जनसत्ता 15 अप्रैल, 2012: वरिष्ठ कवि-कथाकार, समालोचक रमेशचंद्र शाह लगभग पचास वर्षों से कविताएं लिख रहे हैं। हिंदी साहित्य सम्मेलन की आधुनिक कवि माला में, जिसमें सुमित्रा नंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे कवियों के संचयन छपे हों, उसके चौबीसवें कवि के रूप में रमेशचंद्र शाह की चुनी हुई कविताएं छपना निस्संदेह प्रसन्नता का विषय है। 'आधुनिक कवि' माला की रीति के अनुसार इस चयन में कवि ने कुल एक सौ चौदह कविताओं का चयन किया है। इसमें उनका एक वक्तव्य भी दिया गया है, जिसे रमेशचंद्र शाह ने 'एक निजी और फिर भी, सार्वजनिक वक्तव्य' कहा है और इसे 'होना कवि हिंदी का' शीर्षक दिया है। कवि के लिए 'कविता करना सांस लेने की तरह सहज' रहा है। उनके लिए 'जाने अनजाने कविता लिखना... सारी चीजों और सब तरह के अनुभवों के आपस में जुड़े होने के बोध को प्रत्यक्ष करना था।' रमेशचंद्र शाह की कविताओं में 'गंभीरता और विनोद वृत्ति, सामाजिकता और निजता, अत्यधिक एकाग्रता और फिर भी उसके साथ एक चंचलता- पर्युत्सुकता, आसक्ति और अनासक्ति मानो एक साथ सक्रिय रहते हैं।' बाद में ये तत्त्व शाह की गद्य रचनाओं में आने लगे। कवि ने अपने वक्तव्य में इसका स्पष्टीकरण दिया है- 'ऐसा कैसे हो गया कि जो एकाग्रता और तन्मयता पहले सिर्फ कविता पर निछावर होती थी, वह गद्य के गलियारों में भटकने लगी? ऐसी क्या जरूरत पड़ी मुझे इतना सारा गद्य लिखने की- इतनी बुद्धि-ऊर्जा और भाव-ऊर्जा कहानी-उपन्यास-निबंध और आलोचना में उड़ेलने की? एक तथाकथित आपद्धर्म को स्वधर्म की तरह अंगीकार करने की?... कवि कर्म और उसकी आधारभूत मूल चेतना पर घिर आए संकट को उस संकट के भीतर पैठ कर परिभाषित करने और उससे किसी कदर उबरने की प्राणप्रण चेष्टा करने की अंतर्विवशता ने ही मुझसे यह सब करवाया होगा और यह चेष्टा अभी तक उसी तरह जारी है। कविता के भीतर और कविता के बाहर भी। अर्थ-वंचना और मूल्य-भ्रंश के इस घटाटोप से जूझे बिना न तो कविता का निस्तार है न कवि का- भले ही वह अपने मन के भी मन में गहरे कहीं आज भी इसी विश्वास से अनुप्राणित हो, कि 'कवि का मन साझा होता है/ ...इसीलिए, हां इसीलिए तो/ इतना सारा कीच पचा कर भी दुनिया का/ कवि का मन/ किस कदर अरे/ ताजा होता है।' इस संचयन की कविताओं में भी कविता के बारे में कई वक्तव्य हैं: 'जिंदा कविता/ सन्निपात का पुल है/ इस बेखबर बहाव में/ भीगने से इनकार करते हुए/ मेरी निगाह ठहर जाती है/ सड़क के आरपार/ लेटी हुई/ छाया पर'। 'सरल हुआ जाता उतना ही/ लिखना कविता/ एक सरल कवि-समय बना है/ कवच और आयुध अमोघ/ कुछ काल-कूट कवियों का/ कौन किसे समझाए/ ऐसे कठिन और कवि-विमुख समय में-/ सरल नहीं होती है कविता किसी काल की।' ऐसे कवि-विमुख समय में जब कविता लिखना कठिनतर हो जाता है, कुछ ऐसी समस्याएं पैदा होती हैं, जिनका हल ढूंढ़ने के लिए संभवत: गद्य-निबंध, कहानियां, उपन्यास आदि के क्षेत्र में जाना पड़ता है। ये कवि के सृजन कर्म से उपजी हुई समस्याएं हो सकती हैं या वाह्यलोक और उसके निज से संबंधों के बीच से उपजी हुई। यह कहना कठिन है कि कविता के बाहर इनका कोई हल मिल पाएगा। हल मिलेगा तो कविता के भीतर ही, उससे ही जूझते हुए। कभी-कभी सरल समाधान पाने के बजाय समस्या का समस्या ही बने रहना उपयुक्त होता है। चित्त में एक समय तक अनेक दिशाओं से समाधान आते रहेंगे और एक दिन निदान भी मिल जाएगा। शाह जी के काव्य-वैविध्य में राजनीतिक कविताएं भी हैं और उन्होंने खासी सफल राजनीतिक कविताएं लिखी हैं। ये कविताएं भारत की समकालीन राजनीतिक घटनाओं पर लिखी गई हैं। इस कविता में शायद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के अंतिम दिनों का दृश्य मूर्तमान किया गया है: 'अच्छा-खासा खड़ा गिर पड़े ज्यों मुंह के बल/ शर्मनाक था दृश्य, झपट फिर बदला चैनल/ दीखी वहां गरजती ममता धीर बंधाती/ प्रगटे फर्नांडीज-घिरा ऐसा सन्नाटा/ उतर गया ज्यों ज्वार, बचा हो केवल भाटा/ पत्रकार-बंधु ने तभी मुझको समझाया/ कहां, कब गणित ने विपक्ष के पलटा खाया/ बची-खुची भी साख गंवाकर लोकलाज की/ लोकतंत्र में आखिर क्या हासिल होना है?/ बची रहे सरकार, और तब मध्यावधि हो/ पाय-खोय फिर, जिसको जो पाना-खोना है।' आगे उद्धृत कविता में अंग्रेजी हुकूमत भारत के लोगों के लिए छोड़ा हुआ अपना दाय एक-एक कर गिना रही है: 'हमने ही तो राज-काज तुमको सिखलाया/ हमने ही तो/ देश तुम्हारा कितना, क्या तुमको जतलाया/ तुम्हीं बताओ- कब थे इतने एक/ हजारों बरसों के अपने अतीत में?/ राष्ट्र-प्रेम, एकता और संप्रभुता.../ हां-हां, अखंडता तक/ नहीं हमीं से सीखे क्या तुम?/ रेल, तार, अखबार, विश्वविद्यालय... सब तो/ हमने तुमको दिए, और, ...बदले में थोड़ी/ स्वतंत्रता ही तो ली- जिसका यों भी वैसे/ कोई मतलब खास तुम्हारे लिए नहीं था।/ सच पूछो, तो/ स्वतंत्रता का मूल्य/ हमीं ने तुमको पहचनवाया।' ('सपने में वायसराय') यहां सपने में वायसराय जो कुछ सोच रहा है वह कार्ल मार्क्स ने भारत में अंग्रेजी राज्य के परिणामों को दर्शाते हुए भी लिखा है। बाद में भारत के अंग्रेजी शिक्षित समाज के एक वर्ग का यह कहना भी रहा है और उसके प्रतिनिधि इतिहासकारों ने भारत पर अंग्रेजी प्रभाव के विवरण देते हुए भी ऐसी बातें कही हैं। ये प्रश्न ऐसे हैं जो किसी न किसी रूप में उठते रहते हैं। अगर संभव होता तो प्रश्न का संपूर्ण उत्तर देकर लोगों से कह दिया जाता कि अब यह प्रश्न मत उठाइए, क्योंकि यह गलत प्रश्न है, इसके उत्तरों से यह सिद्ध हो गया है और कई बार उत्तर दिए जा चुके हैं। लेकिन जिन लोगों का स्वार्थ प्रश्न उठाने में है उनके लिए प्रश्न बना ही रहता है। इसी तरह एक दिवंगत राजनेता के एक वक्तव्य और उस पर हुई प्रतिक्रिया को एक कविता में उतारा गया है। 'जाने क्यों कतरनें छांट कर अखबारों की/ रख लेने की पड़ी टेव थी।' यह कविता इंडियन एक्सप्रेस में छपे आचार्य कृपलानी के एक पत्र से उद्भूत है। कृपलानी ने यह पत्र एक निरंतर गहरी होती जा रही समस्या पर लिखा था। 'या, वह चिट््ठी- जिसे याद कर अभी, दुबारा/ रोया था मैं फूट-फूट कर/ 'अब उतरेगा नहीं तुम्हारे लिए दूसरा गांधी कोई/ गांठ बांध लो इसे- अगर चाहो तो...'/ 'नाम मुसलमानों के भारत के मेरा पैगाम आखिरी'/ यही, यही तो शीर्षक था उस/ डेढ़ कॉलम में 'एक्सप्रेस' के छपी हुई चिट्ठी का।' ('आठवां दशक') कम्युनिस्ट शासकों द्वारा कभी तिरस्कृत कर दिए गए ढाई हजार वर्ष पुराने दार्शनिक महापुरुष कन्फ्यूशियस को दुबारा स्वीकृति में लाए जाने के समय लिखी गई कविता है- 'कू-फू'। 'फिर आया 'सांस्कृतिक क्रांति' का दशक/ वर्ष सड़सठ से वर्ष छिहत्तर तक भांजता गदाएं/ चौतरफा इस चीन देश में/ 'कू-फू' के ट््टषि की समाधि की/ बिखर गई धज्जियां... और उन सभी शिलालेखों को भी/ जिन पर थीं उसकी खुदी सूक्तियां/ या प्रशस्तियां सम्राटों की।' 'असली खबर और आगे है/ अब जो नए विचारों के सम्राट/ राज कर रहे चीन पर/ उनके द्वारा नए सिरे से मंदिर और भवन का जीर्णोद्धार/ किया जा रहा आज कल।' ('समाचार') रमेशचंद्र शाह ने कविताएं लिखने के अलावा कविताओं की रचना प्रक्रिया पर भी लिखा है। यह उन्होंने गद्य में भी लिखा है और अनेक पद्यों में भी। 'कविता एक ऐसी कला है, जिसकी सारी सामग्री मनुष्य की अपने को अभिव्यक्त करने की छटपटाहट से ही उपजी है। जिन चीजों से कविता बनती है- स्वर, व्यंजन, लय, शब्द, वाक्य, शब्दांतराल, स्मृतियां-श्रुतियांं, राग-विराग, सुख-दुख, रूप-गंध, शोर-संगीत आदि... उनमें एक भी चीज ऐसी नहीं, जो हममें से हरेक के अंतर्वाह्य जीवन से सीधे जुड़ी न हो। '...कहा जो न, कहो/ नित्य नूतन प्राण अपने/ गान रच-रच दो... वही तो करती है कविता।' 'यही तो उसका स्वभाव और उसकी खासियत है। अनकहे को उजागर करना। वही तो हमें यकीन दिलाती है कि हम अपनी सारी अव्यक्त, अबूझ वेदनाओं और उलझनों को भी व्यक्त कर सकते हैं- दूसरों तक संप्रेषित कर सकते हैं और इस तरह इस संप्रेषण की बदौलत ही उनसे उबर भी आ सकते हैं।' 'कछुए की पीठ पर', 'शब्द, बताओ', 'कठिन समय में', 'कविता जी खुद', 'तुम्हारी कहानी' आदि ऐसी कविताएं हैं जिनके जरिए कविता के विषय में कुछ कहा गया है। इनसे केवल कवि की कविता नहीं, बल्कि सामान्यतया 'कविता' पर रोशनी पड़ती है। मामूली-सी घटनाएं भी उनके यहां कविता का रूप ग्रहण कर लेती हैं। उदाहरण के लिए इस संचयन में 'सहयात्री', 'काम की बात', 'श्याम रेल में', 'सेवानिवृत्ति के बाद', 'बहुरूपिया' शीर्षक कविताएं ऐसी ही हैं। 'सबारे ऊपर मानूस सत्य/ तारे ऊपर किछु नाई' चंडीदास की यह बांग्ला काव्यपंक्ति एक तरह से 'मानववाद' का आधार वाक्य बन गई है। यह मानववाद छिछला, सत्य के सामने भीरु और प्राय: अनर्थकारी होता है। रमेशचंद्र शाह की कविता है- 'चंडीदास के गांव में': 'सबके ऊपर/ है मनुष्य का सत्य/ और,/ उसके ऊपर/ कुछ नहीं/ कैसे इतना बड़ा दांव तुम/ लगा गए कोरे मनुष्य पर/ कैसी विकट पहेली तुम/ रच गए इस तरह/ अपने अनजाने ही?/ तुम्हें क्या पता/ कैसे-कैसे लोग इसी में/ कैसे-कैसे रंग भरेंगे/ अपने मनमाने ही!' यहां कवि ने 'इस विकट पहेली में/ कैसे-कैसे रंग भरेंगे/ अपने मनमाने ही!' कह कर एक छिछले 'मानववाद' का खंडन किया है, जो भारतीय टिप्पणीकारों, यहां तक कि लेखकों और दार्शनिकों द्वारा भी उद्धृत किया जाता रहा है। हर मौके-बेमौके उद्धृत होने वाले इस वक्तव्य में कोई अर्थ नहीं था फिर भी लोग इसका उपयोग करके एक घटाटोप पैदा कर देते थे। रमेशचंद्र शाह ने कुछ सुंदर प्रगीतियां भी लिखी हैं। 'हरसिंगार की चोंच/ और... टांर्गि भी, देखो-/ हरसिंगार की/ ताल किनारे/ झरे थाल सा/ हरसिंगार के/ खिला झुंड/ बतखों का।' 'झील में अटका पड़ा यह/ व्योम देवल/ छंद केवल?/ या कहीं कुछ/ बात?/ पूछती है रात।' इस संचयन में 'मूसल पर्व', 'अरावली एक शृंखला', 'व्यास-पर्व', 'यही समय है', 'अन्न जल', 'प्यारे मुचकुंद को', 'जागते रहो', 'एक लंबी छांह' आदि अनेक ऐसी कविताएं हैं जो हिंदी पाठक के काव्य-जीवन को समृद्ध करती हैं। इस समय हिंदी में जैसी कविताएं लिखी जा रही हैं उससे यह नहीं लगता कि आजकल कवियों में भाषा की 'सदियों में विस्तृत सुदीर्घ जीवनी' का अहसास अभी शेष है। रमेशचंद्र शाह की कविताएं हिंदी पाठकों के भाषा जीवन को अपने विस्तृत वैविध्य से प्राणवान बनाती हैं। कमलेश आधुनिक कवि: रमेशचंद्र शाह; हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, 12, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद; 200 रुपए। |
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