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Sunday, April 15, 2012

संस्कृत बनाम जर्मन

संस्कृत बनाम जर्मन


Sunday, 15 April 2012 15:24

तरुण विजय 
जनसत्ता 15 अप्रैल, 2012: शायद विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में मंदिरों और शहरों के ध्वंस, दिल्ली में अठारह बार जनसंहार और तक्षशिला-नालंदा के विराट ग्रंथागार जलाने के बाद गाजी होने के जो खिताब पाए थे, उससे बढ़ कर अपना मुकद्दस फर्ज अदा करने की कोशिश सल्तनते-हिंदुस्तान के भूरे-काले या चितकबरे अंग्रेज कर रहे हैं। दुनिया में हर कोई इस बात पर यकीन करेगा कि अगर इस दुनिया के ओर-छोर में कोई ऐसा देश होगा, जहां संस्कृत को खत्म करने की अंतिम निर्णायक कोशिश नहीं होने दी जाएगी, तो वह देश सिर्फ भारतवर्ष हो सकता है। एक पवित्र, पावन सांस्कृतिक परंपरा, राष्ट्रीयता के इतिहास, हजारों वर्ष पुराने समाज के आरोह-अवरोह, संघर्षों और विजय गाथाओं को अपरिमित परिमाण में अपने अंक में समेटे एकमात्र वह भाषा, जो विज्ञान के आधुनिकतम मानदंडों पर खरी और शब्द संसार के उच्चतम शिखरों को भी उच्चतर बनाने में सक्षम मानी जाती है। इसका परिचय ही मनुष्य को देवत्व की ओर ले चलता है। पूजा-पाठ वाला देवत्व नहीं, बल्कि अपने विचार, कर्म और साधना के धरातल पर जीवंत हो उठने वाला वह मनुष्यत्व, जो देवत्व को भी ईर्ष्या से दग्ध कर दे। वह संस्कृत, जो हर उस हिंदू के जन्म से मृत्यु तक के हर संस्कार और संवाद का अपरिहार्य अंग होती है, चाहे वह आस्थावादी हो या अनास्थावादी; उसका अंत करने का प्रयास वही कर रहे हैं, जिनकी मृत्यु के समय संस्कृत में ही मंत्र पढ़ते हुए मुखाग्नि दी जानी है। 
पहले सीबीएसई के अंतर्गत आने वाले विद्यालयों में त्रिभाषा सूत्र इस प्रकार लादा गया कि संस्कृत हटा कर उसकी जगह अंग्रेजी आ जाए। कारण कोई भी रहे, लेकिन हम सब किसी न किसी स्तर पर संस्कृत पढ़ कर ही बड़े हुए। जिन प्रांतों में हिंदी का विरोध है, जैसे तमिलनाडु या केरल, वहां भी संस्कृत विरोधहीन वातावरण में पढ़ी गई। जहां के पुजारी हिंदी में बात नहीं कर पाते वे धाराप्रवाह संस्कृत में व्याख्यान देते हैं और आसेतु हिमाचल ही संस्कृत संपूर्ण भारतीय समाज को एक सांस्कृतिक धागे से नहीं जोड़ती, बल्कि चीन, जापान, कांबोज से लेकर ईरान और लातिन अमेरिका में पाए जाने वाले प्राचीन अभिलेखों में मिले संस्कृत शब्द हमें उन देशों से अनायास जोड़ते हुए वसुधैव कुटुंबकम् का दृश्य आंखों के सामने साक्षात जीवंत कर देते हैं।
उस संस्कृत को आज उन पाठ्यक्रमों और शिक्षा क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों से काट कर अलग किया जा रहा है, जहां वर्षों से उसकी उपस्थिति का कभी किसी वर्ग ने, किसी बहाने से भी, विरोध नहीं किया था।
सीबीएसई में अंग्रेजी और विदेशी भाषाओं के लिए जब जगह बनाने की आवश्यकता हुई, तो केवल संस्कृत को हटना पड़ा।
अब केंद्रीय विद्यालय संगठनों में निर्देश दिए गए हैं कि संस्कृत के साथ जर्मन, चीनी और फ्रांसीसी भाषा पढ़ने का विकल्प शामिल किया जाए और भले संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए अध्यापक न हों, लेकिन कम संख्या में भी अगर विद्यार्थी जर्मन पढ़ना चाहें तो उनके लिए विशेष व्यवस्था की जाए और छात्रों को जर्मन, चीनी, फ्रांसीसी सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। अभी तक छठी से आठवीं तक प्रत्येक क्षेत्र के केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत अनिवार्य थी। नवीं में विकल्प दिया जाता था कि संस्कृत या कोई और विषय ले लिया जाए। 
अब संस्कृत छठी से आठवीं तक जर्मन, चीनी और फ्रांसीसी के समकक्ष रख दी गई है, जिसका एक ही अर्थ निकलता है कि सरकार संस्कृत को विदेशी भाषाओं के समान रख कर खुले तौर पर निर्देश देते हुए छात्रों और अध्यापकों को विदेशी भाषा सीखने की ओर बढ़ाना चाहती है। केंद्रीय विद्यालय के आयुक्त या उन आयुक्त को निर्देश देने वाले नेता और सत्ता पक्ष के नियंत्रक निश्चित रूप से उन लोगों में से आते हैं, जो समाज में तथाकथित उच्च जाति के, और जहां तक नाम और उनके प्रमाण-पत्रों का प्रश्न है, हिंदू कहे जाते हैं। 

इनसे बढ़ कर संस्कृत की हत्या करने वाला और कौन होगा, जो निर्लज्जता से न केवल संस्कृत के विश्वविद्यालयों को उपेक्षित करता, बल्कि संस्कृत में रोजगार के अत्यंत कम अवसर होने के बावजूद परंपरा से संस्कृत पढ़ने और पढ़ाने वालों को निरादृत करते हुए अब संस्कृत को विद्यालयीन शिक्षा क्षेत्र से भी निकाल बाहर कर रहा है।
ये धन्य हैं।
शायद ही किसी को इस बात से आपत्ति हो कि जर्मन भाषा या चीनी और फ्रांसीसी पढ़ी जाए। जरूर पढ़ें। मैं खुद चीनी भाषा पढ़ने की जरूरत पर लिखता आया हूं। लेकिन क्या वह संस्कृत की कीमत पर होना चाहिए? क्या अपनी मातृभूमि और विदेशी भूमि को हम एक जैसा मान सकते हैं? अगर धन, वैभव और अंतरराष्ट्रीय सुविधाओं और सम्मान के लिए विदेशी भाषाएं अपने देश की सांस्कृतिक धरोहर और स्वदेशी सम्मान से ज्यादा बड़ी मान ली गई हैं, तो फिर अंग्रेजों के खिलाफ भी लड़ने की क्या जरूरत थी? 
वैसे भी भारत में गोमाता की पूजा के जितने भी ढकोसले चलते हों, सर्वाधिक गो-हत्या कर गो-मांस का व्यापार करने वालों में तथाकथित उच्च जाति के हिंदुओं का ही नाम बड़े पैमाने पर आता है। वे भी धन्य हैं।
केवल संस्कृत नहीं, हिंदी भी अखबारों के कुछ ज्यादा ही पढ़े-लिखे, मालिक-संपादक अपने समाचारों और स्तंभों में अंग्रेजी के अस्वीकार्य और जुगुप्साजनक प्रयोग से क्षत-विक्षत कर रहे हैं। सरकार भी अपने संस्थानों में हिंदी खत्म करने पर तुली है। पिछले दिनों मैंने यह विषय राज्यसभा में उठाया, तो कोई सन्नाटा   भंग नहीं हुआ। हिंदी के बिना सब कुछ चलता है और हिंदी में वोट लेने की मजबूरी थोड़ी-बहुत निभा लेने के बाद हिंदी को बिना किसी सरकारी हानि की आशंका से आराम से लतियाया जा सकता है। संसद सांस्कृतिक हानि के प्रति चिंतित होगी, यह देखना बाकी है। 
बैंकों में कितने गजनवीपन से सरकार हिंदी के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कर रही है, इसका विवरण तनिक देखिए। 
विभिन्न सरकारी बैंकों में राजभाषा अधिकारी पद की जितनी रिक्तियां होती हैं, उन्हें भरा नहीं जा रहा है और प्रार्थियों की योग्यताओं में से संस्कृत हटा कर अंग्रेजी जोड़ी जा रही है। 2009 में यूको बैंक में अठारह राजभाषा अधिकारी नियुक्त किए जाने की विज्ञप्ति निकली थी, लेकिन अंतिम रूप से केवल आठ का चयन किया गया और वह भी अंग्रेजी की जानकारी अनिवार्य करने के बाद। 2009 के बाद यूको बैंक में किसी राजभाषा अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई, ऐसी जानकारी है। 
इंडियन बैंक में 2009 में तेरह राजभाषा अधिकारियों की नियुक्ति की विज्ञप्ति निकाली गई थी, लेकिन केवल एक पद पर नियुक्ति की गई और बारह पदों पर क्यों नियुक्ति नहीं की गई, इसका भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। पंजाब ऐंड सिंध बैंक में 2010 की विज्ञप्ति के अनुसार राजभाषा अधिकारी के दस पद रिक्त थे, लेकिन एक भी नियुक्ति नहीं की गई। आंध्र बैंक में 2011 की विज्ञप्ति के अनुसार दस राजभाषा अधिकारी के पद रिक्त थे, पर एक भी नियुक्ति नहीं की गई। पंजाब नेशनल बैंक में 2011 की विज्ञप्ति के अनुसार इक्यावन पद रिक्त थे, लेकिन केवल एक नियुक्ति का समाचार है। हिंदी और संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री होने के बावजूद बैंक कहते हैं कि अंग्रेजी की डिग्री लाओ तब आपको हिंदी अधिकारी के नाते नियुक्ति मिलेगी।
इस परिस्थिति में रोने की भी जगह नहीं बचती।

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