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किसानों की तबाही जारी है लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 24 || 01 अगस्त से 14 अगस्त 2011:: वर्ष :: 34 :September 2, 2011 पर प्रकाशित

किसानों की तबाही जारी है

वरुण शैलैश

DJH ·ý¤ç×·¤ ¥ÙàæÙ ÂÚU ÕñÆUð ç·¤âæÙभूमि अधिग्रहण का संकट केवल भट्टा पारसौल तक सीमित नहीं है, जहाँ उग्र आन्दोलन के बाद जमीन अधिग्रहण राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियाँ बन गया है। आज देश में ऐसे कई अधिग्रहण क्षेत्र हैं जहाँ बिल्ली की चाल की तरह किसानों की भूमि कब्जे में की जा रही है, लेकिन वे क्षेत्र खबर नहीं बन पा रहे हैं। भूमि अधिग्रहण से जुड़ी त्रासदी की एक कहानी उत्तर प्रदेश और बिहार को जोड़ने वाले हथुआ-भटनी प्रस्तावित रेलमार्ग के सहारे लिखी जा रही है। हथुआ से भटनी तक रेल पटरी बिछाने को लेकर 112.49 एकड़ जमीन के अधिग्रहण का नोटिस किसानों को मिल चुका है, लेकिन किसान अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हैं।

भूमि-अधिग्रहण के खिलाफ पूर्वांचल के किसान लामबंद होकर भटनी में पिछले तीन महीने से क्रमिक अनशन पर बैठे हैं। हथुआ-भटनी प्रस्तावित रेलमार्ग के लिये अधिग्रहित की जाने वाली जमीन की चपेट में 14 गाँव आ रहे हैं। जमीन अधिग्रहण की घोषणा होने के बाद इलाके में घटित कुछेक घटनायें किसानों के सामने पैदा हुए संकट का आभास कराती हैं। घटना इस साल 22 फरवरी की है, जब भूमि अधिग्रहण के विरोध में क्रमिक अनशन पर बैठे देवरिया जिले में बनकटा गाँव के रामबरन चौहान की हार्टअटैक से मौत हो गई। पछपन वर्षीय रामबरन के पास महज 11 कट्टा जमीन थी जिसमें से नौ कट्टा जमीन रेल पटरी के लिये ले ली गई।

सब्जी की खेती कर गुजारा करने वाले रामबरन के सामने बाँकी बची 2 कट्टा जमीन पर गुजारा करना संभव नहीं रह गया था। जमीन जाने की पीड़ा और भविष्य की आशंका ने इस कदर घेरा कि उनकी जिन्दगी पर बन आयी। वैसे रामबरन की मौत इलाके में उजागर हुई पहली घटना नहीं है। प्रस्तावित रेलमार्ग के लिये 2006 में जमीन की पैमाइश के दौरान अपनी जमीन पर पत्थर गाड़ते देख रायबरी चौरिया गाँव के सरल खेत में ही गिर पड़े। सरल भी जमीन छिनने के सदमे का शिकार हुए और दिल का दौरा मौत का कारण बना।

दिल के दौरे से दो किसानों की मौत यह बताने के लिये काफी है कि किसी किसान के लिये जमीन का मामला महज आर्थिक नहीं है। किसान का जमीन से भावनात्मक नाता भी होता है। एक किसान अपने खेतों के कई नाम रखकर पुकारता है। कहें तो जमीन के साथ रिश्तों की तमाम कड़ियाँ जोड़ता है। ऐसे में जमीन छिनने का मतलब चट्टान के दरकने की तरह होता है, जिससे किसान का पूरा जीवन अनिश्चितता की खाई में चला जाता है। जमीन से मानवीय संवेदनायें इस कदर जुड़ी हुई हैं कि जमीन बेचने वालों को समाज सम्मान की निगाह से नहीं देखता है। जमीन का होना हैसियत तय करता है। यहाँ तक कि शादी-ब्याह का निर्णायक पहलू बनता है, लेकिन विकास की आयातित व्याख्या में किसानों व आदिवासियों की इस मार्मिकता की कोई जगह नहीं है। जमीन-अधिग्रहण के समय छोटे किसान व भूमिहीन किसानों का संकट सबसे ज्यादा बढ़ जाता है, जिन्हें मिला मुआवजा किसी धोखे से कम नहीं होता है। वैसे भी भारतीय कृषि-परंपरा में किसान के लिये जमीन महज जीविका ही नहीं, बल्कि सोचने-समझने की ताकत होती है। यानी एक किसान खेती के काम के लिये ही कुशल होता है, लेकिन जब उसकी जमीन छिनती है तो उसकी परम्परागत कुशलता भी खारिज होती है। इसके चलते रामबरन और सरल जैसे तमाम किसान अकुशलता वाला पेशा करने शहर जाने या दूसरा रोजगार अपनाने के लिये मजबूर होते हैं।

विकास के मौजूदा मॉडल जन-भावनाओं का ख्याल रख पाने में नाकाम हैं। यही वजह है कि सरकारों के विकास के दावे महज आर्थिक विकास दर तक केन्द्रित होकर रह गये हैं। जन-जीवन की गुणवत्ता में सुधार के दावे विज्ञापननुमा हैं, जिसकी सच्चाई भूख से होने वाली मौतें बयान करती हैं। कुल मिलाकर, लागू आर्थिक नीतियों में भारतीय जनता की भलाई न के बराबर है। लिहाजा न केवल भूमि-अधिग्रहण कानून में संशोधन की मांग होनी चाहिये बल्कि इसके साथ-साथ शोषणकारी व्यवस्था को पोषित करने वाली आर्थिक नीतियों की समीक्षा की भी मांग होनी चाहिये। ताकि जनता व उसकी भावनाओं को बेदम होने से रोका जा सके।

'युवा संवाद' (संपादक: ए.के. अरुण / पता: 167 ए, जी.एच. 2, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110063 / सदस्यता शुल्क: रु. 200 वार्षिक) के जून 2011, अंक 99 से साभार)

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