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Monday, April 16, 2012

नई दासता की कड़ियां

नई दासता की कड़ियां

Monday, 16 April 2012 10:36

नरेश गोस्वामी 
जनसत्ता 16 अप्रैल, 2012: हमें हर दिन कारों, मोबाइल फोन, दुपहिया वाहनों, खाने के व्यंजन, कपड़ों और सजावट के इतने उत्पादों की सूचनाएं मिलती रहती हैं गोया हम बाजार में ही रहने लगे हों। इनमें से ज्यादातर चीजें जीवन के लिए जरूरी नहीं होतीं। सच तो यह है कि अगर वे हमारे जीवन में बिल्कुल ही न हों तो जीवन शायद ज्यादा सरल और निरापद हो जाए। पर टीवी, अखबार, सड़कों पर लगे विज्ञापनों के विशालकाय होर्डिंग, और अब इंटरनेट के जरिए वे दिन-रात हमारे चेतना में उतरती रहती हैं। और हमें ललचाती रहती हैं। जो इन चीजों का इस्तेमाल करते पाए जाते हैं उन्हें अद्यतन ज्ञान और तकनीकी से लैस और भद्र माना जाता है। और जो लोग उनका प्रयोग नहीं जानते या उन्हें खरीद नहीं सकते, उन्हें मोटे तौर पर पिछड़ा मानते हुए समय और चर्चा से खारिज कर दिया जाता है।
वस्तुओं के होने या न होने के आधार पर व्यक्ति की हैसियत का निर्धारण समाज में शायद शुरू से रहा है। लेकिन भारत में पिछले पंद्रह-बीस सालों में यह प्रवृत्ति कुछ इस गति से मजबूत हुई है कि उसके आगे हमारी सभ्यता की अंतनिर्हित विषमताएं भी सहनीय लगने लगती हैं।
इन दशकों के दौरान आर्थिक सुधारों के जरिए आने वाली संपन्नता ने सामूहिकता को जिस तरह छिन्न-भिन्न किया है, उसका शायद सबसे गहरा परिणाम यह हुआ है कि आम जनमानस अब अपने तर्इं जीवन की कल्पना नहीं कर सकता। उसे लगता है कि उसके जीवन की डोर अब उसके पास न रह कर एक ऐसी व्यवस्था के हाथ में चली गई है जो उसे अपनी इच्छा के अनुसार हांकती जाती है। स्थिति की उलटबांसी कुछ ऐसी है कि वंचित और संपन्न, दोनों की उपभोग-इच्छाएं एक जैसी हो गई हैं। पहले की पीड़ा यह है कि उसे इच्छित नहीं मिल रहा और और दूसरे का संताप यह है कि अकूत संपत्ति के बावजूद चीजें पकड़ में नहीं आ रही।
यह इस उलटबांसी का ही विस्तार है कि हमारे समाज के सबसे सबल और वाकपटु वर्ग को दूध से लेकर घी तक और स्त्री की देह से लेकर घर तक सब कुछ शुद्ध चाहिए। वह गुरुओं की शरण में जाता है। आंखें बंद कर भजन गाता है। पौराणिक आख्यान सुन कर भावुक होता है। जब वह आज के युग की सतयुग से तुलना करता है तो उसकी आंखें भीग जाती हैं। पर वह चमचमाते मॉल में भी जाता है। उनकी भव्यता उसे लुभाती है। वह व्रत रखता है, तुलसी के पौधे को पानी देता है, पर जब अपना घर खरीदता है तो यह भी ध्यान रखता है कि फर्श की टाइल्स किस कंपनी की है। वह अपने घर को ऐसी अजनबी और बेतुकी चीजों से भरने लगता है और गजब यह कि इन चीजों से उसे संतोष मिलता है। उसे लगता है कि वह समय के साथ है। वह अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों में भेजता है और जब वे अंग्रेजी बोलते हैं तो फूला नहीं समाता। लेकिन यह सब करते और चाहते उसे इस बात की भी चिंता रहती है कि उसकी संतान अपने संस्कारों से न कटे।
कामनाओं का यह लोक, निर्मित वस्तुओं से इस कदर अटता जा रहा है कि जो सहज उपलब्ध है या जिसे स्थानीय और घरेलू स्तर पर बनाया जा सकता है, वह या तो दिखना बंद हो गया है या फिर उसकी जगह हम कुछ अन्य चाहने लगे हैं। जीवन की परिस्थितियों के सामने पहले भी आम आदमी कई बार निरुपाय हो जाता था। अकाल पड़ता था तो घर के घर, गांव के गांव उजड़ जाते थे। मगर आमतौर पर जीवन जीने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती थी उनकी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा आसपास मौजूद रहता था। साथ ही लोगबाग अपने इस जीवन संसार के ढांचे- उपभोग की वस्तुएं कैसे और कहां बनती हैं या कौन-सी चीज कहां अच्छी बनती है, आदि- से परिचित रहते थे। लेकिन अब जिसे विकास और आधुनिकता कहा जाता है वह जनता को गरीबी और अभावों से निजात दिलाने के नाम पर उसे उत्तरोत्तर नियंत्रित करने का तरीका बनती जा रही है। इसे त्रासदी कहें या विडंबना कि जिस चीज के निर्णय और प्रक्रिया में आम आदमी का कोई दखल नहीं था उसे जीवन और सभ्यता के आदर्श के रूप में निर्धारित कर दिया गया।
एक तरह से देखें तो व्यक्ति के जीवन संसार से उसकी स्थानीयता के इस लोप को वृहत के सामने लघुता की एक बलात पराजय ही कहा जाएगा। राजनीतिक अर्थ में यह वैश्विक संदर्भ के समक्ष स्थानीय संदर्भ की  हार है। बाहर से देखने पर यही प्रतीत होता है कि पूरा समाज और उसकी संस्थाएं वृहत के सम्मोहन में डूब चुकी हैं। और वह इतना सार्वभौमिक हो गया है कि लघु की महत्ता या उसकी जरूरत पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता। जाहिरा तौर पर यह बात इसलिए भी सही लगती है क्योंकि ज्ञान के क्षेत्र में तमाम तरह के शोध और दृष्टियों के बावजूद एक सीमा के बाद बुद्धिजीवी और वृहत्तर शिक्षित वर्ग समाज को साक्षात अनुभव या सह-अनुभूति से नहीं बल्कि धारणाओं के माध्यम से देखता है। 
पर यह धारणा एक कयास भर है कि लोग सचमुच लघु और स्थानीय को तिलांजलि दे चुके हैं। मसलन, हाल ही में देश की राष्ट्रपति ने कुछ ऐसे ग्रामीण तकनीशियनों को पुरस्कृत किया था जिन्होंने अपने गांव-कस्बों में रहते हुए ऐसी सरल मशीनों का निर्माण किया है जिनसे खेती-बाड़ी और स्थानीय काम-धंधों को ज्यादा दक्षता और सहूलियत के साथ किया जा सकता है। लेकिन इन खोजों और आविष्कारों का न कहीं विज्ञापन देखा गया न पल-प्रतिपल की खबर देने वाले मीडिया को इसमें कुछ ऐसा खास लगा जिसके बारे में बताया जाए। जबकि यही मीडिया किसी कंपनी के मोबाइल फोन या लैपटॉप की विशेषताओं के बारे   में पाठकों को बताना अपना धर्म समझता है। वह असल में चर्चा-परिचर्चा, बहस और प्रचार उन्हीं मुद्दों और वस्तुओं करता है जिनके पीछे बड़ी पूंजी लगी होती है।

व्यक्ति और समाज की इस नई दासता के लिए अगर किसी एक घटक को जिम्मेदार माना जाए तो ध्यान सबसे पहले सरकार नामक संस्था पर जाता है। वही सरकार जिसके होने का औचित्य ही यही है कि वह अपने नागरिकों के जीवन को गरिमापूर्ण और सुरक्षित बनाए, अब खुद उस वर्ग की हिमायती बन गई है जिसे स्थानीय से कोई सरोकार नहीं रह गया है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि समाज और अर्थव्यवस्था आदि आज जिस जटिल स्थिति में पहुंच गए हैं उसमें स्थानीय और लघु की बात करना बहुत प्रासंगिक और कारगर नहीं हो सकता। लेकिन गौर से देखें तो यह सार्वभौमिक-सा लगता वक्तव्य वास्तव में पूंजीवादी विज्ञान और तकनीक की उस तानाशाही की ओर इशारा करता है जिसमें मनुष्य को निर्माता और उत्पादक के बजाय उपभोक्ता भर बना दिया गया है।
यह एक ऐसी त्रासदी है जिसने मनुष्य से उसकी स्वायत्तता छीन ली है। यों कहा यह जाता है कि विज्ञान और तकनीक ने जीवन को आसान बना दिया है, जबकि इसके पीछे छिपाए गए इस बड़े सच पर बात नहीं की जाती कि मनुष्य को किस तरह एक नकली, असहज और अप्राकृतिक जीवन की ओर धकेला गया है। इस स्थिति का भयावह पक्ष यह भी है कि इस केंद्रिकता को लेकर जिस तरह की सहमति बनाई गई है उसमें बाकी के विचारों, जीवन शैलियों और विमर्शों को कमतर, रूमानी या अतीत-मोह के खाते में डाल दिया जाता है। यह बात सिर्फ दार्शनिक और अकादमिक बहसों में ही नहीं बल्कि भारत के किसी नामालूम गांव और कस्बे में चलने वाली रोजमर्रा की आमफहम बातों में भी महसूस की जा सकती है।
आज से दसेक साल पहले तक सिर्फ शहरों के आसपास के देहात में जमीन के भाव मायने रखते थे। लेकिन अब तथाकथित रूप से पिछड़े इलाकों में भी जमीन की कीमत वहां पहुंच गई है जिसके दाम करोड़पति और अरबपति ही चुका सकते हैं। कृषि मंत्रालय द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि खेती पर आश्रित लोगों में चालीस फीसद इसे मजबूरी का काम मानते हैं और अगर उन्हें विकल्प मिल जाए तो वे खेती छोड़ने को तैयार बैठे हैं।
इस स्थिति का एक दूसरा चित्र देखें। देहातों में आज ऐसे युवाओं की संख्या चौंकाने वाली है जिनके लिए प्रॉपर्टी डीलिंग एक मुकम्मल धंधा बन चुका है। यह हालत कहीं न कहीं इसलिए पैदा हुई है कि छोटे काश्तकार को अब यह लगने लगा है कि उसके दुखों और अभावों का मूल कारण खेती है। उसके दम पर न वह बच्चों को पढ़ सकता है न बेटियों का ब्याह-काज कर सकता है। देशभक्ति की सीख देने वाली उस फिल्मी धारणा की तो बात ही छोड़िए, जिसमें देश की धरती को सोना उगलने वाली बताया जाता था। आज स्थिति यह है कि औसत किसान भोजन के रूप में वही सब खाने को मजबूर है जो उसके खेत से बाहर पैदा हो रहा है।
गौर करें कि यह सब व्यवस्था निर्मित त्रासदी है। यह कोई प्राकृतिक विधान नहीं है, जिसे उलट कर दुबारा न गढ़ा जा सके। लेकिन असल में यही वह स्थिति है जिससे एक छोटे-से वर्ग को पूंजी के जरिए विज्ञान और तकनीक और अंतत: समाज और मनुष्यता के व्यापक हिस्से पर अपना अधिकार जमाने की ताकत मिलती है। अपने प्रभाव में यह ताकत इतनी मारक हो चुकी है कि उसने जीवन-यापन को एकांगी, जटिल और दुखदायी ही नहीं बनाया है बल्कि अपने ज्ञानशास्त्र के जरिए वह उस विचार को भी बेकार और पिछड़ा साबित कर देती है जो उसके द्वारा निर्धारित असहज और नकली जीवन के विरोध में खड़ा होने की जुर्रत करता है।
विचित्र यह है कि हमारी राज्य व्यवस्था एक तरफ तो विकेंद्रीकरण की बात करती है। स्थानीय शासन को पंचायतों को सौंपने की बात करती है। लेकिन जब पूरी व्यवस्था केवल वृहत से संचालित हो रही हो और उसमें लघु और स्थानीय की कोई जगह ही न हो तो फिर ऐसे विकेंद्रीकरण का क्या अर्थ रह जाता है। मसलन, खाद्य सुरक्षा अधिकार की बहस को लेकर कई जन-पक्षधर अर्थशास्त्री इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अगर अनाज का भंडारण स्थानीय या पंचायत के स्तर पर किया जाए तो वह खाद्य सुरक्षा की केंद्रीकृत योजना से कहीं ज्यादा कारगर होगा। लेकिन गैर-जरूरी सूचनाओं से बजबजाते हमारे मीडिया में इन पहलुओं पर कभी बहस आयोजित नहीं की जाती। मौजूदा व्यवस्था में जो भी विशाल पूंजी के तंत्र पर विराजमान हो जाता है उसका हित स्थानीय से अलग हो जाता है, क्योंकि स्थानीय और लघु में उतना मुनाफा नहीं है। दूसरे, पूंजी की वैश्विक तानाशाही से लड़ने का एक बडा विकल्प स्थानीय और लघु के विचार को पुन: प्रतिष्ठित करने से भी जुड़ा है। 
यहां यह भी कहना जरूरी है कि लघु और स्थानीय आर्थिक संदर्भ तक सीमित नहीं हैं। सही मायने में स्थानीय को ही बहुलतावाद की कसौटी माना जा सकता है। यही नहीं, अब मनुष्य के बौद्धिक तंत्र और उसके विश्व-बोध को तभी बचाया जा सकता है जब वह स्थानीय आ्रैर लघु की ओर लौटे। लेकिन समस्या यह है कि विशाल पूंजी के सांस्कृतिक-वैचारिक ढांचे द्वारा स्थानीयता की एक ऐसी छवि गढ़ी गई है जिसमें वह पिछडेÞपन और जड़ता का पर्याय बन गई है।


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