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Wednesday, April 11, 2012

विदेशी निवेश के लिए ​​थोक दरों पर हरी झंडियां तैयार। विदेशी निवेशकों की बेरुखी से बेजान होते बाजार को क्रोमिन देने की यह तरीका ईजाद किया है सरकार ने!

विदेशी निवेश के लिए ​​थोक दरों पर हरी झंडियां तैयार। विदेशी निवेशकों की बेरुखी से बेजान होते बाजार को क्रोमिन देने की यह तरीका ईजाद किया है सरकार ने!

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

अब उद्योग जगत के लिए आर्थिक सुधारों की गति को लेकर शिकायत करने का मौका देने के मूड में नहीं है सरकार। विदेशी निवेश के लिए ​​थोक दरों पर हरी झंडियां तैयार हैं। विदेशी निवेशकों की बेरुखी से बेजान होते बाजार को क्रोमिन देने की यह तरीका ईजाद किया है सरकार ने!देश के कमोडिटी एक्सचेंजों में निवेश के लिए अब विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को सरकार से इजाजत लेने की जरूरत नहीं होगी।विदेशी निवेश नीति पर सरकार की ओर से जारी सर्कुलर के मुताबिक हालांकि कमोडिटी एक्सचेंजों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए सरकार से इजाजत लेना जरूरी होगा। साथ ही किसी भी एक्सचेंज में दोनों तरह से विदेशी निवेश की सीमा पहले की तरह 49 फीसदी से ज्यादा नहीं होगी।स्टॉक एक्सचेंज पर एमसीएक्स की लिस्टिंग के बाद सरकार ने अपनी नीति में ये अहम बदलाव किया है। फिलहाल एनसीडीईएक्स में गोल्डमैन सैक्स और फिडेलिटी जैसे विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने कहा है कि नीतिगत रूप से भारत विदेशी निवेश को आकर्षित करता रहेगा।डायरेक्ट टू होम(डीटीएच) और केबल टीवी जैसी ब्रॉडकास्टिंग सेवाओं में सीधे विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर 74 फीसदी करने के लिए मंजूरी मिल सकती है। जल्द ही केबिनेट में इस पर चर्चा होने की उम्मीद है। इसके अलावा मोबाइल टीवी में भी इसी तरह की मंजूरी दी जा सकती है।डीआईपीपी ने इस प्रस्ताव को तैयार किया है, जिसमें कहा गया है कि विदेशी निवेश के मामले में डीटीएच और केबल टीवी को भी हाई एंड इन द स्काय(एचआईटीएस) के बराबर लाना चाहिए।एचआईटीएस एक सेटेलाइट सर्विस है जो केबल प्रसारण के लिए चैनल उपलब्ध कराती है। इस वक्त डीटीएच और केबल टीवी में 49 फीसदी विदेशी निवेश की छूट है जबकि एचआईटीएस के लिए ये सीमा 74 फीसदी है। हांलाकि टीवी न्यूज और एफएम रेडियो में अभी 26 फीसदी विदेशी निवेश की सीमा बरकरार रहेगी।हालांकि एडीबी का मानना है कि भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में खास तेजी आने के आसार नहीं हैं। लेकिन विकसित देशों में ब्याज दर काफी कम होने से भारत विदेशी वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) से अच्छी-खासी रकम ले सकता है। इस तरह हुए विदेशी पूंजी के प्रवाह से भारत का चालू खाते का घाटा कम होगा।

वित्त मंत्रालय ने बुधवार को उस प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी, जिसमें विदेशी विमानन कंपनियों को घरेलू विमानन कंपनियों में 49 प्रतिशत तक हिस्सेदारी खरीदने की अनुमति देने की बातहै। दूसरी तरफ सरकार ने जिंस एक्सचेंजों में विदेशी निवेश के नियमों में ढील दी है जिसके तहत उनमें विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) बिना पूर्व सरकारी अनुमति के 23 प्रतिशत तक शेयर ले सकते हैं पर सीधे विदेशी इक्विटी निवेश के लिए सरकार से अनुमति का नियम लागू रहेगा।इससे मल्टी ब्रांड एफडीआई के दरवाजे सपाट कुल गये हैं। अगली तैयारी इसीकी है। कबर है कि केंद्र ने इच्छुक सरकारों को अपने अपने राज्यों में मल्टी ब्रांड एफडीआई की इजाजत दी हुई है।मालूम हो कि विगत महीनों के दौरान भारी विरोध जताए जाने के कारण सरकार ने मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) की इजाजत देने के फैसले को टाल दिया था। तबसे मल्टी ब्रांड खुदरा क्षेत्र में एफडीआई पर राज्यों के साथ सहमति बनाने का प्रयास जारी है।बाजार के लिए भारी राहत की बात है कि सरकार टेलीकाम लाइसेंस रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए संवैधानिक दबाव बनाने में लगी है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी तो सरकार ने राष्ट्रपति की ओर से इस फैसले पर व्याख्या मांगने का फैसला कर लिया, जिसके तहत पूछा यह जायेगा कि क्या हर मामले में नीलामी जरुरी है। यानी सरकार  पहले आओ, पहले पाओ नीति पर अड़ी ​​हुई है।डीआईपीपी ने विभिन्न मंत्रालयों को घरेलू एविएशन कंपनियों में विदेशी एयरलाइंस को 49 फीसदी हिस्सा खरीदने पर ड्राफ्ट नोट भेज दिया है। माना जा रहा कि जल्द एविएशन में एफडीआई को कैबिनेट से मंजूरी मिल जाएगी।

बाजार की मर्जी से सरकार कैसे काम कर रही है , वह बिजली मंत्रालय की ओर से निजी बिजली कंपनियों को कोयला आपूर्ति बढ़ाने के ​​लिए लिखी  एकदम ताजा चिट्ठी से जाहिर है। मालूम हो कि पीएमओ के हस्तक्षेप और राष्ट्रपति के दखल से कोल इंडिया पर गिरते उत्पादन के संकट और निवेशकों की इच्छा के विरुद्ध आयात के जरिये बिजली कंपनियों की मांग पूरी करने का दबाव बना हुआ है और नये चेयरमैन ने इसके लिए बाकायदा हामी भर दी। इसके बावजूद कोल इंडिया की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं।जानकारी मिली है कि कोयले की सप्लाई को लेकर बिजली मंत्रालय ने कोयला मंत्रालय को चिट्ठी लिखी है।सूत्रों के मुताबिक बिजली मंत्रालय का कहना है कि पुराने करार के मुताबिक कोल इंडिया बिजली कंपनियों को 80 फीसदी तक कोयला सप्लाई करना शुरू करे। 2011 में कोल इंडिया ने अप्रैल 2009 के बाद शुरू हुए पावर प्लांट के साथ करार किया था।बिजली मंत्रालय का कहना है कि फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट होने तक करार का वक्त बढ़ाया जाना चाहिए। मार्च 2012 तक कमीशन हुए पावर प्लांट्स को कोयले की आपूर्ति की जानी चाहिए।कोल इंडिया ने अब तक फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट को मंजूरी नहीं दी। 16 अप्रैल को कंपनी की पेनाल्टी क्लॉज पर बैठक होने वाली है।राष्ट्रपति निर्देश जारी होने के बाद कोल इंडिया को पावर कंपनियों के साथ फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट करना है। करार के तहत कोल इंडिया को पावर प्लांट्स की जरूरत का 80 फीसदी कोयला सप्लाई करेगी। ऐसा न होने पर कंपनी पर जुर्माना लग सकता है।

देश के लिए फिर से नौ फीसद की आर्थिक विकास दर वाले दिन जल्दी लौटते नहीं दिख रहे हैं। सरकार समेत तमाम प्रमुख संस्थाओं के अनुमान तो कम से कम यही बता रहे हैं। इस संबंध में सबसे ताजा रिपोर्ट एशियाई विकास बैंक [एडीबी] की आई है। इसमें वर्ष 2012-13 में भारत की विकास दर सात प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। एडीबी के मुताबिक, अर्थव्यवस्था की रफ्तार इस पर निर्भर करेगी कि देश सुधारों के एजेंडे को कितना आगे बढ़ाता है।एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री छांगयोंग री ने कहा कि लगातार ऊंची महंगाई दर और नीतिगत ब्याज दरों में वृद्धि के बाद मौद्रिक नीति में संभावित नरमी से आने वाले वर्षो में निवेश बढ़ाने में मदद मिल सकती है। वहीं, जमीन खरीद और पर्यावरणीय नियम संबंधी बाधाएं इसके आड़े आएंगी।विदेशी निवेश के बारे में अनिश्चितता दूर करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने शुक्रवार को कहा कि पार्टिसिपेटरी नोट्स (पी-नोट्स) के जरिये शेयर बाजार में निवेश करने वाले व्यक्ति को भारत में कर नहीं देना होगा। वित्त मंत्री के इस बयान के बाद शेयर बाजारों में जोरदार उछाल आया। मुखर्जी ने कहा कि भारतीय कर अधिकारी वित्तीय संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) से आगे जाकर पी-नोट्स धारकों की जानकारियों की जांच नहीं करेंगे। ऐसे में पी-नोट्स धारकों पर भारत में कर देनदारी का सवाल ही पैदा नहीं होता। इस बारे में जरूरी स्पष्टीकरण जल्द जारी किया जाएगा।

वित्त मंत्रालय ने भारतीय विमानन कंपनियों में विदेशी विमानन कंपनियों को 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने की अनुमति देने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।अब प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय कैबिनेट में होगा। एक अन्य अधिकारी ने कहा कि इस संबंध में एक कैबिनेट नोट भेज दिया गया है और कैबिनेट इस पर जल्द ही निर्णय कर सकता है।उल्लेखनीय है कि विदेशी निवेशकों को घरेलू विमानन कंपनियों में 49 प्रतिशत तक हिस्सेदारी खरीदने की अनुमति है, लेकिन विदेशी विमानन कंपनियों को भारतीय विमानन कंपनियों में हिस्सेदारी की अनुमति अभी नहीं है।नकदी के संकट से जूझ रही विमानन कंपनियों को विमान ईंधन के बढ़ते मूल्य और जबरदस्त प्रतिस्पर्धा सहित कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। विमानन उद्योग की एक बड़ी मांग मानते हुए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने इस संबंध में कैबिनेट नोट आगे बढ़ा दिया है। किंगफिशर एयरलाइन्स विदेशी विमानन कंपनियों को भारतीय विमानन कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदने की अनुमति देने की पुरजोर मांग करती रही है।

डीआईपीपी की समेकित एफडीआई नीति के अनुसार एफआईआई के जिंस एक्सचेंजों में 23 प्रतिशत तक के निवेश के लिए अब सरकार की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। हालांकि, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए एफआईपीबी की अनुमति की जरूरत बनी रहेगी।फिलहाल जिंस एक्सचेंजों में कुल विदेशी हिस्सेदारी की सीमा 49 प्रतिशत है। इस सीमा के तहत पंजीकृत विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए निवेश की सीमा 23 प्रतिशत और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत रखी गई है। डीआईपीपी ने कहा कि अब इस नीति को उदार बनाने का फैसला किया गया है। कुल सीमा में से सिर्फ एफडीआई के हिस्से के लिए सरकार की मंजूरी लेनी है। शेष 23 फीसद के लिए पूर्वानुमति की जरूरत नहीं होगी।मंगलवार को डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन (डीआईपीपी) द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर जारी सर्कुलर में इस बात का खुलासा किया गया है। यह सर्कुलर 10 अप्रैल से लागू माना जाएगा। सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए 'संयुक्त उद्यम' को परिभाषित कर सकती है। इसके तहत संयुक्त उद्यम में दोनों भागीदारों की कम से कम 25-25 फीसद हिस्सेदारी अनिवार्य होगी। संयुक्त उद्यम की परिभाषा जल्दी ही एफडीआई नीति में शामिल की जाएगी, जो जल्द पेश होने वाली है। एक आधिकारिक सूत्र ने कहा कि हमने संयुक्त उद्यम को परिभाषित करने का फैसला किया है, जिसके तहत दोनों भागीदारों की हिस्सेदारी कम से कम 25-25 फीसद होना चाहिए।

इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एमसीएक्स-एसएक्स को राहत देते हुए सेबी की अर्जी को खारिज कर दिया है। बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सेबी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।बॉम्बे हाई कोर्ट ने सेबी को एमसीएक्स-एसएक्स को कारोबार शुरू करने की मंजूरी देने के लिए कहा था। सेबी एमसीएक्स-एसएक्स के प्रमोटरों की हिस्सेदारी पर सवाल उठाए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को 3 महीनों में एमआईएमपीएस गाइडलाइंस बदलने के लिए कहा है। कोर्ट के मुताबिक सेबी नई गाइडलाइंस के आधार पर एमसीएक्स-एसएक्स की अर्जी पर फैसला करे।

दिन भर के उतार चढ़ाव के कारोबार के बाद बाजार मामूली गिरावट के साथ बंद हुए। अंतिम घंटों में आई मामूली तेजी के बाद फिर से गिरावट का रुख देखने को मिला। सेंसेक्स 44 अंक गिरकर 17199 के स्तर पर और निफ्टी 17 अंक गिरकर 5227 के स्तर पर बंद हुआ। दिन भर के कारोबार के दौरान सेंसेक्स 17319 के उच्चतम स्तर और 17076 के नीचले स्तर तक गिरा। ज्यादातर एशियाई बाजारों में भी गिरावट देखने को मिली।

भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशों में सीधा निवेश करने की योजना बना रही भारतीय कम्पनियों के लिए नियमों में ढील दे दी है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि अब उन्हें विदेश में विदेशी मुद्रा खाता खोलने, बनाए रखने के लिए उसकी अनुमति की जरूरत नहीं होगी।भारतीय कम्पनियों को इससे पहले उन देशों में प्रत्यक्ष निवेश के लिए एफ.सी.ए. खोलने, रखने व परिचालन करने हेतु भारतीय रिजर्व बैंक की अनुमति की जरूरत होती थी जहां स्थानीय नियमों के अनुसार एफ.डी.आई. के लिए किसी विशेष खाते का रखना जरूरी हो। वहीं, रिजर्व बैंक ने इस मामले में अन्य शर्तों में बदलाव नहीं किया है। केंद्रीय बैंक के बयान में कहा गया कि किसी भारतीय कम्पनी द्वारा विदेश में एफ.सी.ए. में पैसा (रेमिटैंस) भेजा जाता है तो उसका इस्तेमाल केवल संयुक्त उद्यम या पूर्ण स्वामित्व वाली अनुषंगी कम्पनी में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए किया जाना चाहिए।इसके अलावा अनुषंगी से इस तरह के खाते में लाभांश या अन्य पात्रता के रूप में आने वाली राशि को 30 दिन के भीतर भारत भेजना होगा। वहीं, भारतीय कम्पनियों को एफ.सी.ए. में डैबिट व क्रैडिट का ब्यौरा वार्षिक आधार पर और सांविधिक ऑडिटरों से प्रमाण पत्र भी देना होगा कि एफ.सी.ए. का परिचालन मेजबान देश के नियमों तथा भारत के फेमा कानूनों के हिसाब से ही किया जा रहा है, संबंधित बैंक को देना होगा। रिजर्व बैंक ने कहा है कि अगर भारतीय पक्ष विदेश में अपने संयुक्त उद्यम या पूर्ण अनुषंगी फर्म में विनिवेश करता है या उसे बंद कर देता है तो इसके 20 दिन में उसे एफ.सी.ए (वह खाता) भी बंद कर देना होगा।

एडीबी ने भारत के बारे में कहा कि यहां मजबूत आर्थिक निष्पादन इस बात पर निर्भर करता है कि देश आर्थिक सुधारों के एजेंडे को कितनी मजबूती से आगे बढाता है और निवेश में आड़े आ रहे मुद्दों को कैसे सुलझाता है। मालूम हो कि बीते वित्त वर्ष 2011-12 में भारत की विकास दर अग्रिम अनुमान 6.9 फीसदी का है, जबकि इससे पिछले साल 2010-11 में यह 8.4 फीसदी रही थी। यह बात भी नोट करने की है कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने 16 मार्च को पेश बजट में 2012-13 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7.6 फीसदी वृद्धि का अनुमान लगाया है। रिजर्व बैंक अगले हफ्ते 17 अप्रैल को सालाना मौद्रिक नीति में आर्थिक विकास का अपना अनुमान पेश करेगा।दुनिया के आर्थिक हालात स्थिर हो रहे हैं। ऐसे में उम्मीद है कि भारत की आर्थिक विकास दर चालू वित्त वर्ष 2012-13 में 7 फीसदी और इसके अगले साल 2013-14 में 7.5 फीसदी पर पहुंच जाएगी। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने बुधवार को जारी अपने सालाना प्रकाशन – एशियन डेवलपमेंट आउटलुक 2012 में यह अनुमान जताया है। चीन की आर्थिक विकास दर के लिए एडीबी का अनुमान 2012 में 8.5 फीसदी और 2013 में 8.7 फीसदी का है। बीते साल 2011 में चीन की आर्थिक विकास दर 9.2 फीसदी रही है।एडीबी की सालाना आउटलुक के मुताबिक, भारत में चालू वित्त वर्ष में मुद्रास्फीति की औसत दर 7 फीसदी और अगले वर्ष 2013-14 में 6.5 फीसदी रह सकती है। इस आशा के पीछे सामान्य मानसून और वैश्विक बाजार में जिंसों की कीमतों में स्थिरता को मानकर चला गया है। रिपोर्ट का कहना है कि 2012-13 में भारत का निर्यात 14 फीसदी बढ़ सकता है। बाहर से धन का आगम बढ़ सकता है। इसलिए चालू खाते का घाटा 2012-13 में जीडीपी का 3.3 फीसदी रह सकता है। 2011-12 में दिसंबर 2011 तक के नौ महीनों में यह 4.3 फीसदी के चिंताजनक स्तर पर रहा है।

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