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Tuesday, April 17, 2012

11 जुलाई 1996 को इतिहास से मिटा दीजिए, प्‍लीज! 18 APRIL 2012 2 COMMENTS

http://mohallalive.com/2012/04/18/bihar-court-acquits-23-in-bathani-tola-massacre-case%E2%80%8E/
संघर्ष

11 जुलाई 1996 को इतिहास से मिटा दीजिए, प्‍लीज!

18 APRIL 2012 2 COMMENTS

Lal Chand Chaudhary (sitting) lost his wife and infant daughter in the massacre of Dalits by the Ranveer Sena at Bathani Tola village in Bihar's Bhojpur district in 1996. Twenty-two Dalits were killed in the attack. While many Dalits fled the village, Chaudhary stayed back and now runs a telephone booth at his house along with his son.
THE HiNDU PHOTOGRAPH

♦ अभिरंजन कुमार

तिहास से 11 जुलाई 1996 की तारीख को मिटा दीजिए। इस दिन रणवीर सेना के लोगों ने भोजपुर जिले के बथानी टोला गांव में कमजोर तबकों के 21 लोगों की हत्या कर दी थी, जिनमें 12 महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे।

अगर आप 11 जुलाई 1996 की तारीख को इतिहास से नहीं मिटाएंगे, तो आपको यह भी दर्ज करना पड़ेगा कि बिहार की पुलिस ने सोलह साल खर्च करके भी ऐसी जांच की कि इंसाफ नहीं हो सका और हत्यारों का बाल भी बांका नहीं हुआ।

इतिहास में आपको यह भी लिखना पड़ेगा कि इन सोलह सालों में सात साल सुशासन के भी थे। सुशासन की पुलिस की जांच पर उंगली उठे, इससे बेहतर है कि इतिहास से इस तारीख को ही मिटा दीजिए।

वैसे भी आप पटना हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को इतिहास में कैसे दर्ज करेंगे कि लगता है कि अभियुक्तों को बचाने के लिए पुलिस ने जांच के काम में लापरवाही बरती है। क्या हम 21 मामूली लोगों की जान चली गयी, सिर्फ इसलिए अपनी पुलिस को बदनाम होने देंगे?

इतिहास से बथानी टोला नरसंहार को इसलिए मिटा दीजिए क्योंकि क्या फर्क पड़ता है करोड़ों गरीब-गुरबों में से अगर 20-21 लोग मार डाले गये तो? इससे देश की आबादी तो कम नहीं हुई न! कोई पहाड़ तो नहीं टूट पड़ा न! देश तो चल ही रहा है न! बिहार तो आगे बढ़ ही रहा है न!

यूं भी क्या यह पर्याप्त नहीं है कि हम न्याय के साथ विकास का नारा फिजाओं में उछाल रहे हैं? महादलितों को रेडियो बांट जा रहे हैं? क्या यह पर्याप्त नहीं है कि महादलित टोलों के विकास मित्रों की तनख्वाह चार हजार रुपये से पांच हजार रुपये कर दी गयी है?

11 जुलाई 1996 को अगर आप इतिहास से नहीं मिटाएंगे तो फिर आपको यह भी दर्ज करना पड़ेगा कि गुजरात दंगों के पीड़ितों को न्याय नहीं दिला पाने की वजह से वहां के मुख्यमंत्री का इस राज्य में जो बहिष्कार हुआ, वह महज एक राजनीतिक शिगूफा था। क्या हम 21 मामूली लोगों के लिए अपने मुख्यमंत्री को बदनाम होने देंगे?

गृहमंत्री पी चिदंबरम कहते हैं कि जेसिका लाल की हत्या हुई तो बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया, उस पर नो वन किल्ड जेसिका नाम की फिल्म बन गयी और जब बिहार में 21 दलितों की हत्या हुई तो कोई आंदोलन क्यों नहीं हुआ? क्या उन्हें किसी ने नहीं मारा?

अगर यह सवाल आप इतिहास में दर्ज करेंगे तो बिहार पर यह कलंक चढ़ेगा कि 2012 ईस्वी तक भी यहां से सामंतवादी सोच खत्म नहीं हो पायी थी। वहां ताकतवर लोग कमजोर लोगों को दबा देते थे और गरीबों की जान को मुआवजे से तौल दिया जाता था।

चूंकि अपने राज्य की इज्जत का सवाल है, सरकार की इज्जत का सवाल है, मुख्यमंत्री की इज्जत का सवाल है, पुलिस की इज्जत का सवाल है, इसलिए प्लीज 11 जुलाई 1996 के बथानी टोला नरसंहार को इतिहास से मिटा दीजिए।

(अभिरंजन कुमार। वरिष्‍ठ टीवी पत्रकार। इंटरनेट के शुरुआती योद्धा। एनडीटीवी इंडिया और पी सेवेन में वरिष्‍ठ पदों पर रहे। इन दिनों आर्यन टीवी के संपादक। दो कविता संग्रह प्रकाशित: उखड़े हुए पौधे का बयान और बचपन की पचपन कविताएं। उनसे abhiranjankumar@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है।)


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