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Tuesday, August 5, 2014

आईटी में खुदकशी

आईटी में खुदकशी

पलाश विश्वास


फोटोः एबीपी आनंद बांग्ला से साभार


आज कम से कम इस वक्त लिखने का मन मिजाज नहीं है।मौसम इधर रिस रहा है लगातार।मानसून नहीं है और न मूसलाधार लेकिन आसमान रुक रुककर रिस रहा है।अभी धूप तो अभी बरसात।


अबकी दफा सावन में बंगाल में शिवभक्तों की तादाद में भारी इजाफा हुआ है।दक्षिणेश्वर विद्यासागर सेतु आखिरी सोमवार को,उससे पहले और बाद में कांवड़ियों के कब्जे में हैं।


शिवभक्तों की यह सारी जमात डायरेक्ट शिव के मत्थ जलाभिषेक कर रही हो,ऐसा भी नहीं।लोकनाथ बाबा से लेकर तारकेश्वर बाबा का प्रबल प्रताप भंग गांजा और अन्यतेर द्रव्यों के जश्नी उफान के साथ पूरे सबब पर रहा है।


इसी के मध्य तारकेश्वर में बड़ा हादसा तो टल गया।ट्रेन के ओवरहेड तार टूटने से स्पार्किंग से भगदड़ मची लेकिन मरा सिर्फ एक ही है।कुंभ हादसे जैसी बात नहीं है और न सावन में सुरक्षा इंतजाम पर किसी खामी कि कहीं चर्चा हो रही है।


खबर भी लेग स्पिन की तरह देर से ब्रेक हुई।


आज कोलकाता जाना हुआ,जो मैं बेहद कम जाता हूं।उमस में बुरा हाल और इसी के मध्य एक जरूरी बैठक में सेक्टर वाइज जनजागरण के फौरी कार्यक्रम पर घंटों चर्चा करके छह बजे तक लौटे तो स्थानीय खबर की नब्ज पकड़ने के लिए बांग्ला चैनल के दरवज्जे खटखटाये तो अचंभित करने वाली खबर कि बंगाल में आईटी में खुदकशी।


जादवपुर विश्वविद्यालय जो बेसू के साथ  बंगाल में आईटी शिक्षा का प्राचीनतम संस्था होने के साथ ही भारतीय विश्वविद्यालयों में जिनकी अकादमिक साख अब भी बनी हुई है,में अन्यतम है,के एक आईटी छात्र ने बार बार कैंपसिंग में बड़ी नौकरी हासिल करने का लक्ष्य न मिलने पर खुदकशी कर ली।


মঙ্গলবার সকাল থেকে যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের সল্টলেক ক্যাম্পাস সরগরম৷ কাউন্সেলিংয়ের জন্য একাধিক নামজাদা সংস্থার ভিড়৷ ব্যস্ততা৷ কিন্তু, তার মধ্যেই আচমকা ছন্দপতন৷

খোঁজ নেই আইটি ফাইনাল ইয়ারের ছাত্র মণীশ রঞ্জনের৷ ঘণ্টা দুয়েক আগেও এক নামজাদা বহুজাতিক সংস্থার কাউন্সেলিংয়ের প্রথম রাউন্ডে হাজির ছিলেন তিনি৷ তারপর থেকে কেউ তাঁকে দেখেনি৷ কয়েকজন সহপাঠী ছুটে যান হস্টেলে মণীশের ঘরে৷ ঘর তখন ভিতর থেকে বন্ধ৷ বারবার ধাক্কাতেও মেলেনি কোনও সাড়া৷ অবশেষে ভাঙা হয় দরজা৷ ভিতর থেকে উদ্ধার হয় মণীশের ঝুলন্ত দেহ৷

मंगलवार क सुबह जादवपुर कैंपस में कैंपसिंग का हाट लगा था।तमाम बड़ी ब्रांडेड कंपनियां रिक्रूटिंग कर रही थीं।हर कहीं चहल पहल। इससे पहली रात हाईवे संलग्न पूल साइड पार्टी के जश्न में जैसा हुआ,उसी तरह एक आकस्मिक मौत ने रिक्रूटिंग उत्सव और किसी किसो को मिलती लखटकिया रोजगार का मजा किरकिरा कर दिया।


दो घंटे पहले भी एक नामी बहुराष्ठ्रीय संस्था की काउंसिलिंग के पहले राउंड में जो हाजिर रहा ,उसकी गैरहाजिरी पर लोग चौंके और पता लगाने हास्टल में जब उसके कुछेक सहपाठी उसके कमरे तक पहुंचे,तब तक देरी हो चुकी थी।


उसके कमरे का दरवाजा भीतर से बंद था।दरवाजा बार बार धकियाने पर जवाब नहीं आया तो तोड़ डाला दरवाजा।


भीतर सीलिंग से लटक रही थी आईटी फाइनल ईयर के छात्र मनीश रंजन की युबा स्वप्नभंगी लाश।


हालांकि आधिकारिक तौर पर इस आत्महत्या का कारण कैंपसिंग में विफलता होने का कंडन किया जा रहा है लेकिन अधिकारी समूह इसी सफाई बयान के साथ बंगाल और बाकी देश में आईटी में मंदी का मातम भी नत्थी कर रहे हैं।


हमने तो आपको आशा भोंसले जी के  उस साक्षात्कार का भी ब्योरा दिया है कि जिसमें उन्होंने कहा है कि आज के बच्चे कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें कंप्यूटर के अलावा कुछ भी नहीं आता।


बरसों पहले अक्षर पर्व में मेरी कविता ई अभिमन्यु प्रकाशित हुई तो आदरणीय ललित सुरजन के अलावा किसी ने नोटिस नहीं लिया।वह कविता अब भी मेरे अंतःस्थल पर दर्ज है कोई चाहें तो चीरकर निकाल लें।


गौरतलब है कि कैंपसिंग सिर्फ चुनिंदा प्रतिष्ठानों में होती है,आईटी सिखाने वाली दुकानों में सर्वत्र नहीं और इन्हीं दुकानों में हाईस्कूल और इंटर पास करने के बाद अब समूची युवा पीढ़ी कतारबद्ध है।


मां बाप की गाढ़ी कमाई और कारोबारियों की जमा पूंजी और किसानों की जमीन भी  इस हायर फायर के धूमधड़ाके की चकाचौंध में स्वाहा हो रही हैं।


हाल ही में सविता की खास सहेली एक डाक्टरनी आयीं अपने घर और वे बेहद दुःखी कि उनके इकलौते बेटे की कैंपस कैरियर में कोई रुचि नहीं है और उसकी दिलचस्पियां अकादमिक हैं और वह उन जनसरोकारों से दिनरात परेशान रहता है,जिनसे उसके वर्ग का कोई लेना देना नहीं है।


मैंने उन्हें भरसक समझाने की कोशिश की कि ऐसे बच्चे पर हमें तो गर्व होना चाहिए और उसके भविष्य को लेकर आश्वस्त भी होना चाहिए कि वह ज्ञान की खोज में लगा है अब भी।उसका ज्ञान उसे तकनीक की मौत से बचायेगा जरुर।ऐसे बच्चे ही बचेंगे और न सिर्फ बचेंगे बल्कि देश दुनिया को बचायेंगे।


मुझे नहीं मालूम कि मैं उन्हें सांत्वना दो रहा था या खुद को सांत्वना दे रहा था।



अब गौर करे तो पायेेंगे कि 2008 की महामंदी से काफी पहले से इक्कीसवीं की दस्तक शुरु होते न होते हमारे बच्चों ने नई सदी में आईटी के अलावा कहीं रुख किया ही नहीं है।




वैसे ही आईटी सेक्टर पर गहराते संकट के बादल और अकादमिक शिक्षा का सत्यानाश करके पूरी युवा पीढ़ी को तकनीक दक्ष  हायर फायर चौबीसों घंटे के श्रम में तब्दील कर देने की नालोज इकानामी के बूमरैंग होने की चर्चा होने की उम्मीद कम है।


चर्चा हो रही है आउटसर्सिंग की लगातार,चर्चा हो रही है निजता के अधिकार के उल्लंघन के साथ बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिकता निगरानी आधार असंवैधानिक अमानवीय आईटी दुधारु गाय की।


और चर्चा हो रही है


सेज जैसी टैक्स होलीडे कंटीन्यू करने की।


आईटी शिक्षा के विनियंत्रण और विनियमन पर अभी कोई चर्चा नहीं है।


आईटी सेक्टर के गली मोहल्ला लेबल धूमधड़ाके के जरिये रोजगार संकट  के बारे में कोई चर्चा फिलहाल होने की संभावना नहीं है।क्योंकि आत्महत्याओं की खबरें अभी बनी ही नहीं हैं।


इसके बजाय आउटसोर्सिंग बंद होने के बावजूद  कैैंपस रिक्रूटिंग और कामयाब बच्चों की हैरतअंगेज वेतनमान पर सोसाइटी में मां बाप की ऊंची नाक की चर्चा खूब हो रही है।



विदेशी प्रत्यक्ष निवेश,अबाध पूंजी,विनिवेश,विनियमन,विनियंत्रण और पीपीपी गुजराती माडल के मुताबिक औद्योगीकरण के नाम पर जो अंधाधुंध सेज महासेज गलियारा स्मार्ट सिटी बुलेट चतुर्भुज का देहात उखाड़ो शहर बसाओ देश बेचो क्विकर पर अभियान है धर्मोन्मादी और कारपोरेट और इसे हासिल करने के लिए नागरिकता बायोमेट्रिक डिजिटल आधार,उसका मूलाधार तकनीकी क्रांति है और तकनीकी क्रांति का एपीसेंटर आईटी है।


और तकनीकी क्रांति का अंतिम मकसद है श्रम कानूनों का सफाया।


और तकनीकी क्रांति का अंतिम मकसद है श्रम का सफाया।


और तकनीकी क्रांति का अंतिम मकसद है आटोमेशन और आटोमेशन और आटमेशन।


और तकनीकी क्रांति का अंतिम मकसद है छंटनी छंटनी और छंटनी।


इसीसे रोजगार के खात्मे के मद्य,स्वप्नभंगमध्ये मुनाफावसूली बरोबर।


बहरहाल रंगबिरंगे कारपोरेट राज में डालर नत्थी जर्मन मुद्रा नत्थी दूसरे विश्वयुद्द से पहले की मार्कमानक वाली अर्थव्यवस्थाओं की दशा को अभिशप्त भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि उपज या औद्योगिक उत्पादन से न्तथी नहीं, नहीं विकास दर अब तकनीकी क्रांति निर्भर है।


सद्दाम हुसैन की चली नहीं।तेल का कारोबार का माध्यम अब भी डालर है और यूरो की वकालत करने वाला सद्दाम मारा गया।क्योंकि सोवियत तब  गोर्बच्योव का था। न लेनिन का और न स्टालिन का।और इंदिरा का अवसान चुका था।


कोई जरुरी नहीं कि हर बार सद्दाम मारा जायेगा और हर बार तबाह होता रहेगा मध्यपूर्व।यह तेलयुद्द स्वाहा कर सकता है डालर को भी और तेल की आग में झुलस सकती है डालरनत्थी अर्थव्यवस्था भी।


हम तो बार बार झुलसते रहते हैं और एसिडवर्षा तो हमारी पुरुषतांत्रिक सनातन संस्कृति है ही।


न डालर वर्चस्व शाश्वत है। जर्मन ग्रीक,ब्रिटिश,स्पानी,पुर्तगीज.डैनिश,जापानी, फ्रांसीसी,रोमन साम्राज्यों काइतिहास बताता है कि साम्राज्यवाद का अंत होकर रहता हैऔर साम्राज्यवाद से नत्ती अर्थव्यवस्था और उत्पादनप्रणाली की मौत भी अपरिहार्य है।


आईटी अब अमेरिका डालर से नत्थी मुक्तबाजारी उत्पादन प्रणाली है और नागरिकता भी।इस त्रासदी को समझने की दृष्टि हालांकि दाता ने दी नहीं है।करोड़ों हाथ हैं लेकिन आंखें दो चार भी नहीं।


शिक्षित अशिक्षित या अर्धशिक्षित खास फर्क पड़ता नहीं है।

फर्क है दक्ष और अदक्ष का।


अब आटोमेशन और रोबोटिक्स के चमत्रकारी सर्वव्यापी असर के वास्ते फर्क है अति दक्ष और सुपर डुपर दक्ष के बीच।


अति दक्ष के लिए भी रोजगार नहीं है।


जैसा कि जादवपुर परिघटना का तात्पर्य है।


हाय हाय हाहाकार उस अति दक्ष तबके के स्वप्नभंग को लेकर है।

जो अदक्ष है और जो दक्ष भी हैं,उस आम जमात के थोक बेरोजगार स्टेटस का कोई सीवी कहीं बन नहीं रहा है।


श्रम कानूनों  औक टैक्सों के दायरे से बाहर आुटसोर्सिंग निर्भर आईटी को भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाकर हम अपने बच्चों की मौत का सामान ही बनाते रहे हैं,ऐसा मैंने पहले भी लिखा है।हाल ही में लिखा है।


किसानों की थोक आत्महत्याएं,अविराम बंद हो रही औद्योगिक उत्पादन मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों,कुटीरउद्योंगों, चायबागानों और जल जंगल जनजमीन से बेदखल आदिवासी भूगोल में मृत्युजुलूसों की चर्चा अब भी सिलसिलेवार शुरु नहीं हुई है।



सीसैट धूम के मध्य जादवपुर की यह असमय मौत राष्ट्रीयसुर्खी बनेगी,इसके आसार कम हैं।


कल ही फ्रेंडशिप स्विमिंग पूल पार्टी में एक युवती के डूब जाने की खबर दिन भर सुर्कियों में थी जो अब गायब है।


रैव पार्टियों में धरपकड़ की खबरें जितनी तेजी से आती हैं,गायब हो जाती हैं।


राजनीति के अलावा अब इस देश में कोई खबर बनती ही नहीं है।


हम कायदे से यह भी नहीं जानते कि कोयंबटुर,भुवनेश्वर,बेंगलुर,पुणे जैसी तेजी सेउभर रही सिलिकनसिटीज की नींव में मची हलचल के ताजा हाल क्या हैं।


हम अभिभावक भी नहीं जानते कि जिनकी कामयाबी के लिए हम जान जिगर कुर्बान कर रहे हैं,उनके ख्वाबों के हाल हकीकत की क्या दशा दिशा है।


जादवपुर जैसी खुदकशी कहीं और हुई या नहीं,हम नहीं जानते।बाकी देश भी नहीं जनता।


हमें पल पल मरती नदियों,घाटियों,जमीन और जंगल की मौत का अहसास कब होता है।


हमें पल पल पिघलते ग्लेशियरों की खबर कब होती है।


हमें पल पल सूखते समुंदर में फट रहे ज्वालामुखियों की आंच कब महसूस होती है।


हम किरचों में बिखर रहे देश के हरे जख्मों से रिसते खून को कब देख रहे होते हैं।


आप मुझे पढ़ते हों तो याद होगा कि मैंने कुछ समयपहले चर्चा की थी कि अब अगला मृत्यु जुलूस आईटी से निकलेगा।


जादवपुर की अकेली घटना के आधार पर हम फिलहाल कह नहीं सकते कि वह जुलूस निकलने ही लगा है।


लेकिन पत्रकार हूं।सबसे पहले बुरी खबरे देवने की जन्मजात आदत हैं और दशकों से हम अच्छी खबरों के मोहताज हैं।हांलाकि मीडिया के फील गुड और विकास कामसूत्र मय में दिलोदिमाग पर पहले की तरह बुरी से बुरी खबर का कोई असर होता नहीं है।


आपदाएं निरंतर हैं।

विपदाएं अनंत।

दुर्घटनाें पल पल।

गृहयुद्ध हर कहीं।

सुर्खियों में हत्या और बलात्कार मूसलाधार।

घोटालों का पर्दापाश रोज रोज।

विश्वव्यापी रक्तपात रोज रोज।

टैब का अनंतजीबी मैमोरी कैसे हो मानव मस्तिष्क का सवाल यह भी।

मनुष्य अब वायरस जैसे हैं,जिनपर कोई औषधि,प्रतिषेधक या प्रतिरोधक काम नहीं करते।






পছন্দের চাকরি না মেলার জের?যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয় ক্যাম্পাসে 'আত্মঘাতী' আইটির ছাত্র

কৃষ্ণেন্দু অধিকারী,এবিপি আনন্দ

Tuesday, 05 August 2014 05:46 PM

ক্যাম্পাস জুড়ে প্রশ্ন৷

মঙ্গলবার সকাল থেকে যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের সল্টলেক ক্যাম্পাস সরগরম৷ কাউন্সেলিংয়ের জন্য একাধিক নামজাদা সংস্থার ভিড়৷ ব্যস্ততা৷ কিন্তু, তার মধ্যেই আচমকা ছন্দপতন৷

খোঁজ নেই আইটি ফাইনাল ইয়ারের ছাত্র মণীশ রঞ্জনের৷ ঘণ্টা দুয়েক আগেও এক নামজাদা বহুজাতিক সংস্থার কাউন্সেলিংয়ের প্রথম রাউন্ডে হাজির ছিলেন তিনি৷ তারপর থেকে কেউ তাঁকে দেখেনি৷ কয়েকজন সহপাঠী ছুটে যান হস্টেলে মণীশের ঘরে৷ ঘর তখন ভিতর থেকে বন্ধ৷ বারবার ধাক্কাতেও মেলেনি কোনও সাড়া৷ অবশেষে ভাঙা হয় দরজা৷ ভিতর থেকে উদ্ধার হয় মণীশের ঝুলন্ত দেহ৷

কাউন্সেলিংয়ের ব্যস্ততা মুহূর্তে বদলে যায় আতঙ্ক, আশঙ্কায়৷ মণীশকে নিয়ে সহপাঠীরা ছোটেন হাসপাতালে৷ পিছনে বিশ্ববিদ্যালয়ের সহ উপাচার্য, রেজিস্ট্রার ও অন্যান্য কয়েকজন আধিকারিক৷ ততক্ষণে সব শেষ৷ হাসপাতালে মণীশকে মৃত ঘোষণা করেন চিকিত্সকরা৷সহপাঠীরা বলছেন মণীশ কৃতী ছাত্র৷ কিন্তু, ক্যাম্পাসিং দিনে তিনি কেন এমন ঘটনা ঘটালেন, তা নিয়ে ধন্ধে তাঁরা৷

বিশ্ববিদ্যালয় সূত্রে খবর, শুক্রবারও বিশ্ববিদ্যালয়ে ক্যাম্পাসিংয়ে আসে এক বহুজাতিক সংস্থা৷ সেখানেও সুযোগ পাননি মণীশ৷ তথ্যপ্রযুক্তির বিভাগীয় প্রধানের ধারণা, ক্যাম্পাসিংয়ে ভাল চাকরি না পাওয়া হতাশার জেরেই এরকম ঘটনা ঘটেছে৷

এই ঘটনা সামনে আসার পরই বিশ্ববিদ্যালয়ের তরফে পুলিশকে খবর দেওয়া হয়৷

মণীশের বাড়ি বোকারোয়৷ সেখানে আত্মীয়রা অপেক্ষায় ছিলেন, ছেলে হয়তো চাকরির খবর জানিয়ে ফোন করবে৷ কিন্তু, সব স্বপ্নকে চুরমার করে দুপুরে বাড়িতে পৌঁছোয় দুঃসংবাদ৷

যাঁকে ঘিরে স্বপ্ন, চলে গিয়েছে সে-ই৷

রিসর্টে তরুণীর রহস্য মৃত্যুর জেরে পুল সাইড পার্টি বন্ধের সিদ্ধান্ত

Last Updated: Tuesday, August 5, 2014 - 19:59

রিসর্টে তরুণীর রহস্য মৃত্যুর জেরে পুল সাইড পার্টি বন্ধের সিদ্ধান্ত

হাওড়া: ফ্রেন্ডশিপ ডের পার্টিতে তরুণীর রহস্য মৃত্যুর জেরে পুল সাইড পার্টি বন্ধ করার সিদ্ধান্ত নিল হাওড়ার ওই রিসর্ট কর্তৃপক্ষ। অন্যদিকে রিসর্টের বাউন্সারদের জিজ্ঞাবাদ করবে পুলিস। হাওড়ার রিসর্টে জলে ডুবেই মৃত্যু হয়েছে শুভঞ্জিতা বসাকের। ময়না তদন্তের প্রাথমিক রিপোর্টে জানানো হয়েছে একথা।  

কিন্তু ঘটনাটি ঘটার মাত্র ঘণ্টা দেড়েক  আগে রিসর্টে গিয়েছিলেন শুভঞ্জিতা। ফলে এই সময়ে শুধু মদ্যপানই নয় ওই পার্টিতে মাদক সেবনও হয়েছিল বলে মনে করছে পুলিস। কী ভাবে শুভঞ্জিতা পুলে গেলেন, কি ঘটেছিল সে দিনের পার্টিতে? প্রত্যক্ষদর্শীদের জেরা করে বিষয়টি জানতে চেষ্টা করছে পুলিস।

হাওড়ায় পুল পার্টিতে শুভঞ্জিতা বসাকের রহস্যমৃত্যুর তদন্তে ক্লাবের বাউন্সারদের জিজ্ঞাসাবাদের জন্য ডেকে পাঠায় ডোমজুড় থানার পুলিস৷ এই ঘটনায় ক্লাব কর্তা ও পার্টির উদ্যোক্তাদের ভূমিকা নিয়েও প্রশ্ন উঠছে৷

ময়না তদন্তের রিপোর্ট বলছে জলে ডুবেই মৃত্যু শুভঞ্জিতার, মিলল মদ্যপানের প্রমাণ ময়না তদন্তের রিপোর্ট বলছে জলে ডুবেই মৃত্যু শুভঞ্জিতার, মিলল মদ্যপানের প্রমাণ

হাওড়ার রিসর্টে জলে ডুবেই মৃত্যু হয়েছে শুভঞ্জিতা বসাকের। জানানো হল ময়নাতদন্তের প্রাথমিক রিপোর্টে। শুভঞ্জিতার দেহে আঘাতের চিহ্ন নেই। পাকস্থলীতে পাওয়া গেছে প্রচুর মদ। শুভঞ্জিতা মাদক নিয়েছিলেন কিনা, ত


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Aug 05 2014 : The Economic Times (Bangalore)

BIG IMPACT LIKELY ON INDUSTRY - IT Inc Split over Curbs on Tax Breaks for SEZs

VARUN SOOD & NEHA ALAWADHI

BANGALORE | NEW DELHI





Infosys backs CBDT's decision on manpower deployment, Wipro & TCS oppose clarification

A recent `clarification' by income tax authorities is causing heartburn among many software companies establishing units in special economic zones. It has also exposed differences of opinion between the major companies, with Infosys agreeing with the government and others disagreeing on whether or not companies are eligible to claim tax breaks.

Late last month, the Central Board of Direct Taxes came up with its interpretation of what is known as the `8020' rule, leading companies such as Wipro and Tata Consultancy Services to the conclusion that the government is making it "extremely restrictive" for them to claim tax deductions on profits from SEZ units.

"Every single IT company in the last 10 years that has set up an SEZ unit would be impacted," said Dinesh Kanabar, deputy CEO of KPMG in India, adding the financial impact could be "very huge." KPMG said that since there is no publicly available data on the number of employees presently operating out of SEZs, it is difficult to put a number on the impact it will have on a company or the industry.

Under Section 10AA of the income tax law, units relocating to SEZs can claim tax deductions on profit only if 80% of plant and machinery is new.

Software companies under the banner of Nasscom wanted the government to say that in the case of people, moving manpower to the SEZ should not be counted because there is only a limited pool of talent available. But CBDT instead clarified that technical manpower transferred to SEZs cannot exceed 20% of the total in the first year.

IT Cos' Top 3 Tax Worries

1 CBDT's latest circular restricting the transfer of technical manpower to 20% for firms working from SEZ's

2 Transfer pricing, which is the price paid for goods and services supplied by one part of a large company to another, has made firms queasy. Experts said that protracted dis putes have swelled from $200 million in 2002 to over $11 billion by the end of 2012

3 Service tax on cross-border supply of software services.

Tax authorities find ing it difficult on how tax companies based out of SEZ's that are exporting software "Flexibility (of movement) should be allowed. It is normal in the technology sector, and one cannot penalise people. This will lead to a distortion in hiring practices," said a Nasscom spokeswoman.

Kanabar said he expects almost all IT companies to challenge this circular in court.

India is estimated to have exported software worth $85 billion (. `5 lakh crore) in 2013-14.

"All companies would be impacted as they have availed the benefits of operating out of a SEZ," said a Mumbai

based consultant. Moreover, since the circular is silent on the date it comes into effect, there is added confusion.

Rajiv Bansal, the chief financial officer of Infosys, told ET that the CBDT clarification is true to the letter and spirit of the government's intention when it provides tax breaks to companies.

Technical manpower must be counted in the 8020 rule because human resources are the backbone of the software industry.

On the other hand, the finance head of Mindtree is of the view the underlying prin

ciple of setting up SEZs is to encourage employment and the CBDT clarification will only serve to restrict the mobility of software employees.

"It is a huge disappointment," said Rostow Ravanan.

Wipro CFO Suresh Senapaty, ET learns, has written to the finance ministry asking for the circular to be withdrawn. A Wipro spokesman declined to comment for this story.

A KPMG note on July 29 said, "Given the highly technical and competitive nature of software development, some technical persons hav

ing prior experience are required to manage the critical functions of software development in a new unit." Therefore it argued that the movement of technical manpower from an existing unit to a new SEZ unit should not be a constraint in availing the deduction.

Industry executives maintain they are taken by surprise by the circular as an earlier government panel, headed by N Rangachary, had proposed that only 50% of the billable employees in an SEZ unit in its first year should be new employees.


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