तक तेज आवाज में पढ़ाना पढ़ता है। हालांकि वर्तमान में कई उपकरण मौजूद हैं, जिनकी मदद से गले पर अधिक जोर दिए बिना पढ़ाया जा सकता है। मगर इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग अभी इतना आम नहीं हुआ है। एमवाय अस्पताल के नाक-कान-गला विशेषज्ञ डॉ. यशवंत मारू कहते हैं वैसे तो गायक, टीचर्स, हॉकर्स और नेताओं को यह समस्या ज्यादा आती है पर शिक्षकों की संख्या ज्यादा है।


ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. सुबीर जैन कहते हैं आवाज का 60 फीसदी उपयोग करने से व्यक्ति बिना रुके 40 मिनट तक बोल सकता है लेकिन पूरी ताकत से बोलने लगे तो आवाज दरदरी हो जाती है। लय बिगड़ जाती है। दरअसल वोकल कार्ड (स्वर यंत्र के तंतु) पर सूजन आने से नोड्यूल बन जाता है। डॉ. उपेन्द्र सोनी बताते हैं टीचर्स नोड्यूल के मरीजों की संख्या बढ़ी है। वहीं चॉक-डस्टर से एलर्जी के कारण भी गला भर्राना आदि समस्याएं आती थी।

ऑपरेशन करवाया, फिर परेशानी बढ़ी
धार में कोचिंग क्लास संचालक गिरीश बिड़कर 17 साल से पढ़ा रहे हैं और पांच साल से इस समस्या से परेशान हैं। मैं एक बार ऑपरेशन भी करवा चुका हूं लेकिन फिर से परेशानी हो रही है। रश्मि एक निजी स्कूल में पढ़ाती हैं, वे आवाज भर्राने की समस्या से जूझ रही हैं। डॉक्टर ने कम बोलने की सलाह दी थी किंतु उन्होंने यह कह दिया कि मेरे पास छोटे बच्चों की कक्षा है। इसलिए संभव नहीं है। आखिरकार समस्या बढ़ी तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी। 

लगातार बोलने से आ जाती है सूजन
वोकल कॉर्ड सितार के तार की तरह होता है। लगातार व जरूरत से अधिक बोलने पर तंतु पर सूजन आ जाती है। एक बिंदु पर दबाव बढ़ने से वहां नोड्यूल बन जाता है। 

- कार्ड लैस माइक का उपयोग करें 
- कक्षा में बीच में खड़े होकर बच्चों को समझाएं। 
-लगातार पीरियड नहीं लें, बीच में अंतराल भी रखें। 
- कक्षा में 100 से ज्यादा छात्र हो तो कॉर्डलैस रखें।

लक्षण
आवाज भर्राना, गले में दर्द, बोलते समय थक जाना, आवाज में भारीपन या आवाज नहीं निकलना(दैनिक भास्कर,इंदौर,5.9.11)।

ग्वालियर:फीस बचाने फर्जी आय प्रमाण पत्र लगाए!

Posted: 05 Sep 2011 05:24 AM PDT

इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले कई छात्र फीस बचाने व छात्रवृत्ति पाने के लिए फर्जी आय प्रमाण-पत्र लगा रहे हैं। जीवाजी यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग संस्थान ने संदेह के आधार पर लगभग दो दर्जन छात्रों के आय व जाति प्रमाण पत्रों की जांच शुरू करा दी है। चूंकि प्रमाण पत्र तहसीलदारों ने जारी किए हैं, इसलिए जांच में जिला प्रशासन की मदद मांगी गई है। जांच में प्रमाण पत्र फर्जी मिले तो इन छात्रों के प्रवेश निरस्त कर दिए जाएंगे।

जेयू के इंजीनियरिंग संस्थान में केमिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांच में 110 सीटों पर छात्रों को इस सत्र में प्रवेश दिया गया है। इनमें दस सीटें ट्यूशन फीस वेबर स्कीम की शामिल हैं। इस स्कीम के तहत उन छात्रों को ही प्रवेश दिया जाता है जिनके अभिभावकों की सालाना आय ढाई लाख रुपए से अधिक न हो।


जेयू प्रशासन ने जब छात्रों के प्रमाण-पत्रों की जांच की तो कुछ के प्रमाण-पत्र संदिग्ध लगे। कुछ छात्रों ने तो पालकों के स्थान पर स्वयं की आय का प्रमाण-पत्र आवेदन के साथ लगा रखा है, जो नियम विरुद्ध है। लगभग एक दर्जन छात्रों के जाति प्रमाण पत्र संदिग्ध पाए गए हैं। समझा जाता है कि निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में भी इसी तरह फर्जी आय प्रमाण पत्र लगाए गए हैं। ऐसे संदिग्ध प्रमाण पत्रों की जांच के बाद ही सही स्थिति पता चल सकेगी। 

वेबर स्कीम की 900 सीटें
अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के निर्देश पर प्रदेश भर के इंजीनियरिंग कॉलेजों में ट्यूशन फीस वेबर स्कीम (टीएफडब्ल्यू) के तहत 8500 सीटों पर प्रवेश दिया गया। ग्वालियर शहर के 24 इंजीनियरिंग कॉलेजों की 900 सीटों पर प्रवेश दिया गया। 

नए नियम में जांच की इजाजत नहीं
राजस्व विभाग ने सात सितंबर 2010 को आय प्रमाण-पत्र बनाने की प्रक्रिया बदल दी थी। नए आदेश में कहा गया है कि आवेदक से शपथ पत्र लेकर उसके द्वारा बताई गई आय के आधार पर प्रमाण पत्र जारी किया जाए। प्रमाण पत्र जारी होने के बाद आवेदक के शपथ पत्र को तहसीलदार दफ्तर के नोटिस बोर्ड पर चस्पा किया जाए ताकि किसी को आपत्ति हो तो दर्ज करा सके(दैनिक भास्कर,ग्वालियर,5.9.11)।

मध्य प्रदेश :कोचिंग संस्थानों को लेनी होगी परमिशन!

Posted: 05 Sep 2011 05:23 AM PDT

प्रदेश सरकार कोचिंग संस्थानों पर नियंत्रण की तैयारी में है। इसके लिए अफसरों को प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके पीछे सरकार की मंशा सरकारी खजाने को भरने के साथ ही कोचिंग संस्थानों की फीस पर नियंत्रण करना है। फिलहाल कोचिंग संस्थान अभी किसी भी विभाग के सीधे नियंत्रण में नहीं है।

आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच सालों में राजधानी सहित प्रदेश के अन्य शहरों में कोचिंग संस्थानों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश में कोचिंग का सालाना कारोबार लगभग दो सौ करोड़ को पार कर चुका है।


प्रदेश के सभी निजी इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की फीस प्रवेश और फीस नियामक कमेटी निर्धारित करती है। वहीं, कोचिंग संस्थानों की फीस उनके संचालक तय करते हैं। इसी को देखते हुए कोचिंग संस्थानों को सरकारी दायरे में लाने की कवायद शुरू की गई है। प्रदेश के अधिकांश बड़े कोचिंग संचालकों ने फ्रेंचाइजी ले रखी है। इनके मुख्यालय राजस्थान के कोटा जिले में स्थित हैं।
उच्च शिक्षा विभाग के सूत्रों की माने तो नए नियम लागू होने के बाद संचालकों को कोचिंग संस्थान शुरू करने से पहले सरकार से परमिशन लेना होगा। इसके लिए सरकार उनसे तय फीस वसूलेगी। साथ ही संचालकों को संस्थान का क्षेत्रफल, फेकल्टी और शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता के अलावा पार्किग की व्यवस्था की जानकारी भी देनी होगी।

करनी पड़ेगी माथा-पच्ची
कोचिंग संस्थानों को अपने नियंत्रण में लाने के लिए सरकार को माथापच्ची करनी होगी। क्योंकि इसमें कई सरकारी संस्थाओं की भागीदारी होती है। फिलहाल उच्च शिक्षा विभाग ने इस पर नियंत्रण करने के लिए कमेटी बनाई है, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर ये तय किया जाएगा कि इसके नियंत्रण के लिए नियम बने या कानून(अभिषेक दुबे,दैनिक भास्कर,भोपाल,5.9.11)।

डीयू में शुरू हुआ देश का सबसे सस्ता इंजीनियरिंग कोर्स

Posted: 05 Sep 2011 05:21 AM PDT

फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज के जरिये देशभर में सबसे कम शुल्क पर एमबीए की पढ़ाई कराने वाले डीयू ने अब इंजीनियरिंग के लिए भी ऐसी ही शुरुआत की है। आज जबकि राजधानी में ही चल रहे विश्वविद्यालयों में बी.टेक पाठ्यक्रमों के लिए छात्रों से करीब दो लाख रुपये तक फीस वसूली जा रही है, डीयू महज 40 हजार रुपये में छात्रों को बी.टेक-बीएस इनोवेशन विद मैथमेटिक्स एंड आई पाठ्यक्रम मुहैया कराएगा।

कुलपति प्रो. दिनेश सिंह ने बताया कि यह पाठ्यक्रम न सिर्फ सस्ता है बल्कि क्वालिटी एजुकेशन के मोर्चे पर अन्य पाठ्यक्रमों से दो कदम आगे है। कुलपति ने बताया कि इस पाठ्यक्रम के तहत सप्ताह में 20 कक्षाओं का आयोजन होगा। इन कक्षाओं के बाद छह स्पेशल कक्षाएं आयोजित होंगी, ताकि छात्र जो बीती कक्षाओं में न समझ पाए हों, उसे इन कक्षाओं में समझ लें और फिर आगे बढ़ें।


कुलपति बताते हैं कि इस पाठ्यक्रम में प्रैक्टिकल ग्रुप में आयोजित किए जाएंगे, जिसका सबसे बड़ा फायदा होगा कि छात्र मिल-जुल कर गलती करने के बजाय सबक लेकर आगे बढ़ेंगे। चार साल के इस पाठ्यक्रम के लिए डीयू को 40 हजार रुपये का भुगतान करना होगा जबकि देश में चल रहे इंजीनियरिंग संस्थानों में एक ही साल की फीस इस राशि से ज्यादा बैठती है। 
इस पाठ्यक्रम के आठ सेमेस्टर में प्रत्येक सेमेस्टर की फीस केवल 5 हजार रुपये रखी गई है। जबकि गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में 4 साल के बी.टेक पाठ्यक्रम की फीस करीब 1.8 लाख रुपये और दिल्ली प्रौद्योगिकी विवि में यह 1 लाख 92 हजार रुपये है।

पहले साल सिर्फ डीयू के छात्रों को मौका

विश्वविद्यालय की ओर से शुरू किए जा रहे इस पाठ्यक्रम में दाखिला प्रवेश परीक्षा के जरिये होगा। दाखिला प्रक्रिया आगामी 15 सितंबर से शुरू की जाएगी। यहां खास बात यह है कि शुरू में इस कोर्स में दाखिला केवल डीयू के प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों को मिलेगा। 

एकेडमिक व एग्जीक्यूटिव के सदस्यों के भारी विरोध के बाद शनिवार को विश्वविद्यालय ने बीटेक कोर्स इन मैथमेटिक्स एंड आईटी को पास कर दिया। एकेडमिक काउंसिल की बैठक में 26 सदस्यों ने कोर्स को जल्दबाजी से लागू किए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और अपना विरोध जताया। इसी प्रकार एग्जीक्यूटिव परिषद की बैठक में भी दो सदस्यों ने विरोध जताया।

सभी स्ट्रीम के छात्र कर सकते हैं आवेदन

डीयू द्वारा शुरू किये जा रहे बीटेक/बीएस इनोवेशन इन मैथमेटिक्स एंड आईटी कोर्स में कुल 40 सीटें रखी गई हैं। डीयू अधिकारियों के अनुसार कोर्स में दाखिला लेने के लिए विद्यार्थियों का 12वीं में गणित होने के साथ 60 फीसदी अंक जरूरी हैं। इस कोर्स में दाखिला कला, कॉमर्स या विज्ञान का विद्यार्थी ले सकेगा। 

डीयू द्वारा सभी कॉलेजों के प्राचार्यो को इस संबंध में जल्द ही पत्र लिखा जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार इस कोर्स में पहले दो साल में गणित, फिजिक्स, बायोलॉजी, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, कम्प्यूटर्स, क्रिएटिव राइटिंग, कम्यूनिकेशन स्किल्स पढ़ाए जाएंगे। बाकी के दो साल तीन क्षेत्रों में बंट जाएंगे। कलस्टर इनोवेशन सेंटर के माध्यम से यह पाठ्यक्रम इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ लांग लर्निग के माध्यम से चलाया जाएगा(दैनिक भास्कर,दिल्ली,5.9.11)।

मॉडल टाउन का MMH कॉलेज : PG जिऑलजी की लिस्ट जारी

Posted: 05 Sep 2011 05:19 AM PDT

एमएमएच कॉलेज में एमएससी जिऑलजी की पहली कट ऑफ लिस्ट बुधवार को जारी कर दी गई। कॉलेज के प्रिंसिपल का कहना है कि करीब-करीब हर सब्जेक्ट की कट ऑफ लिस्ट जारी कर दी गई है। स्टूडेंट्स सभी औपचारिकता पूरी करके एडमिशन ले सकते हैं।

एमएमएच कॉलेज में अब एडमिशन लेने की गति तेज होती जा रही है। कॉलेज के पिंसिपल डॉ. के.एन. अरोड़ा ने बताया कि एमएससी कोर्स के सभी सब्जेक्ट की कट ऑफ लिस्ट जारी कर दी गई है। अभी तक केवल एक ही सब्जेक्ट जिऑलजी रह रहा था उसकी भी मेरिट लिस्ट बुधवार को घोषित कर दी गई। जिऑलजी में जनरल कैटिगरी के लिए कट ऑफ 68.8 पर्सेंट रही है। ओबीसी कैटिगरी में 63.7 प्रतिशत और एससी/एसटी कैटिगरी में 60.33 प्रतिशत है।

उन्होंने बताया कि इस लिस्ट के निकलने के बाद स्टूडेंट्स को चाहिए कि वह जल्द से जल्द बैंक ड्रॉफ्ट बनवाकर एडमिशन करा लें, क्योंकि बीए, बीएससी, बीकॉम व एमए के एडमिशन 6 अगस्त तक ही होंगे। इसके बाद सीटें बचने पर ही सेकंड लिस्ट निकाली जाएगी। एमएससी में फिजिक्स, बॉटनी, ज्योलॉजी और केमिस्ट्री के एडमिशन 8 व 9 अगस्त को ही किए जाएंगे, लिहाजा स्टूडेंट्स इससे पहले तक सभी डॉक्युमेंट्स को कंप्लीट करके रखें। उन्होंने बताया कि कोशिश रहेगी कि र्फस्ट लिस्ट के तहत एडमिशन के बाद ही क्लासेज को शुरू कर दिया जाए(नभाटा, दिल्ली,4.9.11)।

ग्रेटर नोएडा :सभी सरकारी कॉलेजों में सीटें हुई फुल

Posted: 05 Sep 2011 05:18 AM PDT

स्टूडेंट्स की संख्या को देखते हुए सभी सरकारी कॉलेजों में सीटें कम पड़ रही है। इससे कई स्टूडेंट्स के सामने मोटी फीस देकर निजी कॉलेजों में एडमिशन लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। वहीं, सीटें बढ़ाने की मांग को लेकर छात्र संघ ने आंदोलन करने के चेतावनी दी है। कॉलेजों के प्रिंसिपल भी सीसीएस यूनिवसिर्टी के वीसी से लगातार सीटें बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। कॉलेज मैनेजमेंट और स्टूडेंट्स का मानना है कि अगर ईवनिंग क्लास शुरू कर दी जाएं तो दिक्कतें खत्म हो सकती हैं।

दादरी के मिहिर भोज पीजी कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. भरत सिंह यादव ने बताया कि हर साल स्टूडेंट्स सीटें बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन करते हैं। इससे सेशन लेट होता है। यूनिवर्सिटी को ऐसा विकल्प तैयार करना चाहिए, जिससे स्टूडेंट्स को एडमिशन में दिक्कत न हो। अगर सरकार ईवनिंग क्लासों को बहाल कर दे तो कोई दिक्कत नहीं होगी।


इस बार कट ऑफ लिस्ट में फर्स्ट डिविजन वाले स्टूडेंट्स को ही मौका मिला है। इस वजह से हजारों स्टूडेंट्स के सामने एडमिशन को लेकर दिक्कतें खड़ी हो गई हैं। 2006 के बाद सरकार की तरफ से कोई फैकल्टी भी कॉलेजों को नही दी गई है, जिसके चलते अतिरिक्त सेक्शन भी नहीं लगाया जा सकता। अगर सरकार ईवनिंग क्लासों से रोक हटा देती है तो स्टूडेंट्स की परेशानी खत्म हो जाएगी और उन्हें आसानी से एडमिशन मिल जाएगा। 
छात्र संघ नेता सुमित बैसोया ने बताया कि पहली कटऑफ ने स्टूडेंट्स का मूड ऑफ कर दिया है। कॉलेज में सीटंे बढ़वाने की मांग को लेकर आंदोलन किया जाएगा। ईवनिंग क्लास को बहाल कराने की मांग भी की जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि निजी कॉलेजों को बढ़ावा देने के लिए ईवनिंग क्लासेज खत्म कर दी गई हैं। 

यह है मामला 

गौरतलब है कि यूपी में 1998 से ईवनिंग कलास को खत्म कर दिया गया है। इसकी जगह कॉलेजों में अतिरिक्त सेक्शन बढ़ाने की व्यवस्था की गई थी। एसपी सरकार के सत्ता में आने पर ईवनिंग क्लास को बहाल कर दिया गया था। इससे कम पसेर्टेंज वाले स्टूडेंट्स को राहत मिली, सभी को आसानी से एडमिशन मिल जाता था। 

फैकल्टी और सुविधाओं की कमी को देखते हुए 2006 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अतिरिक्त सेक्शन बढ़ाने पर रोक लगा दी थी। उधर 2007 में बीएसपी की सरकार ने सत्ता में आते ही ईवनिंग क्लास पर रोक लगा दी। इससे दिक्कत खड़ी हो गई। इसके स्थान पर सरकार ने 25 पर्सेंट सीट बढ़ाने की व्यवस्था की थी(नभाटा,नॉएडा,5.9.11)।

नॉएडा सेक्टर-39 का पीजी कॉलेज कोचिंग सेंटर:है सुविधाओं की कमी

Posted: 05 Sep 2011 05:16 AM PDT

सिविल सर्विस की तैयारी के लिए सेक्टर-39 स्थित पीजी कॉलेज में कोचिंग सेंटर की शुरुआत की गई है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में स्टूडेंट्स को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। किताबें और कंप्यूटर सहित अन्य सुविधाओं की कमी होने की वजह से छात्र तैयारी तो कर रहे हैं, लेकिन कॉम्पिटिशन की टफ फाइट के लिए खुद को रेडी नहीं कर पा रहे हैं। इससे स्टूडेंट्स का समय खराब हो रहा है। इस बारे में स्टूडेंट से बातचीत के अंश पेश कर रही है प्रवेश सिंह :

नहीं मिली किताबें

कोचिंग सेंटर का फायदा तो तब मिलेगा जब उन्हें किताबें उपलब्ध हों। किताबें ही नहीं होंगी तो तैयारी कैसे करेंगे। हालांकि यहां पढ़ाने वाली फैकल्टी काफी अच्छी है। वे अपने नोट्स के आधार पर पढ़ा रहे हैं, लेकिन बिना किताबों के छात्र कब तक पढ़ाई करेंगे। - अंकित

इंटरनेट कनेक्शन नहीं

सेंटर में कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन का होना बहुत जरूरी है। इंटरनेट के जरिए किसी भी कन्फ्यूजन को तुरंत दूर किया जा सकता है। इसके अलावा दूसरे किसी भी टॉपिक पर लेटेस्ट जानकारी ली जा सकती है। क्लास रूम में कंप्यूटर तो है, लेकिन इंटरनेट नहीं है। - रोहित


फैकल्टी की कमी 

यहां पर फैकल्टी की अभी भी कमी बनी हुई है। कम से कम दो फैकल्टी और बढ़ने चाहिएं। अभी कोचिंग शुरू तो हो गई है, जिसका छात्र फायदा भी ले रहे हैं। अगर कुछ कमियां और अव्यवस्थाएं दूर हो जाएं तो छात्रों की सारी परेशानियां ही खत्म हो जाएंगी। - विपिन नागर 

पावर बैकअप नहीं 

क्लास रूम में पावर बैकअप की सुविधा नहीं है। पढ़ाई के दौरान लाइट चली जाती है तो क्लास रूम में बैठना मुश्किल हो जाता है। न तो पढ़ाई हो पाती है और उस पर से गर्मी के कारण हालत खराब हो जाती है। इसके अलावा कोचिंग सेंटर में पीने के पानी की भी व्यवस्था नहीं है। - नितिन 
(नभाटा,नॉएडा,5.9.11)

दिल्ली और आईपी यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स के सर्टिफिकेट की हो रही जांच

Posted: 05 Sep 2011 05:12 AM PDT

दिल्ली और आईपी यूनिवर्सिटी में फर्जी सर्टिफिकेट्स के जरिए एडमिशन लेने का मामला प्रकाश में आने के बाद ग्रेटर नोएडा एरिया के कॉलेज भी सावधानी बरत रहे हैं। कॉलेज मैनेजमेंट बारीकी से सर्टिफिकेट्स की जांच कर रहे हैं। कॉलेजों का कहना है कि इस तरह का अगर कोई मामला सामने आता है तो आरोपी स्टूडेंट का एडमिशन कैंसल कर उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।


इन दिनों कॉलेजों में एडमिशन को लेकर मारामारी मची हुई है। कॉलेजों में सीटों से अधिक फॉर्म जमा हुए है। दादरी के कॉलेजों में यहीं हाल है। यूपी बोर्ड का इस बार अच्छा रिजल्ट आने के बाद एडमिशन काफी टफ हो गया है। इंटरमीडिएट में इस बार जिले से 3 हजार से अधिक स्टूडेंट्स ने फर्स्ट डिविजन हासिल की है।
 
दादरी के मिहिर भोज पीजी कॉलेज में दिल्ली के साथ एनसीआर के स्टूडेंट्स ने भी फॉर्म जमा किए हैं। प्रिंसिपल डॉ. भरत सिंह यादव ने बताया कि फर्जी सर्टिफिकेट के मामलों को देखते हुए एहतियात बरती जा रही है। सभी स्टूडेंट्स के ओरिजनल सर्टिफिकेट्स की जांच की जा रही है। अगर कोई मामला प्रकाश में आता है तो स्टूडेंट्स का एडमिशन कैंसल कर उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी(नभाटा दिल्ली,5.9.11)।

छत्तीसगढ़:1500 पद खाली और भर्ती 250 पर

Posted: 05 Sep 2011 04:46 AM PDT

प्रदेश के कालेजों में सहायक प्राध्यापक के करीब 1500 पद खाली हैं। उच्च शिक्षा विभाग ने सिर्फ 250 पदों पर संविदा भर्ती का निर्णय लिया है। संविदा प्राध्यापक की भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। बेरोजगारों से 20 सितंबर तक आवेदन मंगाए गए हैं।

इसमें उन संविदा प्राध्यापकों को कोई छूट नहीं दी जा रही है, जो 6 वर्षो तक अपनी सेवाएं दे चुके हैं। सरकारी कालेजों में पिछले 6 सालों से पढ़ा रहे संविदा सहायक प्राध्यापकों की सेवा 31 मई 2011 को समाप्त हो गई है।

इन प्राध्यापकों को उम्मीद थी कि उनकी सेवा अवधि फिर से बढ़ा दी जाएगी, लेकिन इन्हें बहाल करने के बजाय उच्च शिक्षा विभाग ने रिक्त पदों पर नई भर्ती के लिए आवेदन मंगाए हैं।

यूं तो कालेजों में 1500 पद रिक्त हैं, लेकिन भर्ती सिर्फ 253 पदों पर की जा रही है। इसके पहले वर्ष 2010 में 165 सरकारी कालेजों में खाली सभी 1500 पदों पर संविदा सहायक प्राध्यापकों की भर्ती की गई थी।


वर्ष 2011 में सिर्फ 253 पदों के लिए भर्ती करने के पीछे विभाग ने यूजीसी के नियमों का हवाला दिया। यूजीसी के नियमानुसार पिछली भर्तियों में से 90 प्रतिशत पदों को स्थाई करने के बाद ही 10 प्रतिशत संविदा भर्ती करने का प्रावधान है। सभी नए कालेजों में अधिकांश पद खाली हैं। 

सत्र शुरू होने के बाद दो माह ऐसे ही गुजर चुके हैं और भर्ती होने तक तय है कि पढ़ाई करीब तीन माह पिछड़ चुकी होगी। ऐसे में इस भर्ती से कितने छात्रों का भला होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षो में स्थापित किए गए 56 कालेजों में 90 फीसदी तक पद रिक्त हैं।

बगैर विज्ञापन के हो गईं नियुक्तियां

रिसर्च स्कॉलर एसोसिएशन के अध्यक्ष डा. मनीष साव व महासचिव डा. मानस दुबे ने कहा कि उच्च शिक्षा विभाग लगातार यूजीसी के नियमों की अनदेखी कर रहा है। बिलासपुर, जांजगीर, चांपा, कोरबा, रायपुर, महासमुंद, सराईपाली, जगदलपुर, बालोद, कवर्धा, बेमेतरा व बैकुंठपुर के कालेजों में बगैर विज्ञापन जारी किए ही अयोग्य लोगों की नियुक्ति कर दी गई है। इन भर्तियों की जांच कराई जानी चाहिए( दैनिक भास्कर,बिलासपुर,5.9.11)।

महाराष्ट्र :शुल्क नियंत्रण कानून पर बहस नहीं, अमल चाहते हैं पालक

Posted: 05 Sep 2011 04:41 AM PDT

महाराष्ट्र राज्य शैक्षणिक शुल्क नियंत्रण विधेयक 2011 ऐक्ट की प्रक्रिया पर बिना देरी किए पालक संगठन इस पर जल्द से जल्द अमल चाहते हैं। इस ऐक्ट पर मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है। जहां कई स्कूलों के पालक संगठनों ने इसे मैनेजमेंट के पक्ष में बताया है, वहीं कई अन्य पालक संगठन इस कानून को जल्द से जल्द लागू करने के पक्ष में हैं। पालक संगठनों की इस मिली जुली प्रतिक्रिया पर ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ पीटीए के सचिव अनुज कुमार पांडेय ने कहा कि आजादी मिलने के बाद राज्य में पहली बार ऐसा कानून लाया गया है। यह वक्त की जरूरत है कि इसे जल्द से जल्द लागू किया जाए। सुझावों, शिकायतों के अनुरूप बाद में इसमें आवश्यक संशोधन किया जा सकता है। 

कानून के ठंडे बस्ते में जाने की आशंका 
पांडेय को आशंका है कि यदि इसे विवादों में घसीटा गया तो यह फिर से ठंडे बस्ते में जा सकता है। इस ऐक्ट के माध्यम से सरकार ने नर्सरी से लेकर कनिष्ठ महाविद्यालय तक के सभी गैर-अनुदानित स्कूलों में फीस के निर्धारण का अधिकार पालक संगठनों को दिया है। इसमें ऐक्ट के अनुभाग 4 में पालक-शिक्षक संगठन के गठन का निर्देश दिया गया है, जबकि अनुभाग 6 के तहत गैर-अनुदानित स्कूलों के मैनेजमेंट को बन चुकी पालक-शिक्षक कार्यकारी समिति के सामने फीस निर्धारण कर सभी दस्तावेजों के साथ अनुमोदन हेतु भेजना होगा। इस अनुमोदन को समिति को 30 दिनों के अंदर मंजूर या नामंजूर करके वापस करना होगा। इस ऐक्ट में फीस निर्धारण के समय अनुभाग 9 के सभी सभी मुद्दों पर अमल करना अनिवार्य कर दिया गया है। इस ऐक्ट में कंप्यूटर शिक्षा, ट्रांसपोर्ट आदि सुविधाओं के लिए किसी भी फीस का निर्धारण नहीं किया है। 

पालक-शिक्षक संगठन का चुनाव 
स्कूल के सभी वर्गों/ कक्षाओं से लाटरी के माध्यम से इच्छित पालकों का चुनाव होगा। सभी पालक इसके सदस्य होंगे। कार्यकारिणी एक शैक्षणिक वर्ष के लिए होगी। इसमें प्रिंसिपल अध्यक्ष, कोई एक पालक उपाध्यक्ष, कोई एक शिक्षक सचिव, पालक की तरफ से दो सहायक सचिव तथा सभी कक्षाओं से एक शिक्षक व एक पालक सदस्य होंगे। इन सभी सदस्यों में से एक एससी या एसटी या ओबीसी वर्ग से होगा। सदस्यों में आधी संख्या महिलाओं की होगी। इस समिति के गठन के 15 दिनों के अंदर इसकी जानकारी शिक्षा अधिकारी को देते हुए उस स्कूल परिसर में भी लगानी होगी। इसके अलावा कार्यकारी समिति में सदस्य बनने के बाद तीन साल तक किसी भी पद नियुक्ति नहीं होगी। सभी सदस्य को तीन महीने में कम से कम एक बार मीटिंग में हिस्सा लेना अनिवार्य है। हर वर्ष 15 अगस्त से पहले पीटीए की जनरल सभा लेना अनिवार्य होगा। 

ऐक्ट के उल्लंघन पर होगी सजा 
इस ऐक्ट के अनुभाग 16 के अनुसार यदि कोई भी स्कूल निर्धारित फीस से ज्यादा वसूलता है तो पहली बार के उल्लंघन पर एक से 5 लाख तक का दंड लग सकता है। दूसरी बार नियम तोड़ने पर दो से 10 लाख रुपये का दंड या तीन से छह महीने की कैद हो सकती है साथ ही अधिक वसूले गए शुल्क को वापस करना होगा। इससे अधिक बार नियम तोड़ने पर उस व्यक्ति को मैनेजमेंट से ही निकाल दिया जाएगा(नभाटा,आनंद कुमार पांडेय,नवी मुंबई,3.9.11) ।

बिहार:नियोजित शिक्षकों को मिलेगा पेंशन,ड्राप आउट दर शून्य करने का संकल्प

Posted: 05 Sep 2011 04:38 AM PDT

पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्मदिन पर सोमवार को आयोजित शिक्षक दिवस कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया। अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने कहा कि जबतक राज्य का एक भी बच्चा स्कूल से बाहर रहेगा, वह चैन से नहीं बैठेंगे।

उन्होंने नियोजित शिक्षकों की पेंशन योजना इस साल से लागू करने की घोषणा की। इस मौके पर नीतीश कुमार ने राज्य के चुने हुए तेरह शिक्षकों और तीन जिला शिक्षा पदाधिकारियों को सम्मानित किया। इस मौके पर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, शिक्षा मंत्री पीके शाही, खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री श्याम रजक, यूनिसेफ के यामिन मजूमदार सहित शिक्षा विभाग के आला अधिकारी मौजूद थे।

छीजन दर करेंगे शून्य

शिक्षक दिवस के मौके पर नीतीश कुमार ने छीजन (ड्राप आउट)दर शून्य करने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि यह तभी संभव है, जब शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा।

समझें-सीखें कार्यक्रम स्कूलों में लागू

कार्यक्रम में नीतीश ने स्कूली शिक्षा गुणवत्ता कार्यक्रम समझें-सीखें की शुरुआत करते हुए इसको सफल बनाने के लिए सबसे अपील की। उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर दे रही है। समझें-सीखें कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार किया जाएगा।

नियोजित शिक्षकों को मिलेगा पेंशन

सीएम ने नियोजित शिक्षकों से माइक्रो पेंशन योजना इस साल से लागू करने का वादा किया। उन्होंने कहा कि सरकार नियोजित शिक्षकों के भविष्य को लेकर चिंतित है। पेंशन योजना यूटीआई के साथ मिलकर संचालित होगी। जिसमें सरकार भी अंशदान करेगी। 

कई किताबों का विमोचन

इस मौके पर नीतीश कुमार ने कई किताबों, मार्गदर्शिका और ग्रामीण महिलाओं द्वारा निकाले जाने वाले अखबार 'खबर लहरिया' का विमोचन किया। बताते चलें कि खबर लहरिया देश का एकमात्र बज्जिका भाषा का अखबार है। जो एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा बिहार के सीतामढ़ी, उत्तर प्रदेश के चित्रकूट और बांदा जिला से एकसाथ प्रकाशित हो रहा है।

स्कूलों में लगेगा गुणवत्ता वृक्ष

सीएम ने पर्यावरण संरक्षण में बच्चों से सहयोग मांगा है। इस मौके पर उन्होंने 'समझें-सीखें रथ' प्रचार के लिए सभी जिलों में रवाना किया। जिसमें मुख्यमंत्री द्वारा स्वसिंचित जामुन, नीम एवं गोलडियाना पेड़ों को रखा गया है। इन पेड़ों का नाम गुणवत्ता वृक्ष रखा गया है जो स्कूल में लगाया जाएगा(दैनिक भास्कर,पटना,5.9.11)।

छत्तीसगढ़:सीसीआईएम ने निजी कॉलेजों को नहीं दी अनुमति

Posted: 05 Sep 2011 04:31 AM PDT

संसाधनों और उपकरणों की कमी की वजह से आयुष ने राज्य में संचालित निजी कॉलेजों को इस बार मान्यता नहीं दी है। एकमात्र शासकीय कॉलेज की अनुमति भी अटकी हुई है।

इससे बीएएमएस में प्रवेश का मामला अटका हुआ है। यदि शासकीय कॉलेज को भी अनुमति मिलती है तो प्रवेश के लिए काफी मारामारी रहेगी।

केंद्रीय चिकित्सा परिषद के सदस्यों ने अप्रैल-मई में यहां के दोनों निजी और एक शासकीय कॉलेज का निरीक्षण किया। टीम के सदस्यों ने 2006 से राजनांदगांव में संचालित छत्तीसगढ़ आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज की मान्यता देने की अनुशंसा आयुष विभाग से की ही नहीं। वहीं 2002 से संचालित राजीव लोचन आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में स्नातक की 50 सीटों की अनुशंसा की।


इसे आयुष ने मान्यता नहीं दी। इसकी जानकारी भी अपनी वेबसाइट डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट सीसीआईएम इंडिया डॉट ओआरजी में जारी की है। निरीक्षण के बाद सीसीआईएम ने शासकीय आयुर्वेदिक कॉलेज में स्नातक स्तर की 55 सीटों की अनुशंसा की है। आयुष में अभी का मामला अटका हुआ है। इस संबंध में पिछले दिनों आयुष ने आयुर्वेद कॉलेज प्रशासन से छात्रों की संख्या, मरीजों की संख्या, बाह्य रोगी और अंत: रोगियों की संख्या, उन्हें दी गई दवाएं और उपचार के दिनों की जानकारी मांगी थी। प्राचार्य डॉ. डीके तिवारी यह सभी जानकारी देने के लिए जुलाई के आखिरी सप्ताह में दिल्ली गए थे। 

जानकारों का कहना है कि निजी कालेजों को मान्यता नहीं देने से सौ सीटें तो पहले ही कट गईं। अब सिर्फ शासकीय कॉलेज ही रह गया है। ऐसे में बीएएमएस के लिए सिर्फ 55 सीटें ही रह जाएंगी। किसी कारणवश यदि शासकीय कॉलेज को भी अनुमति नहीं मिली तो इस साल आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान में किसी को भी प्रवेश नहीं मिल पाएगा। एक बार फिर जीरो इयर की स्थिति बनेगी(दैनिक भास्कर,रायपुर ,5.9.11)।
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Palash Biswas
Pl Read:
http://nandigramunited-banga.blogspot.com/

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