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Saturday, April 21, 2012

न्यूजरूम में नहीं है दलित बसेरा

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न्यूजरूम में नहीं है दलित बसेरा

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न्यूजरूम में नहीं है दलित बसेरा
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इंडियाज न्यूजपेपर रिवोल्यूशन के लेखक राबिन जेफरी ने हाल में ही एक बार सबका ध्यान अपनी ओर एक बार फिर आकर्षित किया था यह कहकर कि न्यूजरूम में दलितों का डेरा नहीं है। जेफरी कुछ गलत नहीं कह रहे हैं। आरक्षण के सहारे कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका आदि में दलित आये लेकिन आज भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकतंत्र के चौथे खम्भे पर काबिज होने में दलित पीछे ही नहीं बल्कि बहुत पीछे हैं। आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि भारतीय मीडिया में वर्षों बाद आज भी दलित-पिछड़े हाशिये पर हैं। उनकी स्थिति सबसे खराब है। गिने चुने ही दलित मीडिया में हैं और वह भी उच्च पदों पर नहीं। भारतीय मीडिया में दलित और आदिवासी, फैसला लेने वाले पदों पर नहीं है। राष्ट्रीय मीडिया के 315 प्रमुख पदों पर एक भी दलित और आदिवासी नहीं है।

'राष्ट्रीय मीडिया पर उंची जातियों का कब्जा' के तहत हाल ही में आये सर्वे ने मीडिया जगत से जुड़े दिग्गजों की नींद उड़ा दी थी। आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला। किसी ने समर्थन में दलित-पिछड़ों को आगे लाने की पुरजोर शब्दों में वकालत की तो किसी ने यहां तक कह दिया कि भला किसने उन्हें मीडिया में आने से रोका है। मीडिया के दिग्गजों ने जातीय असमानता को दरकिनार करते हुए योग्यता का ढोल पीटा और अपना गिरेबांन बचाने का प्रयास किया। 

दलित-पिछड़े केवल राष्ट्रीय मीडिया से ही दूर नहीं है बल्कि राज्य स्तरीय मीडिया में भी उनकी भागीदारी नहीं के बराबर है। वहीं उंची जातियों का कब्जा स्थानीय स्तर पर भी देखने को मिलता है। समाचार माध्यमों में उंची जातियों के कब्जे से इंकार नहीं किया जा सकता। मीडिया स्टडी ग्रुप के सर्वे ने जो तथ्य सामने लाये हालांकि वह राष्ट्रीय पटल के हैं लेकिन कमोवेश वही हाल स्थानीय समाचार जगत का है जहां दलित-पिछडे़ खोजने से मिलेंगे। आजादी के वर्षों बाद भी मीडिया में दलित-पिछड़े हाशिये पर हैं। मीडिया के अलावा कई क्षेत्र हैं जहां अभी भी सामाजिक स्वरूप के तहत प्रतिनिधित्व करते हुए दलित-पिछड़ों को नहीं देखा जा सकता है, खासकर दलित वर्ग को। आंकड़े बताते हैं कि देष की कुल जनसंख्या में मात्र आठ प्रतिषत होने के बावजूद उंची जातियों का, मीडिया हाउसों पर 71 प्रतिशत शीर्ष पदों पर कब्जा बना हुआ है। जहां तक मीडिया का जातीय व समुदायगत होने का सवाल है, आंकड़े बताते हैं कि कुल 49 प्रतिशत ब्राह्मण, 14 प्रतिशत कायस्थ, वैश्व/जैन व राजपूत सात-सात प्रतिशत, खत्री नौ, गैर द्विज उच्च जाति दो और अन्य पिछड़ी जाति चार प्रतिशत है। इसमें दलित कहीं नहीं आते यानी ढूंढते रह जाओगे।

जहाँ तक सरकारी मीडिया का सवाल है तो इसमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जन जाति के लोग भारतीय सूचना सेवा के तहत विभिन्न सरकारी मीडिया में कार्यरत है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के वेब साइट से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, सरकारी मीडिया के ग्रुप 'ए' में उच्चतर वर्ग से लेकर जूनियर वर्ग में लगभग आठ प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग हैं वहीं  ग्रुप 'बी' में लगभग 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति के हैं। सरकारी मीडिया में ग्रुप 'ए' और ग्रुप'बी' की सेवा है, इसके इनकी नियुक्ति रेडियो, दूरदर्शन, पी.आइ.बी. सहित अन्य सरकारी मीडिया में की जाती है। अनुसूचित जाति के लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने के मद्देनजर केन्द्र सरकार की नीतियों के तहत सरकारी मीडिया में तो दलित आ रहे हैं लेकिन निजी मीडिया में कोई प्रयास नहीं होने की वजह से दलित नहीं दिखते। 

मीडिया में जाति हिस्सेदारी से बवाल उठना ही था। जो वस्तुस्थिति है वह सामने है। सरकारी मीडिया को छोड़ दे तो निजी मीडिया में जो भी नियुक्ति होती है वह इतने ही गुपचुप तरीके से होती है कि मीडिया हाउस के कई लोगों को बाद में पता चलता है कि फ्लाने ने ज्वाइन किया है। खैर बात जाति की हो रही है। आंकड़े/सर्वे चैंकाते हैं, मीडिया के जाति पे्रम को लेकर पोल खोलते हैं प्रगतिषील बनने वालों का और उन पर सवाल भी दागते हैं । बिहार को ही लें, ''मीडिया में हिस्सेदारी'' के सवाल पर हाल ही में पत्रकार प्रमोद रंजन ने भी जाति प्रेम की पोल खोली है। हालांकि राष्ट्रीय सर्वे में अनिल चमड़िया, जितेन्द्र कुमार और योगेन्द्र यादव ने जो खुलासा किया था, उसने देश के क्षेत्रीय मीडिया हाउसों के जाति प्रेम को भी अपने घेरे में लिया था।

बिहार, मीडिया के मामले में काफी संवेदनशील व सचेत माना जाता है। लेकिन, यहां भी हाल राष्ट्रीय पटल जैसा ही है।''मीडिया में हिस्सेदारी'' में साफ कहा गया है कि बिहार की राजधानी पटना में काम कर रहे मीडिया हाउसों में 87 प्रतिशत सवर्ण जाति के हैं। इसमें, ब्राह्यण 34, राजपूत 23, भूमिहार 14 एवं कायस्थ 16 प्रतिशत हैं। हिन्दू पिछड़ी-अति पिछड़ी जाति, अशराफ मुसलमान और दलित समाज से आने वाले मात्र 13 प्रतिशत पत्रकार हैं । इसमें सबसे कम प्रतिशत दलितों का है। लगभग एक प्रतिशत ही दलित पत्रकार बिहार की मीडिया से जुड़े हैं। वह भी कोई उंचे पद पर नहीं हैं। महिला सषक्तिकरण के इस युग में दलित महिला पत्रकार को ढूंढना होगा। बिहार के किसी मीडिया हाउस में दलित महिला पत्रकार नहीं के बराबर है। आंकड़े बताते हैं कि दलित महिला पत्रकारों का प्रतिषत शून्य है जबकि पिछडे़-अति पिछड़े जाति की महिला पत्रकारों का प्रतिषत मात्र एक है। साफ है कि दलित-पिछड़े वर्ग के लोग पत्रकारिता पर हाशीये पर हैं।

भारतीय परिदृश्य में अपना जाल फैला चुके सैटेलाइट चैनल यानी खबरिया चैनलों की स्थिति भी कमोवेश एक ही जैसा है। यहां भी कब्जा सवर्ण हिन्दू वर्ग का ही है। 90 प्रतिशत पदों पर सवर्ण काबिज हैं। हालांकि हिन्दू पिछड़ी जाति के सात प्रतिशत, अशराफ मुसलमान तीन एवं महिलाएं 10 प्रतिशत हैं। यहां भी दलित, ढूंढते रह जाओगे। मीडिया में दलितों की नहीं के बराबर हिस्सेदारी भारतीय सामाजिक व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। सर्वे या फिर सामाजिक दृष्टिकोण के मद्देनजर देखा जाए तो आजादी के बाद भी दलितों के सामाजिक हालात में क्रांतिकारी बदलाव नजर नहीं आता। बस कहने के लिए राजनैतिक स्तर पर उन्हें मुख्यधारा में लाने के हथकंड़े सामने आते हैं जो हकीकत में कुछ और ही बयां करते हैं। तभी तो जब देश में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को लेकर विरोध और समर्थन चल रहा था तभी पांडिचेरी के प्रकाशन संस्थान 'नवयान पब्लिशिनग' ने अपनी वेबसाइट पर दिये गये विज्ञापन में 'बुक एडिटर' पद के लिए स्नातकोत्तर छात्रों से आवेदन मांगा और शर्त रख दी कि 'सिर्फ दलित ही आवेदन करें।' इस तरह के विज्ञापन ने मीडिया में खलबली मचा दी। आलोचनाएं होने लगीं। मीडिया के ठेकेदारों ने इसे संविधान के अंतर्गत जोड़ कर देखा। यह सही है या गलत। इस पर राष्ट्रीय बहस की जमीन तलाशी गई।

दिल्ली के एक समाचार पत्र ने इस पर स्टोरी छापी और इसके सही-गलत को लेकर जानकारों से सवाल दागे। प्रतिक्रिया स्वरूप संविधान के जानकारों ने इसे असंवैधानिक नहीं माना। वहीं, सवाल यह उठता है कि अगर 'नवयान पब्लिषिंग' ने खुलेआम विज्ञापन निकाल कर अपनी मंशा जाहिर कर दी तो उस पर आपति कैसी ? वहीं गुपचुप ढंग से मीडिया हाउसों में उंची जाति के लोगों की नियुक्ति हो जाती है तो कोई समाचार पत्र उस पर बवाल नहीं करता है और न ही सवाल उठाते हुए स्टोरी छापता है ? कुछ वर्ष पहले बिहार की राजधानी पटना से प्रकाशित एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक ने जब अपने कुछ पत्रकारों को निकाला था तब एक पत्रिका ने अखबार के जाति पे्रम को उजागर किया था। पत्रिका ने साफ -साफ लिखा था कि निकाले गये पत्रकारों में सबसे ज्यादा पिछड़ी जाति के पत्रकारों का होना अखबार का जाति प्रेम दर्शाता है। जबकि निकाले गये सभी पत्रकार किसी मायने में सवर्ण जाति के रखे गये पत्रकारों की काबिलियत के मामले में कम नहीं थे।

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