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Friday, February 10, 2012

आदिवासी की नुमाइश

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/11119-2012-02-10-04-32-11


Friday, 10 February 2012 10:01

अवनीश सोमकुंवर 
जनसत्ता 10 फरवरी, 2012: ओडिशा सरकार द्वारा आयोजित मेले में आदिवासी परिवारों को दिखाने के कार्यक्रम की खबर पढ़ कर 'बाजार' फिल्म में मिर्जा शौक के एक गीत की पंक्तियां बरबस याद आर्इं- 'देख लो आज हमको जी भर के/ कोई आता नहीं है फिर मर के।' 
करीब चार साल पहले मैं मध्यप्रदेश में अपने गृह जिले छिंदवाड़ा के पातालकोट क्षेत्र में गया। अत्यंत पिछड़ी भारिया जनजाति के लोग यहां रहते हैं। मैंने भारिया जनजाति के कुछ परिवारों के साथ विकास संबंधी मुद्दों पर लंबी बातचीत की थी। इसके बाद जब मैं एक बुजुर्ग भारिया की फोटो लेने लगा तो वह बोला कि इसके पांच सौ रुपए लगेंगे। उत्सुकतावश मैंने पूछा कि इतने पैसे क्यों, तब उसने कहा कि पांच सौ तो बहुत कम हैं। मैं आपके फायदे की बात कर रहा हूं। मैंने पूछा कैसे। तब उस भारिया बुजुर्ग ने जो जवाब दिया वह न सिर्फ मेरे लिए, बल्कि इस देश के तमाम बुद्धिजीवियों और नीति-निर्माताओं के लिए परेशान करने वाला है। उसने बड़े स्वाभाविक लहजे में कहा- 'देखो साहब, हम थोडेÞ से लोग बचे हैं। जो जंगल देता है, वह खा लेते हैं। कुछ दिन बाद हम मर जाएंगे। फिर आपको इस बात की खुशी मिलेगी कि आपने कभी किसी समय भारिया को देखा था।' उसने आगे जो कहा वह और भी दुखदायी था। उसने कहा- 'आपकी खुशी के लिए पांच सौ रुपए कुछ भी नहीं हैं। इसलिए दे दो।' मैंने पांच सौ तो नहीं, लेकिन दो सौ रुपए उसे दिए और चला आया।
ओडिशा सरकार के आदिवासी मेले के समाचार से पूरे चार साल बाद आज उस भारिया बुजुर्ग का चेहरा फिर सामने आ गया। मैं नहीं जानता कि वह अभी जीवित है या नहीं। ओडिशा सरकार ने अपने आदि-पुरुषों और उनके परिवारों को दिखाने के लिए जब शुल्क रखा तो फिर से कुछ सवालों ने परेशान करना शुरू कर दिया है। हमारे देश में ऐसा भी समाज रह रहा है जो अपने ही देश के 'दूसरे' समाज को देखने के पैसे दे सकता है। अंडमान निकोबार की जारवा महिलाओं को नचा कर वीडियो बना सकता है, ताकि बाद में वह कीमती फिल्म साबित हो। और आदिवासी परिवार यह सोचते रह जाते हैं कि उनमें ऐसा क्या है, जिसमें दूसरे लोग इतनी रुचि लेते हैं।
मन में सवाल उठता है कि क्या यह नैतिक रूप से ठीक है। कैसा लगेगा जब कोई सभ्य परिवार अपने सगे-संबंधियों से यह कहेगा कि 'आज हमने एक आदिवासी परिवार को देखा, आप भी देख आएं?' आदिवासी अस्मिता का कोई संबंध मानव अधिकारों और व्यक्तिगत गरिमा से है या नहीं? हर जनजातीय समाज की अपनी विशेषताएं हैं। जीने के अपने तौर-तरीके हैं। परंपराएं और रीति-रिवाज हैं। कला कौशल है। उनका अपना गहरा कलाबोध है। मध्यप्रदेश में आदिवासी-बहुल डिंडौरी जिले के गोंड कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम को जब अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का अवसर मिला तो उन्होंने अपने चित्रों में जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति से कला जगत का मन मोह लिया। बाद में खबर मिली कि कला व्यापार में हुई अनबन से आहत होकर जापान में उन्होंने आत्महत्या कर ली। यह क्यों हुआ, उसकी अलग कहानी है।

दिवंगत जनगढ़ सिंह श्याम की पत्नी ननकुसिया बाई और उनके सगे संबंधी जो गोंड कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं या बस्तर के आदिवासी जो लौह शिल्प बना रहे हैं, उसे हम हजार रुपए में भी नहीं खरीदते, लेकिन लाखों रुपए कीमत की इलेक्ट्रॉनिक या दूसरी गैरजरूरी चीजें खरीद लेते हैं। बात सिर्फ इतनी-सी है कि हमारे आदिवासी परिवार तो अपना काम करते रहते हैं और अपना जीवन जी रहे हैं, लेकिन हमारी संवेदना कहां है। लगातार संवेदनहीन होते जा रहे समाज के लिए अब जरूरी है अपना चेहरा आईने में देखना और अपनी नैतिकता की पड़ताल करना। ओडिशा सरकार ने कहा कि 'चलो, यहां बैठो! लोग तुम्हें देखने के पैसे देंगे।' वे आ गए। हम आदेश देते रहते हैं, वे सुनते रहते हैं। मध्यप्रदेश की एक आदिम जनजाति है बैगा। वे मानते हैं कि उनका जन्म धरती से हुआ है, इसलिए अपनी मां के शरीर पर हल चला कर अन्न नहीं उगाएंगे। वर्षों से वे छिड़काव पद्धति से खेती करते रहे, अभावों में जीते रहे। दशकों तक समझाने के बाद अब वे आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग कर रहे हैं। सवाल है कि अपढ़ बैगा तो धरती के साथ मां की तरह व्यवहार करते रहे। हम पढ़े-लिखे हैं। क्या हमारे भीतर इस स्तर की संवेदना है?
एक अच्छी खबर यह सुनने को मिली है कि भारत सरकार का आदिवासी विकास मंत्रालय जनजातीय समुदाय के पारंपरिक ज्ञान और उनके कलाशिल्पों को पेटेंट कराने की पहल कर रहा है। मगर ज्यादा जरूरी है विभिन्न जनजातीय समुदायों के बीच मौजूद प्रतिभाओं को सामने लाना और उन्हें सम्मान देन, न कि उन्हें प्रदर्शनी के लिए कोई वस्तु बना कर पेश करन। ऐसे सभी उदाहरण उनके आदिम जन-जीवन के बरक्स हमारे पिछड़ेपन और संवेदनहीनता का ही सबूत हैं। ध्यान रखना चाहिए कि अगर हमारा यही रवैया बना रहा तो कल हमें भी सोचना पड़ेगा कि किसी जनजातीय समुदाय को खुद से अलग मानने वाले हम लोगों ने अपने सभ्य होने की कितनी शर्तें पूरी की हैं।

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