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Saturday, April 14, 2012

जन्मजात वंचितों के मुक्तिदाता डॉ.आंबेडकर (09:26:43 PM) 14, Apr, 2012, Saturday

http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/2876/10/0

जन्मजात वंचितों के मुक्तिदाता डॉ.आंबेडकर
(09:26:43 PM) 14, Apr, 2012, Saturday
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एच.एल. दुसाध
अमेरिका के न्यूयार्क का कोलंबिया विश्वविद्यालय दुनिया के श्रेष्ठतम  विश्वविद्यालयों में एक है। इसे 1901 से शुरू नोबेल पुरस्कारों के इतिहास के अब तक के कुल 826 में से 95  नोबेल विजेता देने का गौरव प्राप्त है। यहीं से 1915 में 'प्राचीन भारत में वाणिय' विषयक थीसिस लिखकर एम. ए. की डिग्री अर्जित करने के बाद डॉ. आंबेडकर ने जून  1916 में पीएचडी के लिए 'नेशनल डिविडेंड फार इंडिया:ए हिस्टोरिक एंड एनालिटीकल स्टडी' जमा किया । इसी थीसिस के आधार पर कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टर ऑफ फिलोसफी से विभूषित किया और वे आंबेडकर से डॉ. आंबेडकर बन गए। कोलंबिया विश्वविद्यालय को अपने कृति छात्र डॉ. आंबेडकर पर बड़ा नाज़ रहा। यही कारण है उनकी याद में  वहां 24 अक्तूबर,1995 को उनकी मूर्ति का अनावरण किया गया। परवर्तीकाल में जब 2004 में कोलंबिया विश्वविद्यालय की स्थापना की 250 वीं वर्षगांठ मनाई गयी, तब 'स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स(सीपा) की और से कई कार्ड जरी किये गए, जिसमें विश्वविद्यालय के 250 सौ सालों के इतिहास के ऐसे 40 महत्वपूर्ण लोगों के नाम थे जिन्होंने यहाँ अध्ययन किया तथा 'दुनिया प्रभावशाली ढंग से बदलने' में महत्वपूर्ण  योगदान किया। ऐसे लोगों में डॉ. आंबेडकर का नाम पहले स्थान पर था। जिस विश्वविद्यालय ने ढेरों नोबेल विजेता दिए उसने डॉ. आंबेडकर को इतना क्यों महत्व दिया, भारतीय मीडिया ने इसका नोटिस ही नहीं लिया। बहरहाल यहां एक दिलचस्प सवाल पैदा होता है, वह यह कि क्या डॉ. आंबेडकर दुनिया को बदलने वाले सिर्फ कोलंबिया विवि से संबध्द लोगों में ही श्रेष्ठ थे या उससे बाहर भी?                   
जहां तक दुनिया में प्रभावी बदलाव का सवाल है उसकी शुरुआात जर्मन शूद्र संतान मार्टिन लूथर की धार्मिक ांति के बाद से होती है। इसमें लेओनार्दो विंसी,कोपर्निकस,ब्रूनो,गैलेलियो के बाद आइजक न्यूटन,जीरो लामो फ्रांकास्टोरो,विलियम हार्वे,जेम्सवाट और जार्ज स्टीफेंसन जैसे वैज्ञानिकों  तथा अमेरिका,आस्ट्रेलिया,अफ्रीका इत्यादि नए देशो की खोज करनेवाले जान व सेवेस्टाइन कैबेट,ड्रेक हाकिंस,फ्लेशियर,बार्थेल्मू डियाज,,वास्को दी गामा,कोलम्बस,मैगेलेन जैसे साहसी नाविकों का अविस्मरणीय रोल है।     
किन्तु प्रकृति की प्रतिकूलता को जय कर मानव-जाति को भूरि-भूरि उपकृत करने के बावजूद भी उपरोक्त मनीषियों को दुनिया बदलने वालों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसमे तो उन महामानवों को शुमार किया जाता है जिन्होंने ऐसे समाज-जिसमे लेश मात्र भी लूट-खसूट,शोषण-उत्पीडन नहीं होगा; जिसमें मानव-मानव समान होंगे तथा उनमें आर्थिक विषमता नहीं होगी-का न सिर्फ सपना देखा,बल्कि उस सपने को मूर्त रूप देने के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया। ऐसे लोगों में बुध्द, मदक,अफलातून, सैनेका, हाब्स-लाक, रूसो-वाल्टेयर,पीटर चेम्बरलैंड, टामस स्पेन्स, विलियम गाडविन,फुरिये,प्रूधो,चार्ल्सहाल,राबर्ट ऑवेन,मार्क्स,लिंकन,लेनिन,माओ,आंबेडकर इत्यादि की गिनती होती है। ऐसे महापुरुषों में बहुसंख्य लोग कार्ल मार्क्स को ही सर्वोतम मानते हैं। ऐसे लोगों का दृढ़ विश्वास रहा है कि मार्क्स पहला व्यक्ति था जिसने विषमता की समस्या का हल निकालने का वैज्ञानिक ढंग निकाला; इस रोग का बारीकी के साथ निदान किया और उसकी औषधि को भी परख कर देखा। किन्तु मार्क्स को  सर्वश्रेष्ठ विचारक माननेवालों ने कभी उसकी सीमाबध्दता को परखने की कोशिश नहीं की। उसने जिस आर्थिक गैर-बराबरी के खात्मे का वैज्ञानिक सूत्र दिया उसकी उत्पत्ति साइंस और टेक्नालॉजी के कारणों से होती रही रही है। उसने जन्मगत कारणों से उपजी शोषण और विषमता की समस्या को समझा ही नहीं। जबकि सचाई यह है कि मानव-सभ्यता के विकास की शुरुआत से ही मुख्यत: जन्मगत कारणों से ही सारी दुनिया में विषमता का साम्राय कायम रहा जो आज भी काफी हद तक अटूट है।
   दरअसल तत्कालीन यूरोप में औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप पूंजीवाद के विस्तार ने वहां के बहुसंख्यक लोगों के समक्ष इतना भयावह आर्थिक संकट खड़ा कर दिया कि मार्क्स पूंजीवाद का ध्वंस और समाजवाद की स्थापना को अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनाये बिना नहीं रह सके। इस कार्य में वे जुनून की हद तक इस कदर डूबे कि जन्मगत आधार पर शोषण, जिसका चरम प्रतिबिम्बन भारत की जाति-भेद और अमेरिका-दक्षिण अफ्रीका की नस्ल-भेद व्यवस्था में हुआ, शिद्दत के साथ महसूस न कर सके। पूंजीवादी व्यवस्था में जहाँ मुट्ठी भर धनपति शोषक की भूमिका में उभरते हैं वहीं जाति और नस्लभेद व्यवस्था में एक पूरा का पूरा समाज शोषक तो दूसरा शोषित के रूप में नज़र आते हैं। पूंजीपति तो सिर्फ सभ्यतर तरीके से आर्थिक शोषण करते रहे हैं, जबकि जाति और रंगभेद व्यवस्था के शोषक अकल्पनीय निर्ममता से आर्थिक शोषण करने के साथ ही शोषितों की मानवीय सत्ता को पशुतुल्य मानने की मानसिकता से पुष्ट रहे। खैर जन्मगत आधार पर शोषण से उपजी विषमता के खात्मे का जो सूत्र न मार्क्स न दे सका, इतिहास ने वह बोझ डॉ. आंबेडकर के कन्धों पर डाल दिया,जिसका उन्होंने नायकोचित अंदाज़ में निर्वहन किया।
   जन्माधारित शोषण- का सबसे बड़ा दृष्टान्त भारत की जाति-भेद व्यवस्था में स्थापित हुआ। भारत में सहस्रों वर्षों से आर्थिक और सामाजिक विषमता के मूल में रही है सिर्फ और सिर्फ वर्ण-व्यवस्था। इसमें अध्ययन-अध्यापन, पौरोहित्य,राय संचालन में मंत्रणादान, राय-संचालन, सैन्य वृति,व्यवसाय-वाणिय इत्यादि के अधिकार जन्मसूत्र से सिर्फ ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के लिए निर्दिष्ट रहे। पेशों की अपरिवर्तनीयता के कारण वर्ण-व्यवस्था ने एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले लिया, जिसे हिंदू आरक्षण-व्यवस्था का नाम दिया जा सकता है। इस हिंदू आरक्षण में दलित-पिछडों के साथ खुद सवर्णों की महिलाएं तक शक्ति के सभी स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक) से पूरी तरह दूर रखीं गयीं।
    हिंदू आरक्षण के  वंचितों में अस्पृश्यों की स्थिति मार्क्स के सर्वहाराओं से भी बहुत बदतर थी। मार्क्स के सर्वहारा सिर्फ आर्थिक दृष्टि से विपन्न थे, पर राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक क्रियाकलाप उनके लिए मुक्त थे। विपरीत उनके भारत के दलित सर्वस्वहारा थे जिनके लिए आर्थिक, राजनीतिक,धार्मिक और शैक्षणिक गतिविधियां धर्मादेशों से पूरी तरह निषिध्द थीं। यही नहीं लोग उनकी छाया तक से दूर रहते थे। ऐसी स्थिति दुनिया में  किसी भी मानव समुदाय की कभी नहीं रही। यूरोप के कई देशो की मिलित आबादी और संयुक्त राय अमेरिका के समपरिमाण संख्यक सम्पूर्ण अधिकारविहीन इन्ही मानवेतरों की जिंदगी में सुखद बदलाव लाने का असंभव सा संकल्प लिया था डॉ. आंबेडकर ने। किस तरह तमाम प्रतिकूलताओं से जूझते हुए अपना संकल्प पूरा किया ,वह एक इतिहास है जिससे हमसब भली भांति वाकिफ हैं।
डॉ. आंबेडकर ने दुनिया को बदलने के लिए किया क्या? उन्होंने हिंदू आरक्षण के तहत सदियों से शक्ति के सभी स्रोतों से वहिष्कृत किये गए मानवेतरों के लिए संविधान में आरक्षण के सहारे शक्ति के कुछ स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक) में संख्यानुपात में हिस्सेदारी सुनिश्चित कराया। परिणाम चमत्कारिक रहा। जिन दलितों के लिए  कल्पना करना दुष्कर था, वे झुन्ड के झुण्ड एमएलए, एमपी, आईएएस,पीसीएस डाक्टर,इंजिनियर प्रोफ़ेसर इत्यादि बनकर राष्ट्र की मुख्यधारा जुड़ने लगे। दलितों की तरह ही दुनिया के दूसरे जन्मजात सर्वस्वहाराओं-अश्वेतों, महिलाओं इत्यादि-को भी जबरन शक्ति के स्रोतों दूर रखा गया था। भारत में अम्बेडकरी आरक्षण के ,आंशिक रूप से ही सही,सफल प्रयोग ने दूसरे देशों के सर्वहाराओं के लिए मुक्ति के द्वार खोल दिए। अम्बेडकरी प्रतिनिधित्व(आरक्षण)का प्रयोग अमेरिका, इंग्लैण्ड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया, आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका  ने अपने -अपने देश के जन्मजात वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उनकी  वाजिब हिस्सेदारी देने के लिए किया। इसी आरक्षण के सहारे सारी दुनिया में महिलाओं को राजनीति इत्यादि में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराने का अभियान जारी है। यह सही है कि  सम्पूर्ण विश्व में ही अम्बेडकरी आरक्षण ने जन्मजात सर्वस्वहाराओं के जीवन में भारी बदलाव लाया है। पर अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ करना बाकि है। अभी भी शक्ति के सभी स्रोतों में मुक्कमल रूप से अम्बेडकरी प्रतिनिधित्व का सिध्दांत लागू नहीं हुआ है,यहाँ तक कि  अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में भी। इसके लिए लड़ाई जारी है और जब ऐसा हो जायेगा,फिर इस सवाल पर माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी कि दुनिया को सबसे प्रभावशाली तरीके से बदलने वाला कौन?      
 (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के संस्थापक अध्यक्ष हैं)

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