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Monday, February 13, 2012

क्‍या इंदिरा ने देश चलाने के लिए जिस्‍म का सौदा किया था?

क्‍या इंदिरा ने देश चलाने के लिए जिस्‍म का सौदा किया था?



 संघर्ष

क्‍या इंदिरा ने देश चलाने के लिए जिस्‍म का सौदा किया था?

12 FEBRUARY 2012 7 COMMENTS
[X]

हालांकि सोनी सोरी का यह पत्र, उनकी यह अपील, उनके यह सवाल, उनका यह दुख नया नहीं है। लगभग माध्‍यमों में ये प्रकाशित-प्रसारित हो चुका है, फिर भी इसकी प्रास‍ंगिकता बनी हुई है, क्योंकि व्‍यवस्‍था के गुंडों द्वारा खुलेआम मानवाधिकार का उल्‍लंघन तेजी से जारी हैं। बेखौफ। वे जानते हैं कि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मानवाधिकार टोलियों का संगठित प्रतिरोध भी। हम जानते हैं कि हमारी सरकार बहरी हो चुकी है, लेकिन बहरे कानों को भी खड़े करने वाले नगाड़े जनता के पास होते हैं और वे इतिहास के कई पड़ावों पर उसे बजाते भी हैं : मॉडरेटर

प सब सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवी संगठन, मानवाधिकार महिला आयोग, देशवासियों से एक आदिवासी पीड़ित लाचार एक आदिवासी महिला अपने ऊपर हुए अत्याचारों का जवाब मांग रही है और जानना चाहती है कि

(1) मुझे करंट शॉट देने, मुझे कपड़े उतार कर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड़-गिट्टी डालने से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी। हम औरतों के साथ ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है।

(2) जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था कोई आये और मुझे बचा ले, पर ऐसा नहीं हुआ। महाभारत में द्रौपदी ने अपने चीर हरण के वक्त कृष्णजी को पुकार कर अपनी लज्जा को बचा ली। मैं किसे पुकारती, मुझे तो कोर्ट-न्यायालय द्वारा इनके हाथो में सौंपा गया था। ये नहीं कहूंगी कि मेरी लज्जा को बचा लो, अब मेरे पास बचा ही क्या है? हां, आप सबसे जानना चाहूंगी कि मुझे ऐसी प्रताड़ना क्यों दी गयी।

(3) पुलिस आफिसर अंकित गर्ग (एसपी) मुझे नंगा करके ये कहता है कि 'तुम रंडी औरत हो, मादरचोद गोंड… इस शरीर का सौदा नक्सली लीडरों से करती हो। वे तुम्हारे घर में रात-दिन आते हैं, हमें सब पता है। तुम एक अच्छी शिक्षिका होने का दावा करती हो, दिल्ली जाकर भी ये सब कर्म करती हो। तुम्हारी औकात ही क्या है, तुम एक मामूली सी औरत जिसका साथ क्‍यों इतने बड़े-बड़े लोग देंगे।'

[ आखिर पुलिस प्रशासन के आफिसर ने ऐसा क्यों कहा। इतिहास गवाह है कि देश की लड़ाई हो या कोई भी संकट, नारियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया था। इंदिरा गांधी ने देश की प्रधानमंत्री बनकर देश को चलाया, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया। आज जो महिलाएं हर कार्य क्षेत्र में आगे होकर कार्य कर रही हैं, क्या वो भी अपना सौदा कर रही हैं। हमारे देशवासी तो एक दूसरे की मदद करते हैं - एकता से जुड़े हैं, फिर हमारी मदद कोई क्यों नहीं कर सकता। आप सभी से इस बात का जवाब जानना चाहती हूं। ]

(4) संसार की सृष्टि किसने की? बलशाली, बुद्धिमान योद्धाओं को जन्म किसने दिया है? यदि औरत जाति न होती तो क्या देश की आजादी संभव थी? मैं भी तो एक औरत ही हूं, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया। जवाब दीजिए…

मेरी शिक्षा को भी गाली दी गयी। मैंने एक गांधीवादी स्कूल माता रुक्मणि कन्या आश्रम डिमरापाल में शिक्षा प्राप्त की है। मुझे अपनी शिक्षा की ताकत पर पूरा विश्वास है, जिससे नक्सली क्षेत्र हो या कोई और समस्या फिर भी शिक्षा की ताकत से सामना कर सकती हूं। मैंने हमेशा शिक्षा को वर्दी और कलम को हथियार माना है। फिर भी नक्सली समर्थक कहकर मुझे जेल में डाल रखा है। बापूजी के भी तो ये ही दो हथियार थे। आज महात्मा गांधी जीवित होते, तो क्या उन्हें भी नक्सल समर्थक कहकर जेल में डाल दिया जाता। आप सभी से इसका जवाब चाहिए।

ग्रामीण आदिवासियों को ही नक्सल समर्थक कह कर फर्जी केस बनाकर जेलों में क्यों डाला जा रहा है… और लोग भी तो नक्सल समर्थक हो सकते हैं? क्या इसलिए क्योंकि ये लोग अशिक्षित हैं, सीधे-सादे जंगलों में झोपड़ियां बनाकर रहते हैं या इनके पास धन नहीं है या फिर अत्याचार सहने की क्षमता है। आखिर क्यों?

हम आदिवासियों को अनेक तरह की यातनाएं देकर, नक्सल समर्थक, फर्जी केस बना कर, एक-दो केसों के लिए भी 5-6 वर्ष से जेलों में रखा जा रहा है। न कोई फैसला, न कोई जमानत, न ही रिहाई। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या हम आदिवासियों के पास सरकार से लड़ने की क्षमता नहीं है या सरकार आदिवासियों के साथ नहीं है। या फिर ये लोग बड़े नेताओं के बेटा-बेटी, रिश्तेदार नहीं हैं इसलिए। कब तक आदिवासियों का शोषण होता रहेगा, आखिर कब तक। मैं आप सभी देशवासियों से पूछ रही हूं, जवाब दीजिए।

जगदलपुर, दंतेवाड़ा जेलों में 16 वर्ष की उम्र में युवक-युवतियों को लाया गया, वो अब लगभग 20-21 वर्ष के हो रहे हैं। फिर भी इन लोगों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। यदि कुछ वर्ष बाद इनकी सुनवाई भी होती है, तो इनका भविष्य कैसा होगा। हम आदिवासियों के साथ ऐसा जुल्म क्यों? आप सब सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी संगठन और देशवासी सोचिएगा।

नक्सलियों ने मेरे पिता के घर को लूट लिया और मेरे पिता के पैर में गोली मार कर उन्हें विकलांग बना दिया। पुलिस मुखबिर के नाम पर उनके साथ ऐसा किया गया। मेरे पिता के गांव बड़े बेडमा से लगभग 20-25 लोगों को नक्सली समर्थक कहकर जेल में डाला गया है, जिसकी सजा नक्सलियों ने मेरे पिता को दी। मुझे आप सबसे जानना है कि इसका जिम्मेदार कौन है? सरकार, पुलिस प्रशासन या मेरे पिता। आज तक मेरे पिता को किसी तरह का कोई सहारा नहीं दिया गया, न ही उनकी मदद की गयी। उल्टा उनकी बेटी को पुलिस प्रशासन अपराधी बनाने की कोशिश कर रही है। नेता होते तो शायद उन्हें मदद मिलती, वे ग्रामीण और एक आदिवासी हैं। फिर सरकार आदिवासियों के लिए क्यों कुछ करेगी?

छत्तीसगढ़ मे नारी प्रताड़ना से जूझती
स्व हस्ताक्षरित
श्रीमती सोनी सोरी

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7 Comments »

  • mithilesh kumar said:

    कोई तो दिल की बात कहे |

    कोई आहट तो मिले कब्रगाहों से
    सब इंतज़ार में हैं कभी तो पट खुले ,
    हमने देखा है लाशों को भटकते हुए
    ख़ाली ज़ुबानें ही क़ब्रों में दफ़्न मिले |

    शमशान में बिछे हुए श्यायों पर
    उन्माद में भरे हुए कई शव मिले ,
    सारी तैयारियों के बाद हमने है देखा
    सब तीलियों को डब्बे में ही ज़ब्त पड़े |

    बदली हुई फिज़ाओं का रुत नया
    किलकारिओं में दबे हुए आंसू मिले ,
    हमने दिन के उजाले में है सुना
    ख़ामोशियों को बिज़ली-सा तरकते हुए |

    हर तरफ है छायी हुई बदलियाँ
    झरोंखों से झांकती उदासी मिले,
    हमने सूनी पड़ी सड़कों पे है देखा
    बारिश में भी पत्थरों को सुलगते हुए |

  • राजेश उत्‍साही said:

    हम सोनी सोरी के साथ हैं। उनके सवाल जायज हैं और उनका जवाब मिलना ही चाहिए। लेकिन सोनी सोरी ने अपने पत्र में ऐसा नहीं लिखा है,
    जैसी आपने इस उनके पत्र की हेडलाइन बनाई है। भले ही लिखे हुए का आशय यही निकलता हो। सनसनी पैदा करने के खेल में आप तो शामिल न हों।

  • Shishir Woike said:

    बहुत दर्दनाक आपबीती है. किसी समुदाय विशेष पर नक्सली,आतंकवादी,अलगाववादी होने का ठप्पा लगाया जाना कितना गलत है. एसपी अंकित गर्ग की इस हरकत से न जाने कितने और नक्सली पैदा होंगे, स्कूल जाने की उम्र में अपनी पेशी का इंतज़ार कर रहे जेल में बंद आदिवासी किशोरों के पास बाहर आने के बाद क्या विकल्प बचेगा?
    मॉडरेटर महोदय,
    सनसनीखेज शीर्षक डालने के चक्कर में आपने इस मर्मस्पर्शी दास्ताँ के साथ जो अन्याय किया है, वो अक्षम्य है. आपने आज के मुद्दा भटकाऊ मीडिया की शैली में शीर्षक को कहानी से अलग कर दिया, आपसे ऎसी गैर जिम्मेदाराना हरकत की उम्मीद नहीं थी.

  • दिलीप खान said:

    पी चिदंबरम, मनमोहन, सोनिया, रमण…सोनी सोरी की चीख़ बेकार नहीं जाएगी।.

  • Ashwini said:

    vakai me ghatna marmsparshi hai ……….. polish ki gunda gardi ke khilaph janaandolan ki jarurart hai

    par kahani aur shirshak me talmel nahi hai ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

  • Neela said:

    दर्दनाक. शर्म आती है इस व्यवस्था और देश के लोगों पर.

  • mukesh said:

    heading is worthless…..this shows dirty politics

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